नयी दिल्ली, 05 फरवरी (कड़वा सत्य) एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सर्वोच्च् न्यायालय ने मंगलवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को संयुक्त निदेशक और एचओजेड, पूर्वोत्तर जोन, दतला श्रीनिवास वर्मा को विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख की भूमिका से मुक्त करने की अनुमति प्रदान की, जो मणिपुर में कथित अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं की जांच कर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश खन्ना, न्यायमूर्ति कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने मणिपुर में सशस्त्र बलों के खिलाफ लगे आरोपों से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सीबीआई के आवेदन को मंजूरी प्रदान की।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सीबीआई की ओर से बात रखी, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी न्याय मित्र के रूप में उपस्थित हुईं।
जांच का एक लंबा कानूनी इतिहास रहा है जो 2017 में शुरू हुआ जब न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय ने कथित अवैध हत्याओं की जांच के लिए सीबीआई को एसआईटी बनाने का निर्देश दिया औ 201र8 में जांच में देरी पर चिंता व्य्क्त करते हुए अदालत ने सीबीआई डायरेक्टर को तलब किया था।
उल्लेखनीय है कि 2016 के एक महत्वपूर्ण फैसले में, न्यायमूर्ति लोकुर और यूयू ललित की पीठ ने इस बात पर बल दिया था कि संघर्ष क्षेत्रों में भी, कानून का शासन बरकरार रखा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मणिपुर पुलिस या सशस्त्र बलों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के कारण हुई मौतों के आरोपों की गहन जांच की जानी चाहिए और अपराधियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
जांच एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्ज़ीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज़ एसोसिएशन और ह्यूमन राइट्स अलर्ट द्वारा दायर एक रिट याचिका से शुरू हुई, जिसमें मणिपुर में 1,528 अतिरिक्त-न्यायिक हत्याओंका आरोप लगाया गया और दावा किया गया कि जब पीड़ित हिरासत में थे तब कथित रूप से उन्हें प्रताड़ित किया गया और कई लोगों के साथ निर्दयतापूर्वक व्यवहार किया गया।
मामला शीर्ष अदालत की निगरानी में है और वही जवाबदेही और न्याय पर फैसला लेगा।
कड़वा सत्य