बंगाल एक अलग तरह की राजनीति में प्रवेश कर चुका है। इसकी शुरुआत ऋणमूल के गुंडावाहिनी के दमन से हुई, जैसा वहाँ की नवनिर्वाचित सरकार दावा करती है। पहले आरोपी पदाधिकारियों को कमर में रस्सी बाँधकर घुमाया गया, फिर अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ, फिर महुआ मित्रा को अंडों की बारिश का सामना करना पड़ा और अब ममता पर अंडा फेंका गया। सवाल एक साथ कई हैं—क्या सत्तारूढ़ पार्टी बंगाल में एक नई राजनीतिक संस्कृति को जन्म दे रही है या फिर राज्य के जनमानस का विराट क्षोभ संभाल पाने में उनका प्रशासन विफल हो रहा है? जवाब एक का भी सरकार नहीं दे पा रही है, हाँ, एक नए सांस्कृतिक उद्भव का गवाह वहाँ का सभ्य समाज ज़रूर बना। रेप के आरोपी को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।
गौरतलब है कि 4 जुलाई को ममता ने फेसबुक लाइव पर कहा था—“आमाय जाने मारते पारो किंतु आमी घूरे दাড়ाबो ई” (मुझे जान से मारने पर ही रोका जा सकता है…)। ममता ने वह पूरा वाकया दोहराते हुए बताया कि 21 जुलाई 1993 को पुलिस मुझ पर गोली चलाने ही वाली थी… वह खूनी 21 जुलाई आज भी “मेरे सपनों में, मेरी यादों में गहराई से बसी है।”
सुबह 11:30 बजे मैं अपने घर से निकली और सबसे पहले मेयो रोड के चौराहे पर गई। उस समय वहाँ लाखों लोग मौजूद थे। कार्यकर्ताओं ने बताया, थोड़ी देर पहले पुलिस ने कांग्रेस नेता पंकज बनर्जी को बेरहमी से पीटा और उनका सिर फट गया है। उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। मैंने सभी को शांत रहने को कहा।
एक मेटाडोर पर झंडा और माइक्रोफ़ोन बाँधकर सभा की जा रही थी। मैंने पुलिस से थोड़ा हटकर बैठने का अनुरोध किया ताकि लोग बैठ सकें। पता नहीं क्यों, उस दिन पुलिस शुरू से ही अलग मूड में थी, उन्होंने मेरी एक भी बात नहीं सुनी। मैंने विधायक शोभनदेव दा से कहा—“आप शांतिपूर्वक सभा जारी रखें, मैं ब्रेबोर्न रोड पर जा रही हूँ।”
जब मैं ब्रेबोर्न रोड स्थित मंच की ओर बढ़ी तो सौगत रॉय के नेतृत्व में सहयोगियों के एक समूह को बहुत उत्तेजित देखा। सौगत रॉय से मैंने सुना कि ब्रेबोर्न रोड पर लाखों लोग पहले से ही मौजूद थे। पुलिस अंधाधुंध लाठीचार्ज कर रही थी। मंच पर हमारे नेताओं को भी पीटा। उन्होंने माइक्रोफ़ोन के तार भी काट दिए ताकि हमारा भाषण आम लोगों तक न पहुँचे।
जब मैं महाकरण से आगे बढ़कर ब्रेबोर्न रोड पहुँची, तो जहाँ तक नज़र जाती थी, मुझे सिर्फ़ लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। पुलिस किसी ट्रक को भी आने नहीं दे रही थी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को विभिन्न सड़कों पर रोका जा रहा था, लेकिन क्या लोगों की लहर को ऐसे रोका जा सकता था? जैसे ही मैं पहुँची, सीपीएम कार्यकर्ताओं ने मंच के सामने बिल्डिंग की छत से ईंटें बरसानी शुरू कर दीं। पुलिस ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि लाठियों और आँसू गैस के साथ हमारे कार्यकर्ताओं की ओर दौड़ पड़ी।
मैं बिना माइक्रोफ़ोन के कुछ नहीं कह सकी। तभी पुलिस फिर से मंच पर आई और राइफल के बट से मेरी कमर पर मारा। इस बीच, पुलिस के एक और समूह ने तुरंत मंच पर आँसू गैस के गोले दागने शुरू कर दिए। पुलिस के रौद्र रूप को देखकर, मेरे साथियों ने मुझे जबरन मंच से नीचे उतार दिया।
मैं मंच के नीचे कहीं खड़ी थी, मेरी पीठ में असहनीय दर्द हो रहा था। पार्षद हृदयानंद गुप्ता मुझे दूर हटाने की कोशिश कर रहे थे। उसी समय, दो आँसू गैस के गोले मेरे पैरों के पास आकर गिरे। पुलिस गोली चलाने के लिए तैयार थी। बंदूक की नली मेरी ओर तान दी गई थी। किसी भी फ़ोटोग्राफ़र को हमारे आसपास आने की इजाज़त नहीं थी। मेरी ओर बंदूक की नली तनी देखकर मेरे निजी सुरक्षा गार्ड माइती ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर चेतावनी दी कि कुछ हुआ तो वह भी गोली चला देंगे।
वह दिन बहुत अजीब था। मैं आमतौर पर कोई सुरक्षा नहीं लेती। लेकिन उस सुबह से ही, स्पेशल ब्रांच के पाँच-छह लोगों की एक टीम मेरी गाड़ी के पीछे लगी थी। उनमें से एक का नाम विश्वास था।
सवाल ये कि मात्र चार दिन ही बीते थे और आज जब वह बालीगंज फाड़ी से हाजरा तक मीचिल कर रही थीं तो उन पर अंडों की बारिश हो गई। राजनीति में यह विद्रूपता बहुत कम देखी गई है। कई लोग अब पूर्व मुख्यमंत्री हैं, अपने पार्टी का कार्यक्रम भी करते हैं, लेकिन अंडा फेंकने जैसी परिस्थितियों का सामना नहीं करते। तो क्या अब यह मान लिया जाए कि नई वैकल्पिक राजनीति इस देश में ऐसे ही चलेगी?
टीएमसी सांसद महुआ पर जब अंडा फेंका गया तो वे पार्टी कार्यालय में मीटिंग कर रही थीं। उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर जो वीडियो अपलोड है, उसमें वह कह रही हैं कि राज्य के पुलिस महानिदेशक एस. एन. गुप्ता उनके फोन का जवाब नहीं दे रहे। तो मतलब यह कि राज्य पुलिस अपना कर्तव्य ठीक से पालन नहीं कर रही। फिर ऐसे में जनता किससे और कहाँ उम्मीद करे?
जानकार बताते हैं कि यह सब कुछ ममता और उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने की साज़िश है। असल लड़ाई 21 जुलाई की है, जहाँ ममता जो लंबे समय से शहीद दिवस का पालन कर रही हैं, कार्यक्रम करेंगी। दूसरी ओर, खुद को असली ऋणमूल बताने वाले ऋतोब्रतो भट्टाचार्य भी करेंगे। राज्य के मुख्यमंत्री ने दोनों ही पक्षों को जगह देने को कहा है, पर उस दिन की आज़माइश बहुत कुछ तय करेगी।
एक तरफ यह तय होगा कि विधायक जिसके पास हों, राज्य की जनता ममता के साथ है या नहीं। तो दूसरी तरफ विपरीत खेमे का राजनीतिक भविष्य भी। फलतः जब लड़ पाना संभव न दिखे तो मनोबल पर वार ज़्यादा सही है। पर क्या इससे ममता को रोका जा सकता है? यह तो 21 जुलाई को पता चलेगा।






