श्रीनाथ दीक्षित, वरिष्ठ संवाददाता, दिल्ली
हम अक्सर बच्चों को बचपन से ही नो कहने और सुनने की आदत दाल देते हैं। जैसे कि बेटा! डू नॉट डू दिस! यह काम ऐसे मत करो, यहाँ मत बैठो, ऐसे मत खाओ, ऐसे मत पियो, बड़ों से ऐसे बात नहीं करते, अपनों से छोटों को ऐसे नहीं परेशान करते, इत्यादि! वैसे देखा जाए; तो, हम और ख़ासकर कि एक माँएँ ऐसा करके अपने बच्चे को समाज का एक ऐसा हिस्सा बनाना चाहती है, जो सबसे अलग हो और जिसे उसकी क़ाबिलियत और तहज़ीब के दम पर जाना जाए! क्यों? होता है ना कुछ ऐसा ही!
भई! माना कि आप अपने प्यारे बच्चे को समाज का एक अच्छा नागरिक बनाना चाहती हैं; लेकिन, कभी आपने यह सोचा है कि आपकी इसी आदत की वजह से कहीं आपका लाडला या आपकी लाडली अपने जीवन में निगेटिविटी की ओर अग्रसर तो नहीं हो रहे!

तो, घबराइए नहीं! बस! ज़रुरत है इन कुछ प्वॉइंट्स को ध्यान में रखने की और आप देखेंगे अपने लाडलों की पर्सनैलिटी में एक अलग ही चेंज:
क्या करें?
अपने लाडलों की शैतानियों को करें थोड़ा नज़र-अंदाज़!
शैतानी करना कोई ग़लत बात नहीं है, बशर्ते कि वो सही ढंग से और लिमिट में की जाए! तो, अगर आपको लगता है कि आपके लाडले या लाडली कर रहे हैं कुछ ऐसा, जो आपके अनुसार ग़लत है; तो, कई बार उनकी छोटी-मोटी ग़लतियों को नज़र-अंदाज़ भी कर दें! इससे आपको स्ट्रैस भी नहीं होगा और आपके लाडले भी अपने उस पल को अच्छे-से एन्जॉय कर पाएँगे!
उन्हें ग़लती करने दें!
बच्चों का मन कोमल और मासूम होता है! इसीलिए, वो किसी भी चीज़ को अपने-आप करके देखना चाहते हैं। यही कारण है कि वो कई बार आपकी बात को भी नज़र-अंदाज़ कर देते हैं! जिसके कारण आपको बहुत गुस्सा आता है और आप उन्हें डाँटने लग जाते हैं! जिसकी वजह से आपके लाडले या लाडली अपने जीवन में कोई भी फ़ैसला लेने से डरने लगते हैं और उनमें आ जाती है लो-कॉन्फ़िडेंस की शिकायत! इसका सीधा असर पड़ता है उनकी पर्सनैलिटी पर!
वैसे भी देखा और कहा गया है कि बिना ग़लती किए इंसान कुछ नहीं सीख पाता! तो, इसीलिए, अपने बच्चों को ग़लती करने दें; क्योंकि तभी वो अपने जीवन में किसी भी काम को सही तरीक़े से करना सीख पाएँगे!
प्यार और ममता से समझाएँ!
आपके लाडले मासूम और कच्चे मन के होते हैं! इसीलिए, उन्हें डाँटना या मारना ख़तरनाक हो सकता है! इससे आपके मासूम अपनी कोई भी बात आपसे शेयर करने से डरेंगे, जिसके कारण वो अपने जीवन में ग़लत राह पर अग्रसर हो सकते हैं!
प्यार और ममता ही एक ऐसा उपाय है, जिससे आप अपने नन्हें-मुन्नों के मन में अपनी किसी भी बात को बहुत अच्छे-से बिठा सकते हैं! इसीलिए, जितना हो सके; अपने लाडलों को किसी भी चीज़ के फ़ायदे और नुकसान के बारे में ख़ूब प्यार से समझाएं!
क्या ना करें?
चिल्लाएँ नहीं!
माना जाता है कि जो पैरेंट्स अपने बच्चों पर चीखते-चिल्लाते हैं, उनके बच्चों में कॉन्फ़िडेंस की कमी साफ़ तौर पर देखी जा सकती है! और-तो-और, ऐसे बच्चे अपने जीवन में हर बात और चीज़ को चीख-चिल्लाकर पूरा करवाने के लिए अग्रसर हो जाते हैं! क्योंकि, वो समझते हैं कि चीख-चिल्लाकर वो अपनी कोई भी बात मनवा और कोई भी काम करवा सकते हैं!
ऐसे बच्चे बड़े होकर माँ-बाप के तो, सर दर्द बन ही जाते हैं; साथ-ही-साथ समाज के लिए भी एक बहुत बड़ा ख़तरा साबित होते हैं! तो, जहाँ तक हो सके; अपने बच्चों से बिल्कुल भी चीख-चिल्लाकर बात ना करें!
हाथ तो भूलकर भी ना उठाएँ!
अक्सर देखा जाता है कि जब बच्चे पैरेंट्स की बात नहीं मानते; तो, ऐसे में पैरेंट्स को गुस्सा आता है। और जब यह बात हो किसी थर्ड पर्सन के सामने की; तो, पैरेंट्स इसे अपनी इंसल्ट समझकर बहुत ज़्यादा आग-बबूला हो जाते हैं और अपने लाडलों के गाल पर रख देते हैं एक ज़ोरदार तमाचा! क्यों लेडीज़? होता है ना आपके साथ भी कुछ ऐसा ही!
भई! ऐसे में अगर बात मानें चाइल्ड-एक्सपर्ट्स की; तो, उनके हिसाब से आपको यह एक्शन तो बिल्कुल भी नहीं लेना चाहिए! क्योंकि, ऐसा करने से आपके बच्चे का आपके प्रति डर और सम्मान बिल्कुल ख़त्म हो जाएगा! जिसके कारण वो किसी बड़ी ग़लत राह पर भी चल सकता / सकती है!
कहीं इसके पीछे सॉयकोलॉजिकल रीज़न तो नहीं?
डॉ. ईशा मनचन्दा,
क्लीनिकल सॉयकोलॉजिस्ट,
पूर्वी दिल्ली।
पेरेंट्स को चाहिए कि वो अपने बच्चों को किसी भी चीज़ के पहलुओं को अच्छे-से समझाएँ! क्योंकि, मारने या पीटने से बच्चे रिजिड हो जाते हैं और कई केसेस में तो, बच्चे अपना कॉन्फ़िडेंस तक खो देते हैं। बच्चों का मन एकदम कच्ची मिट्टी जैसा होता है, जिसे आप जैसे चाहें, वैसे मोड़कर शेप दे सकते हैं! इसीलिए, अपने बच्चों के साथ किया गया अच्छा व्यवहार उन्हें समाज में एक अच्छे नागरिक का स्टेटस दिला सकता है और वहीं बुरा व्यवहार बना सकता है उन्हें समाज का एक सबसे ख़राब इंसान! इसलिए, यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने बच्चे को कैसे इंसान के रूप में देखना चाहते हैं!
और, जहाँ तक बात है बच्चों की निगेटिव पर्सनैलिटी की; तो, उनको किसी भी ग़लत काम को करने से रोकने के लिए सीधा नो कहने की बजाय उन्हें उस काम को करने से होने वालीं परेशानियों से अवग़त कराएँ! इससे आपके लाडलों को जीवन में किसी भी काम को करने से पहले तर्क-शक्ति का उपयोग करने की आदत बनेगी और फिर वो ले सकेंगे अपने जीवन में सही फ़ैसले!
सभी फ़ोटो सौजन्य : श्रीनाथ दीक्षित





