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Home संपादकीय

जंग आसान बताने वाले नेतन्याहू को वेंस की फटकार, ईरान ने बदल दी तस्वीर

News Desk by News Desk
March 30, 2026
in संपादकीय
CMG की पहली बैठक में बड़ा एक्शन प्लान! जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर फोकस, जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश
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अमित पांडे: संपादक

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने न केवल पश्चिम एशिया को हिला दिया है बल्कि अमेरिका-इज़राइल संबंधों में भी दरारें उजागर कर दी हैं। हाल ही में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई टेलीफोन वार्ता इसका ताज़ा उदाहरण है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वेंस ने नेतन्याहू को साफ शब्दों में कहा कि ईरान में शासन परिवर्तन को लेकर उनकी “आसान जीत” वाली भविष्यवाणी ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई थी।

नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को यह विश्वास दिलाया था कि ईरान की सरकार को गिराना आसान होगा और जनता विद्रोह कर देगी। लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। ईरान ने अमेरिकी-इज़राइली हमलों का डटकर सामना किया है और युद्ध लंबा खिंच गया है। वेंस, जो खुद इराक युद्ध में मरीन रह चुके हैं, हमेशा से “अनंत युद्धों” के आलोचक रहे हैं। उन्होंने नेतन्याहू को यह जताया कि ईरान की ताक़त को कम आंकना अमेरिका के लिए भारी पड़ सकता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, इस बातचीत के बाद इज़राइल ने वेंस को कमजोर करने की कोशिशें शुरू कर दीं। यह तक कहा गया कि ईरान वेंस के साथ बातचीत करना चाहता है क्योंकि वह समझौते के लिए ज़्यादा तैयार दिखते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे “इज़राइली ऑपरेशन” करार दिया—यानी वेंस की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश।

दिलचस्प बात यह है कि वेंस को ही अमेरिकी अधिकारियों ने सबसे भरोसेमंद वार्ताकार माना है। उनका कहना है कि अगर ईरान वेंस के साथ समझौता नहीं करता तो किसी और के साथ भी नहीं करेगा। वेंस की छवि एक ऐसे नेता की है जो अमेरिका को लंबे विदेशी युद्धों से बचाना चाहता है। यही कारण है कि वह ट्रंप की “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” पर पूरी तरह उत्साहित नहीं थे।

ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि वेंस का दृष्टिकोण उनसे अलग है। उन्होंने कहा, “वह शायद युद्ध को लेकर कम उत्साहित थे, लेकिन फिर भी काफी उत्साहित थे।” वेंस ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप का समर्थन किया है, लेकिन उन्होंने केवल एक टीवी इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने कहा कि यह युद्ध “फॉरएवर वॉर” नहीं बनेगा।

भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका-इज़राइल की रणनीति में दरार का मतलब है कि युद्ध का भविष्य अनिश्चित है। ईरान की ताक़त और उसकी जवाबी कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि पश्चिम एशिया में कोई भी युद्ध “आसान” नहीं होता। नेतन्याहू की “बड़ी-बड़ी बातें” अब अमेरिका के भीतर ही सवालों के घेरे में हैं।

वेंस की फटकार यह दिखाती है कि अमेरिका के भीतर भी युद्ध को लेकर मतभेद गहरे हैं। एक तरफ ट्रंप हैं जो ताक़त दिखाना चाहते हैं, दूसरी तरफ वेंस हैं जो व्यावहारिकता और ज़मीनी सच्चाई पर ज़ोर देते हैं। यही टकराव आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव तक असर डाल सकता है।

ईरान के लिए यह स्थिति लाभकारी है। जब विरोधी खेमे में ही दरारें हों, तो उसकी रणनीति और मज़बूत हो जाती है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह सबक है कि पश्चिम एशिया की राजनीति में “आसान जीत” जैसी कोई चीज़ नहीं होती। हर युद्ध लंबा खिंचता है, हर युद्ध अर्थव्यवस्था को झकझोरता है और हर युद्ध अंततः कूटनीति की मेज़ पर ही सुलझता है।

Tags: Benjamin Netanyahu NewsGlobal Politics NewsInternational Relations NewsIran War NewsJD Vance StatementMiddle East conflictTrump foreign policyUS Iran War AnalysisUS Israel RelationsWest Asia Crisis
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