नई दिल्ली | जनवरी 2026: जल शक्ति मंत्रालय के अधीन एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (CPSE) वाप्कोस लिमिटेड, जो देश-विदेश में रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं के लिए जिम्मेदार है, आज गंभीर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक कब्ज़े (institutional capture) और आंतरिक जवाबदेही के पतन के आरोपों के घेरे में है।
शिकायतों, आंतरिक अभिलेखों और आधिकारिक पत्राचार से जो तस्वीर उभरती है, वह केवल किसी एक PSU में भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता की ओर संकेत करती है।
इन आरोपों के केंद्र में पूर्व अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक राजनिकांत अग्रवाल का कार्यकाल बताया जाता है, जिसके दौरान कथित तौर पर प्रक्रियागत उल्लंघन, खरीद प्रणाली का दुरुपयोग और एक संरक्षित आंतरिक सिंडिकेट का उदय हुआ।
अपवाद नहीं, एक सुव्यवस्थित पैटर्न
कर्मचारियों, व्हिसलब्लोअरों और अन्य हितधारकों द्वारा दी गई अनेक शिकायतें यह दर्शाती हैं कि ये घटनाएँ अलग-थलग चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संरक्षित पैटर्न का हिस्सा थीं।
- टेंडर प्रक्रिया में हेरफेर और प्रतिस्पर्धा का दमन
अभिलेखों के अनुसार, अनेक उच्च-मूल्य की परामर्श एवं EPC-संबंधित परियोजनाएँ कथित रूप से:
• नामांकन (Nomination) के आधार पर,
• सीमित या “डिज़ाइन-टू-ऑर्डर” टेंडरों के माध्यम से,
• अथवा पश्चात् स्वीकृतियों (post-facto approvals) द्वारा
आवंटित की गईं—जो GFR, CVC दिशानिर्देशों और PSU खरीद नियमों के प्रतिकूल प्रतीत होती हैं।
ओडिशा, केरल, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा MoU मार्ग से दी गई कई राज्य परियोजनाओं में खुली प्रतिस्पर्धा को दरकिनार करने के आरोप सामने आए हैं।
- कमीशन तंत्र और नकद आधारित नियंत्रण
शिकायतों में एक कथित कमीशन नेटवर्क का उल्लेख है, जिसके अंतर्गत ठेकेदारों से:
• कार्य आवंटन,
• बिलों की निकासी,
• सब-कॉन्ट्रैक्ट की मंज़ूरी,
• और EMD रिफंड
के बदले भुगतान कराने का दबाव डाला गया।
यदि ये आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह सार्वजनिक पद के आपराधिक दुरुपयोग का मामला होगा—सिर्फ प्रशासनिक विवेक का नहीं।
- वित्त, HR और सतर्कता तंत्र का अंदर से निष्क्रिय होना
और भी गंभीर हैं वे आरोप जिनके अनुसार वित्त, मानव संसाधन और सतर्कता तंत्र को भीतर से कमजोर किया गया:
• प्रमुख पदों पर आज्ञाकारी व्यवस्थाएँ,
• वित्तीय आपत्तियों को अनदेखा करना,
• कर्मचारियों की सतर्कता शिकायतों को दबाना।
परिणामस्वरूप, एक ऐसा संगठन खड़ा हुआ जहाँ नियम कागज़ पर थे, व्यवहार में नहीं।
जहाँ व्यवस्था को हस्तक्षेप करना था—वहीं चुप्पी
वाप्कोस प्रकरण का सबसे चिंताजनक पक्ष PSU के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर—मंत्रालय स्तर पर—दिखाई देता है।
आरोप है कि वाप्कोस में भ्रष्टाचार से जुड़ी अनेक विस्तृत शिकायतें, जिन्हें
प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट सचिवालय और अन्य वैधानिक संस्थाओं द्वारा जल शक्ति मंत्रालय को “आवश्यक कार्रवाई” हेतु भेजा गया,
उन्हें मंत्रालय में प्रदीप कुमार, संयुक्त सचिव (नीति एवं योजना) के पास अंकित किया गया |
इसके बाद, शिकायतकर्ताओं और उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, प्रशासनिक मौन छा गया।
न कोई स्वतंत्र जाँच।
न कोई सतर्कता परीक्षण।
न कोई फॉरेंसिक ऑडिट।
न ही किसी शिकायत का कारण-सहित निस्तारण।
निकटता, हितों का टकराव और प्रशासनिक कब्ज़ा
यह कथित निष्क्रियता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि यह भी आरोप है कि संबंधित संयुक्त सचिव वाप्कोस की वर्तमान CMD के बैच-मेट हैं।
यह स्थिति हितों के टकराव, प्रशासनिक पक्षपात और निष्पक्षता के क्षरण की गंभीर आशंकाएँ पैदा करती है।
यहाँ कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा रहा—परंतु जब परिणाम पूर्ण निष्क्रियता हो, तो निकटता की भूमिका की स्वतंत्र जाँच अनिवार्य हो जाती है।
निगरानी से संरक्षण तक
इस कथित निष्क्रियता के दुष्परिणाम गहरे हैं:
• जिन अधिकारियों पर आरोप थे, वे प्रभावशाली पदों पर बने रहे;
• वही आंतरिक नेटवर्क कथित रूप से यथावत रहे;
• कुछ अधिकारी अब वर्तमान CMD के “द्वारपाल” की भूमिका में आ गए—
जो सूचना को फ़िल्टर करते हैं, असहमति को रोकते हैं, और शीर्ष नेतृत्व को असुविधाजनक सच्चाइयों से दूर रखते हैं |
इस प्रकार, जिन पर वाप्कोस के पतन का आरोप है, वे ही स्वयं को संस्था के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करने लगे—जबकि वास्तविकता को भीतर ही रोक दिया गया।
अलग जाँच क्यों अनिवार्य है
प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय से आई शिकायतों पर कार्रवाई न होना यदि सिद्ध होता है, तो यह:
• सरकार के कार्य संचालन नियमों (Rules of Business) का उल्लंघन,
• सतर्कता एवं ईमानदारी तंत्र का पतन,
• और एक खतरनाक मिसाल होगा—जहाँ निगरानी संस्थाएँ स्वयं अवरोध बन जाएँ।
इसलिए, मंत्रालय स्तर की इस कथित निष्क्रियता पर
वाप्कोस के भीतर के आरोपों से अलग और स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।
एक PSU से बड़ा सवाल
वाप्कोस कोई साधारण PSU नहीं है। यह भारत का प्रतिनिधित्व करता है—संवेदनशील राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में।
ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं है कि वाप्कोस में क्या हुआ।
प्रश्न यह है:
जब शिकायतें सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुँचकर भी ठंडी पड़ जाएँ—तो निगरानी किसकी?













