अमित पांडे: संपादक
भारतीय संसद में पेश किए गए तीन संवैधानिक संशोधन विधेयक—महिला आरक्षण को 2029 तक बढ़ाने वाला संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक—लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 17 अप्रैल 2026 को हुए मतदान में सरकार को अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। समर्थन में 298 सांसद थे, विरोध में 230, जबकि आवश्यक संख्या लगभग 360 थी। यह परिणाम मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका है और अब बहस का केंद्र “बिल की विफलता” बन गया है। इस विफलता ने न केवल सरकार की रणनीति पर प्रश्नचिह्न लगाया है बल्कि लोकतंत्र के भीतर संघीय संतुलन और महिलाओं के अधिकारों की दिशा को भी अनिश्चित बना दिया है।
दक्षिणी राज्यों—तमिलनाडु और केरल—ने परिसीमन का विरोध किया। उनका तर्क है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, उन्हें सीटें घटाकर दंडित करना संघीय न्याय के खिलाफ है। इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, जिससे सीटों में कटौती की आशंका कम है। यही कारण है कि चंद्रबाबू नायडू की TDP ने बिल का समर्थन किया। इस विरोध और समर्थन ने स्पष्ट कर दिया कि परिसीमन का मुद्दा केवल तकनीकी नहीं बल्कि राजनीतिक और क्षेत्रीय हितों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
महिला आरक्षण का भविष्य भी इस विफलता से प्रभावित हुआ है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी थीं, लेकिन यह आरक्षण परिसीमन के बाद ही लागू होता। अब जब परिसीमन बिल ही असफल हो गया, तो महिला आरक्षण का रास्ता भी अवरुद्ध हो गया है। विपक्ष ने इसे “राजनीतिक सौदेबाजी” बताया और कहा कि सरकार ने आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर महिलाओं के अधिकारों को टाल दिया। इसने महिलाओं की भागीदारी को एक बार फिर अनिश्चितता में डाल दिया है।
प्रधानमंत्री ने संसद में कहा था कि यदि विपक्ष समर्थन करेगा तो श्रेय उन्हें मिलेगा, अन्यथा श्रेय स्वयं उनके हिस्से में आएगा। यह वक्तव्य लोकतांत्रिक विमर्श को “सेवा की राजनीति” से हटाकर “क्रेडिट की राजनीति” की ओर ले जाता है। लोकतंत्र का मूल आधार जनता की प्रगति है, न कि नेताओं की उपलब्धि का दावा। बिल की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि श्रेय की राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है संघीय संतुलन और जनहित।
संवैधानिक दृष्टि से यह प्रश्न भी उठता है कि क्या जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) की भावना के खिलाफ नहीं है। क्या महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना राजनीतिक रणनीति थी ताकि विपक्ष को दबाव में लाया जा सके। और क्या लोकतंत्र का आधार जनसेवा रहेगा या क्रेडिट की राजनीति।
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की विफलता भारतीय लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक क्षण है। यह केवल सीटों की संख्या या आरक्षण का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि लोकतंत्र का आधार जनहित और समानता रहेगा या फिर श्रेय लेने की राजनीति। दक्षिणी राज्यों का विरोध संघीय ढाँचे की रक्षा का प्रतीक है, जबकि उत्तरी राज्यों का समर्थन जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की माँग को दर्शाता है। इस विफलता ने यह भी दिखा दिया कि संसद में केवल संख्याएँ ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय हित, संवैधानिक प्रश्न और राजनीतिक रणनीतियाँ मिलकर लोकतंत्र की दिशा तय करती हैं।













