अमित पांडे: संपादक

इन्हीं दिनों देश के हर कोने से उठती आवाज़ कहीं न कहीं अपने ही लोगों से लांछित होकर आती है। गरज़ यह कि हम कहते हैं, कल तो साथ थे? केवल इतना भर से कोई भी अपनी सामाजिक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी पूरी कर सकता है?

अग्निमित्रा बंगाल में ममता को टक्कर देने वाली भाजपा नेत्री मानी जाती हैं, साहसी, निडर और कार्यकर्ताओं के बीच रहने वाली। कभी यही हाल रूपा गांगुली का भी था, लेकिन आजकल वे नदारद हैं । बताया जाता है कि “सिलिगुड़ी होम स्कैम” के बाद से उनका राजनीतिक कद भाजपा में कम होने लगा। हालाँकि जानकार यह भी मानते हैं कि रूपा गांगुली ने बाबुल सुप्रियो को भाजपा छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

वे सारे फायरब्रांड नेता अपनी ही पार्टी की राजनीति और आत्मिक पीड़ा से दुखी हैं। अग्निमित्रा साहसी हैं, इसलिए बोल गईं। पर जून, सायोनी, काकली,ये कैसे बोलें? ये तो घर तोड़कर, साथ छोड़कर जा चुके हैं।

मतलब साफ है कि बंगाल में सत्ता बदली है,तरीक़े नहीं। यह देश के लिए बड़ा दुखद अनुभव है कि जनता जब किसी को बहुत उम्मीद से चुनती है, तो कहीं न कहीं ठगी जाती है। शायद यही कारण है कि राजनीति से देश में लोगों का भरोसा कम हो रहा है, या फिर सब कुछ “taken for granted” की स्थिति में चल रहा है।

जानकार मानते हैं कि ये दोनों ही बातें स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों अजीब मोड़ पर खड़ी है। सत्ता में आने के महज तीन महीने बाद ही भाजपा सरकार के भीतर से भ्रष्टाचार और रंगदारी के खिलाफ आवाज़ें बुलंद होने लगी हैं। नगर विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने खुले तौर पर सोशल मीडिया पर जनता को चेताया कि उनके नाम पर बाजारों से पैसे वसूले जा रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि यदि कोई उनके या मुख्यमंत्री के नाम पर कट मनी या गुंडा टैक्स लेता है, तो तुरंत सूचना दें, कार्रवाई होगी।

यह बयान उस समय आया है जब कुछ ही दिन पहले पांडवेश्वर से भाजपा विधायक जितेंद्र तिवारी ने अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया था कि वे वसूली और दबंगई में तृणमूल कांग्रेस से भी आगे निकल गए हैं। तिवारी का यह आत्मालोचनात्मक स्वर पहले ही राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर चुका था। अब अग्निमित्रा पॉल की चेतावनी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस भी आंतरिक उथल-पुथल से गुजर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार निशाने पर हैं। उनके खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई जारी है, पार्टी कार्यालय पर बुलडोज़र चला दिया गया है, और विधानसभा चुनाव में हार के बाद वे बगावत और कानूनी संकटों से घिरे हुए हैं। अभिषेक ने चुनौती दी है कि यदि उनके कारण पार्टी से गए 60 विधायक और 20 सांसद ममता बनर्जी के पास लौट आते हैं, तो वे तुरंत इस्तीफ़ा दे देंगे।

इस पूरे परिदृश्य में एक दिलचस्प समानता दिखती है, सत्ता में रहते हुए भी नेताओं को अपनी ही पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार और वसूली के खिलाफ आवाज़ उठानी पड़ रही है। भाजपा के भीतर जितेंद्र तिवारी और अग्निमित्रा पॉल की नाराज़गी यह संकेत देती है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी राजनीतिक संस्कृति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। वहीं तृणमूल कांग्रेस में अभिषेक बनर्जी की चुनौती यह दर्शाती है कि विपक्ष भी आंतरिक संकट से जूझ रहा है।

गौर करें तो ये पायेंगे कि बंगाल की राजनीति अब केवल सत्ता परिवर्तन का खेल नहीं रह गई है। बूनीयादी सवाल यह है कि ठक्या कोई भी दल जनता को उस भ्रष्टाचार और रंगदारी से मुक्त कर पाएगा,” जो वर्षों से राजनीतिक ढांचे में गहराई तक पैठ बना चुका है। नेताओं की आत्मालोचना और सार्वजनिक चेतावनियाँ तभी सार्थक होंगी जब वे ठोस कार्रवाई में बदलें। अन्यथा यह केवल बयानबाज़ी रह जाएगी, और जनता के लिए राजनीति वही पुराना बोझ बनी रहेगी।