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क्या राष्ट्रीय हित से बड़ा दलगत अहंकार हो सकता है? 

News Desk by News Desk
January 24, 2026
in संपादकीय
क्या राष्ट्रीय हित से बड़ा दलगत अहंकार हो सकता है? 
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अमित पांडे: संपादक

भारतीय राजनीति में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब देश की सुरक्षा और अस्तित्व दांव पर हो, तब क्या राजनीतिक दलों के बीच की खींचतान मायने रखती है। शशि थरूर का हालिया वक्तव्य इसी प्रश्न को फिर से जीवित करता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को पाकिस्तान के साथ किसी दीर्घकालिक संघर्ष में नहीं उलझना चाहिए, बल्कि कार्रवाई केवल आतंकवादी ठिकानों तक सीमित रहनी चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से, सरकार ने वही किया जो उन्होंने सुझाया था। यह तथ्य अपने आप में एक बहस को जन्म देता है कि क्या राष्ट्रीय हित के क्षणों में राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर दिया जाना चाहिए।  

थरूर के बयान के साथ ही यह चर्चा भी तेज़ हुई कि क्या उनकी पार्टी नेतृत्व से दूरी बढ़ रही है। राहुल गांधी द्वारा हाल ही में कोच्चि में उन्हें पर्याप्त मान्यता न देने की अटकलें और राज्य नेतृत्व द्वारा उन्हें हाशिये पर धकेलने की कोशिशें इस बहस को और गहरा करती हैं। लेकिन थरूर ने साफ कहा कि संसद में उनका रिकॉर्ड पार्टी की घोषित नीतियों के साथ पूरी तरह संगत है। यह तर्क महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में व्यक्तिगत असहमति और दलगत अनुशासन के बीच संतुलन हमेशा से चुनौती रहा है।  

ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो यह बहस नई नहीं है। जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद कहा था—“Who lives if India dies?” यानी यदि भारत ही न रहे तो किसी का अस्तित्व नहीं बचेगा। यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जब भारत की सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा दांव पर हो, तब दलगत राजनीति को पीछे हटना ही चाहिए। 1962 के चीन युद्ध के समय भी विपक्ष ने सरकार की आलोचना की थी, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर एकजुटता दिखाई थी। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में भी विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व का समर्थन किया था। यह परंपरा बताती है कि राष्ट्रीय हित के क्षणों में राजनीतिक मतभेद गौण हो जाते हैं।  

आज के संदर्भ में देखें तो भारत की अर्थव्यवस्था विकास पर केंद्रित है। IMF और विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि भारत की GDP ग्रोथ 2025-26 में 6.5% रहने का अनुमान है। लेकिन बेरोजगारी दर दिसंबर 2025 में 4.8% तक पहुँच गई, शहरी युवाओं में यह 6.7% रही। ऐसे में किसी दीर्घकालिक युद्ध या संघर्ष का बोझ अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर सकता है। थरूर का सुझाव कि कार्रवाई केवल आतंकवादी ठिकानों तक सीमित होनी चाहिए, आर्थिक दृष्टि से भी व्यावहारिक है। लंबे युद्ध से न केवल वित्तीय घाटा बढ़ेगा बल्कि सामाजिक अस्थिरता भी गहराएगी।  

यहाँ सवाल उठता है कि जब थरूर जैसे वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने की बात करते हैं, तो क्या पार्टी नेतृत्व को उनके योगदान को नज़रअंदाज़ करना चाहिए? क्या यह उचित है कि व्यक्तिगत अहंकार या आंतरिक राजनीति के चलते एक अनुभवी सांसद को हाशिये पर धकेला जाए? कांग्रेस नेतृत्व ने आधिकारिक तौर पर किसी मतभेद से इनकार किया है। शफी परम्बिल और दीपा दासमुंशी ने कहा कि थरूर पार्टी से खुश हैं और कोई विवाद नहीं है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह केवल सतही बयान है, वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।  

भारतीय राजनीति में यह प्रवृत्ति बार-बार दिखती है कि जब कोई नेता स्वतंत्र सोच प्रस्तुत करता है, तो उसे “अलगाववादी” या “असंतुष्ट” करार दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र का सार ही यही है कि विभिन्न दृष्टिकोणों को स्थान मिले। यदि संसद में थरूर का रिकॉर्ड पार्टी की नीतियों के अनुरूप है, तो उनके व्यक्तिगत विचारों को राष्ट्रीय हित के संदर्भ में महत्व क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?  

यहाँ एक और ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण है। 1999 के कारगिल युद्ध के समय विपक्ष ने सरकार की आलोचना की थी, लेकिन सैनिकों के मनोबल को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन किया था। आज भी यही अपेक्षा है कि जब आतंकवाद या सीमा सुरक्षा का प्रश्न हो, तो दलगत राजनीति को पीछे छोड़ दिया जाए। थरूर का बयान इसी परंपरा की पुनरावृत्ति है।  

आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि भारत का फिस्कल डेफिसिट 2025-26 में 4.4% पर लक्षित है, लेकिन संयुक्त केंद्रीय-राज्य घाटा 8-9% पर अटका हुआ है। ऐसे में किसी दीर्घकालिक युद्ध का खर्च इस घाटे को और बढ़ा देगा। रघुराम राजन ने दावोस में चेतावनी दी थी कि यदि प्रभावी सरकारी खर्च और मानव पूंजी निवेश नहीं हुआ तो फिस्कल डेफिसिट एक “डेट बम” बन जाएगा। इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए थरूर का सुझाव और भी तर्कसंगत लगता है।  

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या राष्ट्रीय हित से बड़ा दलगत अहंकार हो सकता है? यदि भारत की सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा दांव पर हो, तो क्या किसी पार्टी का आंतरिक विवाद मायने रखता है? थरूर का उदाहरण बताता है कि व्यक्तिगत असहमति के बावजूद राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जा सकती है। लेकिन यदि पार्टी नेतृत्व ऐसे योगदानों को नज़रअंदाज़ करता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के लिए खतरा है।  

अंततः, भारत को यह तय करना होगा कि वह किस रास्ते पर चलेगा। क्या हम दलगत राजनीति और व्यक्तिगत अहंकार को प्राथमिकता देंगे, या फिर नेहरू की उस चेतावनी को याद रखेंगे कि “यदि भारत मर गया तो कोई जीवित नहीं रहेगा”? जब देश की सुरक्षा और अस्तित्व का प्रश्न हो, तब हर दल, हर नेता और हर नागरिक को एक स्वर में कहना चाहिए—भारत पहले है।  

Tags: Indian political debatenational interest debate Indianational unity politicsopposition government stanceparty politics vs securityShashi Tharoor statement
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