• About us
  • Contact us
Wednesday, June 10, 2026
42 °c
New Delhi
37 ° Thu
35 ° Fri
Kadwa Satya
  • Home
  • संपादकीय
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • व्यापार
  • खेल
  • अपराध
  • करियर – शिक्षा
    • टेक्नोलॉजी
    • रोजगार
    • शिक्षा
  • जीवन मंत्र
    • व्रत त्योहार
  • स्वास्थ्य
  • मनोरंजन
    • बॉलीवुड
    • गीत संगीत
    • भोजपुरी
  • स्पेशल स्टोरी
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • व्यापार
  • खेल
  • अपराध
  • करियर – शिक्षा
    • टेक्नोलॉजी
    • रोजगार
    • शिक्षा
  • जीवन मंत्र
    • व्रत त्योहार
  • स्वास्थ्य
  • मनोरंजन
    • बॉलीवुड
    • गीत संगीत
    • भोजपुरी
  • स्पेशल स्टोरी
No Result
View All Result
Kadwa Satya
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • व्यापार
  • खेल
  • अपराध
  • करियर – शिक्षा
  • जीवन मंत्र
  • स्वास्थ्य
  • मनोरंजन
  • स्पेशल स्टोरी
Home संपादकीय

“पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों” — एक टूटा हुआ संवैधानिक करार

जिस देश की नींव समानता के वादे पर रखी गई हो, वहाँ शिक्षा केवल अधिकार नहीं—बल्कि लोकतंत्र का मूल स्तंभ होती है। लेकिन बीते एक दशक में यह वादा धीरे-धीरे खोखला होता गया है।

News Desk by News Desk
June 23, 2025
in संपादकीय
“पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों” — एक टूटा हुआ संवैधानिक करार
Share on FacebookShare on Twitter

अमित पांडेय

जिस देश की नींव समानता के वादे पर रखी गई हो, वहाँ शिक्षा केवल अधिकार नहीं—बल्कि लोकतंत्र का मूल स्तंभ होती है। लेकिन बीते एक दशक में यह वादा धीरे-धीरे खोखला होता गया है।
2014 से 2024 के बीच, भारत ने 89,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद कर दिए हैं, यानी करीब 8% की गिरावट। यह केवल प्रशासनिक आंकड़े नहीं हैं—यह उस संवैधानिक वचन का टूटना है, जो हर बच्चे को निशुल्क, सार्वभौमिक शिक्षा देने का था।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश इस पतन के केंद्र में हैं—ये दोनों राज्य मिलकर कुल बंद हुए स्कूलों का 60% हिस्सा रखते हैं। अकेले एमपी में 29,410 स्कूल बंद हुए, यानी लगभग 24% गिरावट, और यूपी ने 25,126 स्कूल खो दिए, यानी 15.5%।
जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और झारखंड में भी यही पैटर्न दिखता है—दोहरे अंकों की गिरावट। ये केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उस राज्य की पीछे हटती जिम्मेदारी का संकेत हैं जो कभी शिक्षा का संवाहक था।
दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों की संख्या में लगभग 15% की बढ़ोतरी हुई है। बिहार जैसे राज्य में यह वृद्धि 179% तक पहुँची है। ओडिशा में निजी स्कूल 3,350 से बढ़कर 6,000 से अधिक हो गए। यूपी में 20,000 से अधिक निजी स्कूल उभर आए।
लेकिन इस आँकड़े के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है: अब शिक्षा अधिकार नहीं, खरीदने की चीज बन गई है।
सरकार इस बदलाव को “युक्तिकरण (rationalisation)” का नाम देती है—50 से कम छात्रों वाले स्कूलों को बंद किया जा रहा है। लेकिन यह तकनीकी भाषा मानव लागत को नजरअंदाज करती है:
गांवों और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को अब कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, या वे स्कूल जाना ही छोड़ देते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में एक साल में 22 लाख छात्रों का नामांकन घट गया। उत्तराखंड में हर साल सैकड़ों स्कूल ‘शून्य नामांकन’ के कारण डि-रिकॉग्नाइज़ हो जाते हैं।
यह सब आकस्मिक नहीं है। यह एक ऐसी राजनीतिक सोच का परिणाम है जो शिक्षा नहीं, उद्यमिता को सफलता का मानक मानती है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में कहा था कि पकौड़ा बेचना भी रोजगार है, तब इसे हल्के में लिया गया। लेकिन अब लगता है कि यही सोच नीति का हिस्सा बन चुकी है—जहाँ मकसद वैज्ञानिक, आलोचनात्मक सोच वाले नागरिक नहीं, बल्कि गिग इकोनॉमी के मजदूर तैयार करना है।
इसमें सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत की ऐतिहासिक शिक्षा प्रतिबद्धता को ही नकारा जा रहा है। 2009 का शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) 6–14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। यह कानून यह भी तय करता है कि हर बच्चे के पास एक स्कूल होना चाहिए।
लेकिन स्कूलों को बंद करना इस कानून के सेक्शन 6 की सीधी अवहेलना है। सरकार की प्रतिक्रियाएं यह दर्शाती हैं कि RTE अब बाध्यता नहीं, विकल्प बन गया है।
सबसे ज्यादा नुकसान दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को हो रहा है। वे सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं, लेकिन जब स्कूल ही नहीं बचे, तो उनके पास विकल्प भी नहीं।
प्राइवेट स्कूलों में एक कक्षा 1 के छात्र का ‘स्टार्टर किट’ 10,000 रुपये तक का होता है—जो गरीबों की पहुंच से बाहर है।
इसका नतीजा है एक दोहरी शिक्षा व्यवस्था—अमीरों के लिए अलग, गरीबों के लिए अलग, और बहुतों के लिए—बिलकुल नहीं।
यह वही सोच है जो औपनिवेशिक दौर में थी—जहाँ शिक्षा सबके लिए नहीं, केवल कुछ विशेष वर्गों तक सीमित थी।
और यह सफ़दर हाशमी की वह पंक्ति—”पढ़ना लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों”—का सीधा अपमान है।
आज यह पुकार एक सुनसान, वीरान स्कूल भवन में गूंज रही है—जैसे कोई भूला हुआ सपना।
इतिहास हमें क्या सिखाता है, और हम क्या भूल रहे हैं
इतिहास में, भारत में हर शिक्षा सुधार ने स्कूलों को बंद नहीं, खोला।
औपनिवेशिक दौर में भी लॉर्ड कॉर्नवालिस ने ज़मींदारी व्यवस्था को बदला, पर उसे नष्ट नहीं किया।
1947 के बाद, हमने शिक्षा को एक लोक-कल्याणकारी जिम्मेदारी माना।
कोठारी आयोग (1964–66) ने समान स्कूल प्रणाली, समान अवसर, और राज्य की भूमिका को रेखांकित किया।
सर्व शिक्षा अभियान और RTE एक्ट इसी दृष्टिकोण के विस्तार थे।
आज की सरकार टूटे हुए स्कूलों को सुधारने के बजाय बंद कर रही है।
अधिकार की भाषा को हटाकर व्यवसाय की भाषा लाई जा रही है।
किफायती स्कूलों की जगह अब लाभदायक सेवा क्षेत्र (service sector) आ गया है।
उत्तराखंड में 1,100 से अधिक प्राथमिक स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं है, और 60% स्कूलों में प्रधानाचार्य नहीं हैं।
यूपी और एमपी में हजारों शिक्षकों की भर्ती लंबित है।
हरियाणा के नूंह जिले में बच्चे तो हैं, शिक्षक नहीं—कक्षा 12 का पास प्रतिशत केवल 45%।
ASER 2024 रिपोर्ट बताती है कि 6–14 साल के बच्चों में मूलभूत शिक्षण कौशल ठहरे हुए हैं।
ये केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच की असंवेदनशीलता है।
COVID-19 ने इस संकट को और गहरा किया।
लाखों बच्चे स्कूल से हमेशा के लिए बाहर हो गए।
‘कोरोना देवी’ की पूजा जैसी घटनाएं बताती हैं कि वैज्ञानिक सोच का पतन हो रहा है।
शिक्षा का अभाव केवल साक्षरता नहीं छीनता—वह हमें विवेकहीन समाज में बदल देता है।
यह शिक्षा में वही हो रहा है, जो हम स्वास्थ्य और न्याय व्यवस्था में पहले देख चुके हैं—सरकारी संस्थाएं कमजोर, निजी कंपनियां मजबूत।
₹117 अरब डॉलर का शिक्षा बाज़ार अब कोचिंग, एडटेक और महंगे स्कूलों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
फिर भी उम्मीद बाकी है।
वडोदरा में पिछले छह सालों में 7,000 से अधिक छात्र निजी से सरकारी स्कूलों में लौटे—क्योंकि राज्य ने निवेश किया, भरोसा जगाया।

अब भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
क्या हम शिक्षा को निजी, असमान और विशेषाधिकार आधारित बना देंगे?
या हम फिर से उसे संविधान का मूल स्तंभ मानेंगे?
पुनः विश्वास अर्जित करने के लिए ये कदम जरूरी हैं:
• स्कूल बंद करना बंद करें। 2018 के बाद बंद हुए स्कूलों की समीक्षा करें।
• शिक्षकों की भर्ती युद्धस्तर पर करें।
• प्राथमिक ढांचे में निवेश करें, प्रशिक्षण दें, समुदाय से संवाद करें।
• निजी स्कूलों पर सख्त निगरानी रखें—फीस सीमित करें, प्रवेश किट पर रोक लगाएं।
• STEM और नागरिक शिक्षा को मजबूत करें।
क्योंकि दांव पर केवल अक्षरज्ञान नहीं है—बल्कि भारत का लोकतांत्रिक भविष्य है।
अब देश को तय करना है—क्या वह “पकौड़ों का राष्ट्र” बनेगा, जहाँ शिक्षा की जगह बेकारी है?
या वह “शिक्षकों का राष्ट्र” बनेगा, जहाँ हर गरीब बच्चे के पास किताब, शिक्षक और भविष्य है?
सफ़दर हाशमी की पुकार आज भी गूंज रही है—यह तय हमें करना है कि वह एक क्रांति का आह्वान बनेगी, या एक अधूरे सपने की शोकगाथा।

Tags: Right to Education और सरकारी नीतिपकौड़ा रोजगार और शिक्षाभारत में शिक्षा व्यवस्था की स्थितिभारत में स्कूल बंद होने की खबरभारतीय लोकतंत्र और शिक्षा संकटमोदी सरकार शिक्षा नीतिशिक्षा संकट 2025सरकारी स्कूल बनाम प्राइवेट स्कूलसरकारी स्कूलों की गिरावटस्कूल बंद होने का असर
Previous Post

Bihar News Hindi: बिहार में प्रशासनिक क्रांति! मुख्य सचिव ने किया ‘ई-ऑफिस मैनुअल’ लॉन्च, अब फाइलों का काम होगा चुटकी में

Next Post

तमिल पहचान पर सियासी संग्राम

Related Posts

No Content Available
Next Post
तमिल पहचान पर सियासी संग्राम

तमिल पहचान पर सियासी संग्राम

New Delhi, India
Wednesday, June 10, 2026
Partly cloudy
42 ° c
27%
19.1mh
44 c 29 c
Thu
43 c 30 c
Fri

ताजा खबर

देश की स्टार्टअप हब के रूप में उभर रहा पंजाब, 31 स्टार्टअप्स को 1.07 करोड़ रुपए की सीड ग्रांट वितरित की गई – मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान

देश की स्टार्टअप हब के रूप में उभर रहा पंजाब, 31 स्टार्टअप्स को 1.07 करोड़ रुपए की सीड ग्रांट वितरित की गई – मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान

June 9, 2026
भगवंत मान सरकार द्वारा दिल्ली हवाई अड्डे के लिए लग्जरी बसों के बेड़े का विस्तार; परिवहन मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने 5 नई सुपर इंटीग्रल वोल्वो बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया

भगवंत मान सरकार द्वारा दिल्ली हवाई अड्डे के लिए लग्जरी बसों के बेड़े का विस्तार; परिवहन मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने 5 नई सुपर इंटीग्रल वोल्वो बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया

June 9, 2026
‘मिशन रोजगार’ जारी रखते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने 355 और युवाओं को सौंपे नियुक्ति पत्र; कहा, पंजाब में सरकारी नौकरियों के लिए सिर्फ योग्यता ही एकमात्र मापदंड

सत्ता हथियाने और पंजाब को लूटने का मौकापरस्त संयोग है अकाली दल-भाजपा गठजोड़; लोग इसे सिरे से नकार देंगे: मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान

June 9, 2026
जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल द्वारा 13 करोड़ रुपये की सिंचाई परियोजनाओं का शुभारंभ, करीब 3832 एकड़ कृषि योग्य क्षेत्र को पहली बार मिलेगा नहरी पानी

जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल द्वारा 13 करोड़ रुपये की सिंचाई परियोजनाओं का शुभारंभ, करीब 3832 एकड़ कृषि योग्य क्षेत्र को पहली बार मिलेगा नहरी पानी

June 9, 2026
हरजोत सिंह बैंस द्वारा “मिशन क्लीन पंजाब” की शुरुआत; सभी एम.सी. अधिकारी प्रतिदिन सुबह 7 से 8 बजे तक फील्ड में रहेंगे

हरजोत सिंह बैंस द्वारा “मिशन क्लीन पंजाब” की शुरुआत; सभी एम.सी. अधिकारी प्रतिदिन सुबह 7 से 8 बजे तक फील्ड में रहेंगे

June 9, 2026

Categories

  • अपराध
  • अभी-अभी
  • करियर – शिक्षा
  • खेल
  • गीत संगीत
  • जीवन मंत्र
  • टेक्नोलॉजी
  • देश
  • बॉलीवुड
  • भोजपुरी
  • मनोरंजन
  • राजनीति
  • रोजगार
  • विदेश
  • व्यापार
  • व्रत त्योहार
  • शिक्षा
  • संपादकीय
  • स्पेशल स्टोरी
  • स्वास्थ्य
  • About us
  • Contact us

@ 2025 All Rights Reserved

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • व्यापार
  • खेल
  • अपराध
  • करियर – शिक्षा
    • टेक्नोलॉजी
    • रोजगार
    • शिक्षा
  • जीवन मंत्र
    • व्रत त्योहार
  • स्वास्थ्य
  • मनोरंजन
    • बॉलीवुड
    • गीत संगीत
    • भोजपुरी
  • स्पेशल स्टोरी

@ 2025 All Rights Reserved