राम, कृष्ण, बुद्ध के लघुचित्रों वाली संविधान की मूल प्रति उपलब्ध करायी जाये: धनखड़

Wasim24 January 20242 min read0 viewsदेश

नयी दिल्ली,24 जनवरी (कड़वा सत्य) उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संविधान को मूल रूप में उपलब्ध कराने का आह्वान करते हुए बुधवार को कहा कि आपातकाल भारतीय संवैधानिक यात्रा का सबसे काला और शर्मनाक समय है।
उपराष्ट्रपति ने यहां गणतंत्र के रूप में भारत के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में “हमारा संविधान हमारा सम्मान” अभियान का उद्घाटन करते हुए कहा,“ संविधान सभा के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित संविधान की प्रति हमारे बच्चों को नहीं मिल पाती है। यह बहुत दुख की बात है। संविधान की मूल प्रति में 22 लघु चित्र हैं, जिन्हें संविधान के प्रत्येक भाग से पहले सोच-समझकर रखा गया है। इन लघुचित्रों के माध्यम से, संविधान के संस्थापकों ने हमारी पांच हजार साल पुरानी संस्कृति का सार व्यक्त किया है।”
उन्होंने कहा कि इन चित्रों को आम जनता नहीं देख पा रही है क्योंकि ये संविधान की प्रचलित प्रतियों का हिस्सा नहीं है। उन्होंने केंद्रीय कानून मंत्री से यह सुनिश्चित करने के लिए पहल करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा,“ देश को उसके प्रामाणिक रूप में संविधान उपलब्ध कराया जाए, जैसा कि हमारे संस्थापकों ने हमें दिया था। संविधान के मौलिक अधिकारों के भाग में श्री राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या लौटने का लघु चित्र है।”
उपराष्ट्रपति ने मौलिक अधिकारों को लोकतंत्र की सर्वोत्कृष्टता और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक अभिन्न पहलू बताया और कहा कि यदि कोई मौलिक अधिकारों का आनंद नहीं लेता है तो वह लोकतंत्र में रहने का दावा नहीं कर सकता है।
अयोध्या में राम लला के प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान समारोह को एक ऐतिहासिक क्षण बताते हुए श्री धनखड़ ने कहा, “ नियति के साथ साक्षात्कार और आधुनिकता के साथ साक्षात्कार के बाद, हमने 22 जनवरी, 2024 को देवत्व के साथ साक्षात्कार किया।” उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण एक बहुत लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया थी लेकिन इसे कानून के अनुसार हासिल किया गया और यह दर्शाता है कि देश कानून के शासन में विश्वास करता है।
आपातकाल की घोषणा को संवैधानिक यात्रा का सबसे काला और शर्मनाक काल बताते हुए श्री धनखड़ ने कहा कि इसने लाखों लोगों को जेल में डालकर उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया। उन्हाेंने कहा, “हमें उम्मीद थी कि न्यायपालिका इस अवसर पर आगे आएगी, दुर्भाग्य से न्यायपालिका के लिए भी, यह सबसे अंधकारमय अवधि में से एक है। ”
मौलिक कर्तव्यों को संविधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए, उपराष्ट्रपति ने सभी से मौलिक कर्तव्यों का पालन करने की अपील की और कहा,“ यह हमें अच्छा नागरिक बनाता है।”
सत्या,आशा

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