पराली जलाने से वायु प्रदूषण अधिक होता है, जिसके चलते लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही अधिक मात्रा में पुआल जलाने से पर्यावरण पर अधिक प्रभाव पड़ता है जिस कारण मृदा की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। वैसे तो देश के कई राज्यों में प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए निगरानी भी की जा रही है। इसी को देखते हुए बिहार में भी अब पराली जलाए जाने की ड्रोन के माध्यम से निगरानी की जाती है। खेतों में अगर पराली जलाते कोई किसान पाए जाते हैं तो कृषि विभाग के द्वारा मिलने वाले सारे लाभों से उन्हें वंचित किया जाता है। इतना हीं नहीं उनकी डी0बी0टी0 पंजीकरण भी स्थगित कर दी जाएगी। नियम को सख्त करते हुए पराली जलाने वाले किसान पैक्सों और व्यापार मंडलों में भी अपने धान की बेची नहीं कर पाएंगे। सेटेलाइट इमेज और एरियल रिपोर्ट के अनुसार किसानों के बार-बार अवशेष जलाए जाने पर कार्रवाई भी की जा रही है।
राज्य सरकार पराली जलाने से होने वाले नुकसान को लेकर लगातार किसानों को जागरुक कर रही है। इसके अलावे किसानों को हर स्तर पर सहायता भी मुहैया करा रही है ताकि उन्नत खेती हो सके। किसानों की आमदनी में इजाफा हो सके इसके लिए किसानों को राज्य सरकार फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत, कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देती है। किसानों को समय-समय पर जानकारी देती है कि फसल अवशेष प्रबंधन से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है। इससे मिट्टी का तापमान बढ़ने की समस्या नहीं होती है। फसल अवशेष प्रबंधन से मिट्टी में जल धारण क्षमता बढ़ती है। इससे मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणवत्ता में सुधार होती है। फसल अवशेष प्रबंधन से मिट्टी का कटाव कम होता है। फसल अवशेष प्रबंधन से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं और केंचुओं को भी नुकसान नहीं पहुंचता है।
खेतों में पराली जलाने को रोकने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए सूबे के 9 विभागों के द्वारा किसानों को जागरुक किया जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन पर कृषि, वन एवं पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीविका, पशुपालन, जनसंपर्क, त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं, सहकारिता सहित सभी विभागों के जिलास्तरीय अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रीय कर्मियों तथा पदाधिकारियों के जरिए जन-जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। फसलों के अवशेष को खेतों में जलाने से होनेवाले नुकसान के प्रति किसानों तथा आम जनता के बीच वृहद स्तर पर जागरुकता अभियान भी चलाया जा रहा है। ओरिएंटेशन सेशन आयोजित कर लोगों को जागरूक किया जा रहा है ताकि उन्हें इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो सके।
फसल अवशेष (पराली) जलाने से हो रहे नुकसान से बचने के लिए लिए राज्य सरकार द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन में सहायक कृषि यंत्रों पर 75 फीसदी अनुदान, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति तथा अत्यंत पिछड़ा वर्ग को 80 फीसदी अनुदान दिये जाने का प्रावधान किया गया है। कम्बाइन हार्वेस्ट के उपयोग में कमी लाने पर जोर दिया जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन में उपयोगी कृषि यंत्र जिन पर अनुदान दिया जा रहा है उनमें बुआई के लिए हैप्पी सीडर एवं जिसे टिलेज मशीन, फसल अवशेष को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में बिछाने के लिए रोटरी मल्चर, फसल अवशेष को इकट्ठा करने के लिए स्ट्रा रीपर एवं स्ट्राबेलर तथा फसल काटने एवं बंडल बनाने के लिए रीपक-कम-बाइन्डर यंत्र शामिल हैं, जिनमें फसल अवशेष (पुआल) को मशीनों की सहायता से इकट्ठा कर उसका उपयोग पशुचारा आदि में किया जाता है या खेत में ही मिला दिया जाता है। कृषि विभाग द्वारा निर्णय लिया गया है कि कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ उन्हीं किसानों को मिलेगा, जो फसल अवशेष नहीं जलायेंगे। इसके अतिरिक्त फसल अवशेष के उपयोग की योजना एवं इस पर सरकारी सहायता पर कार्य किया जा रहा है। जैविक कृषि के अंतर्गत 75,000 एकड़ भूमि के आच्छादन के लक्ष्य के विरुद्ध अब तक लक्ष्य से अधिक कुल 1,12,081 एकड़ भूमि का आच्छादन किया गया है। टपकन सिंचाई के अंतर्गत 65 हजार 753 एकड़ भूमि के आच्छादन के लक्ष्य के विरुद्ध अब तक 26 हजार 615 एकड़ भूमि का आच्छादन किया गया है।
कृषि विभाग के द्वारा खेतों में फसल अवशेष जलाने की बजाय बेलर मशीन का उपयोग, वर्मी कंपोष्ट बनाना और मिट्टी में फसल अवशेष मिलाने जैसी विधियों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जबकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से ए0एन0एम0 और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से फसल अवशेषों को जलाने के कारण मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे आंख, नाक, गले में जलन सहित अन्य बीमारियों के बारे में लोगों के बीच जनजागरुकता अभियान चला रही है। फसल अवशेष जलाने से वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड और अन्य हानिकारक यौगिकों की मात्रा बढ़ती है, जो वायु प्रदूषण का कारण बनती है। इससे जलवायु परिवर्तन की समस्या भी गंभीर हो सकती है। वर्ष 2008 में 4904 वर्मी कंपोस्ट इकाईयों की स्थापना की गयी तथा 78 सामुदायिक तालाबों का निर्माण किया गया। वर्ष 2009 में राज्य के प्रत्येक प्रखंड के 5 गांवों में कृषि विकास शिविर आयोजित कर किसानों की समस्याओं को स्थल पर ही समाधान किये जाने का कार्यक्रम तथा कृषि एवं संबद्ध विभागों की योजनाओं की जानकारी देने का कार्यक्रम संचालित किया गया।
प्रशासन फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए तत्पर है और किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए जागरूक कर रहा है। शिक्षा विभाग के द्वारा स्कूलों के पाठ्यक्रमों में फसल अवशेषों को खेतों में न जलाने को लेकर पढ़ाया जाएगा। ऐसे में हर किसानों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि खुद तो पराली न ही जलाएं और अपने आस-पास के किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करें।