अमित पांडे: संपादक
बहस तो इस बात पर भी है कि जीडीपी की विकास दर की कीमत कौन लोग चुका रहे हैं? ये वो लोग हैं जो अपने ही देश में हर प्रकार का संघर्ष सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि उनको भी इंसान मान लिया जाए, न सिर्फ इसलिए कि वो वोट देते हैं, बल्कि इसलिए भी कि वो अर्थशास्त्र की परिभाषा के हिसाब से तंत्र चलाने के लिए उतना ही आवश्यक हैं जितना कि उनके कॉरपोरेट्स। फर्क सिर्फ इतना है कि उनको नियमों के लिए जीना पड़ता है, और उनके लिए नियम बलिदान किए जाते हैं।
भारत में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है। यह खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि इसे पाटना अब लगभग नामुमकिन हो चुका है। परिणामस्वरूप, भारत की रीढ़ कहा जाने वाला मध्यवर्ग हताशा का शिकार है। गौरतलब है कि एचएनआई (हाई नेट-वर्थ इंडिविजुअल) उन लोगों को माना जाता है जिनके पास अपनी तमाम देनदारियों के बाद 10 लाख डॉलर, यानी लगभग 9.5 करोड़ रुपया या उससे अधिक मूल्य की कोई ऐसी संपत्ति हो जिसे जब चाहें नकदी में बदला जा सके। भारत में ऐसी स्थिति सिर्फ और सिर्फ धातुओं की है, जिनमें सोना, चांदी, हीरा और भी शामिल हैं। पर सवाल उठता है कि कितने प्रतिशत लोग, या भारत की कितनी बड़ी आबादी, इस किस्म की हैसियत रखती है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल की तुलना में इस साल उनके प्रतिशत में भारी गिरावट आई है — जहां 2021 से 2023 के बीच यह प्रतिशत 9.5 था, वहीं उसके बाद सिर्फ 6.5 प्रतिशत रह गया है। यह करिश्मा तब है जब सरकार खुले तौर पर हर प्रकार की आजादी दे रखी है। मजदूरों को बंधुआ मजदूर बनाकर काम कराने से लेकर बाजार व्यवस्था को ठीक करने के नाम पर हर प्रकार का सरकारी गबन व लूट होने के बावजूद, इस प्रकार का नतीजा शंका पैदा करने वाला है — क्या सचमुच हम इतने पीछे जा रहे हैं, और जिम्मेदारों को सिर्फ जुमलेबाजी याद रहती है?
यह सोचने की बात है कि हमने अपने हर प्रकार के आत्यंतिक खर्च की कटौती करके उद्योगपतियों को हर प्रकार की रियायतें दीं, खुली लूट भी करने दी, नियामक संस्थाओं को चुप करा दिया — इसके बावजूद हमारी प्रगति, जो सामूहिक तौर पर 2014 के बाद थी ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी टिक नहीं रही। इन कारणों की पड़ताल करने की जरूरत है — कहीं ऐसा तो नहीं कि जिनको देश के नाम पर जिस लूट की आजादी दी गई, वो अपना भला भी नहीं कर पा रहे?
पिछले कुछ दिनों से मध्य एशिया में युद्ध की वजह से पूरी दुनिया के शेयर बाजार धड़ाम हो गए, भारत के बाजार की हालत भी ठीक नहीं रही। विदेशी निवेशक और बड़े पूंजीपति जोखिम लेने से बचते रहे, पर मध्यवर्ग और निम्न-मध्य वर्ग ने बाजार में आस्था दिखाते हुए बाजार को संभाले रखा। बाजार में जो कुछ भी रौनक या काम-चलाऊ स्थिति दिख रही है, वह उन्हीं छोटे निवेशकों की बदौलत है जिनका एकमात्र आसरा और आस्था बाजार है। मजेदार यह है कि अब सरकार भी यह जान गई है कि विदेशी निवेशक और बड़े घराने इस समय निवेश नहीं करेंगे, लेकिन जो निवेश कर रहे हैं उन्हें राहत देने के बजाय ऐसे नियमों का दौर जारी किया गया जो सोचने पर मजबूर करता है कि हमें बाजार और निवेश रखना है या बंद कर देना है।
चुनाव का असली मुद्दा सिर्फ और सिर्फ राजनीति का होता है — आम लोगों में इसका प्रभाव सिर्फ वोट देने और पार्टी को जिताने तक सीमित रहता है। लेकिन एसआईआर के बाबत यह कहना कि जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं, उसकी नागरिकता ही चुनौती में है, आश्चर्य की हर पराकाष्ठा को पार कर जाता है। माना कि बहुतों का नाम इस जगलरी में काट दिया गया होगा। जब माननीय अदालत यह कह रही है कि वोट अगली बार दे लेना, तो ऐसे नियमों का क्या औचित्य है? पर सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं — उसे बस इस बात से फर्क पड़ता है कि बाजार की स्थिरता देश के सम्मान और प्रभुत्वसंपन्न होने की निशानी है।
मुझे याद है कि महज आज से 20-30 साल पहले तक कोई भी पाकिस्तान से बड़ी डील खरीद या बेच नहीं करता था; पैसे देने पर भी कोई दूसरा देश उससे व्यापार नहीं करता था। यह हल्ला था कि यह बैंकरप्ट देश है और दान पर काम चलाता है। पाकिस्तान ने हालात की नजाकत को समझा, विदेश नीति पर मेहनत की, और चीन व अमेरिका — दोनों से ही लाभ लेने लगा। आज जो अमेरिका भारत को हाई-वैल्यू लोन देता है, वही पाकिस्तान को डोनेशन देता है, उसकी आर्थिक गतिविधियां बढ़ाता है और हालात ठीक करने की दिशा में काम करता है। भारत की नीति अभी तक समझ में आने लायक नहीं लगी — आखिर अपने ही लोगों में अफरा-तफरी करके हम क्या हासिल कर पाएंगे?
अक्सर यह कहा जाता है कि भारत को अगर ग्रोथ करनी है तो युवा शक्ति को काम के लिए प्रोत्साहित करना होगा और जिम्मेदार बनाना होगा। हालांकि भारत का युवा मंदिर बनाने के लिए चंदा जुटाने, गोरक्षा समिति का सदस्य होने, सेल्फी लेने और जुगाड़ करने में माहिर हो चुका है। पूरा सोशल मीडिया उनके क्रांतिकारी नारों से पटा पड़ा मिलेगा — फिर उसे कहां समय है कि इन बातों पर सोचे। सोच विकसित करने तक ले जाने वाले जिस वैज्ञानिक माहौल की जरूरत थी, वह अब भक्ति भाव में निष्काम जीवन बिताने के संकल्प में बदल चुका है। हालांकि सरकारी एजेंसियां यह भी कह रही हैं कि जितने भी बड़े मंदिर हैं, वहां चढ़ावे में चोरी-डकैती लंबे समय से चल रही है — उत्तराखंड के बीकेटीसी में चोर पकड़ा गया है और घपले में कुछ सरकारी लोग भी शामिल हैं। इससे इंकार करना मुश्किल है, पर सरकार है, वो इसे भी संभाल ही लेगी — जैसे अब तक के घपलों को संभालती आई है।
सवाल बड़ा मौलिक है — अगर हम समस्या जान गए हैं तो समाधान की कोशिश क्यों नहीं करते? जवाब अभी तक नहीं है कि जिन हाथों को काम मिल जाना था, जिन्हें उत्साहित करना था, वो गोरक्षक बनकर क्या कर रहे हैं, जबकि सरकार कह रही है कि बीफ निर्यात में हम दुनिया के अग्रणी देशों में हैं। जरूरत इस बात की है कि लोग अपने नेतृत्व पर यकीन करें, बलवाई होने और जुगाड़ू होने पर नहीं। यह आश्चर्य नहीं कि दुनिया के देश बड़े संकट से ग्रस्त हैं — एआई के बाद नौकरी को खतरा उन लोगों के लिए है जो दक्ष हैं, हमारे यहां तो इसकी परंपरा ही नहीं डाली गई। बेरोजगारी चरम पर है, कितने दिन सरकार अपने राशन के बहाने इसे पालती रहेगी, और अंत में एक अंतहीन मुकाबला शुरू होगा — बेहतर है कि प्रयास अभी से हो। आर्थिक असमानता का बढ़ना सिर्फ राष्ट्र के लिए नहीं, समाज और संस्कृति के लिए भी घातक है।












