दिल्ली में चल रहे Cockroach Janta Party (CJP) के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन ने देश की राजनीति को हिला दिया है। 20 जून से जंतर मंतर पर शुरू हुआ यह आंदोलन अब राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर है और सरकार की प्रतिक्रिया ने लोकतंत्र की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

सबसे पहले, दिल्ली के उपराज्यपाल तरंजीत संधू ने केंद्र सरकार के कहने पर दिल्ली पुलिस को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत किसी भी व्यक्ति को एक साल तक बिना अदालत में पेश किए हिरासत में रखने की शक्ति 18 अक्टूबर तक बढ़ा दी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया जब छात्र आंदोलन अपने चरम पर है। विपक्ष ने इसे असहमति दबाने का प्रयास बताया। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।

एनएसए का इस्तेमाल सामान्यतः आतंकवाद या राष्ट्रीय रक्षा से जुड़े मामलों में होता है। लेकिन छात्रों पर इसे लागू करने की संभावना ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर गहरी चिंता पैदा की है। यह वही युवा हैं जो देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिनका भविष्य बार बार होने वाले परीक्षा पेपर लीक से बर्बाद हो रहा है।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि पेपर लीक मामलों में दोषियों को सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि युवाओं का भविष्य सर्वोपरि है। लेकिन छात्रों और विपक्ष ने इसे “घाव पर पट्टी” लगाने जैसा बताया। CJP संस्थापक अभिजीत दीपके और प्रतिनिधि अशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि असली समस्या पर कोई चर्चा नहीं हो रही है - क्यों पेपर लीक होते हैं और कौन जिम्मेदार है ?उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार और अक्षमता फैली हुई है, और इसे एक “संगठित माफिया” चला रहा है। जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जैसे जिम्मेदार लोग पद पर बने रहेंगे, तब तक लीक रुकने वाले नहीं हैं।

विपक्ष ने भी प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया को अपर्याप्त बताया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से कब्जे में लेकर नष्ट कर दिया है और जिम्मेदार लोगों को बचा रही है। उन्होंने प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी कहा कि प्रधानमंत्री संसद में सीधे चर्चा से बच रहे हैं और केवल सोशल मीडिया पर बयान दे रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू है : मीडिया की भूमिका। कई चैनलों ने आंदोलन को बाहरी फंडिंग से जोड़ने की कोशिश की, इसे खालिस्तानी और पाकिस्तान समर्थित बताया। लेकिन छात्रों और शिक्षाविदों ने इसे बदनाम करने की साजिश कहा। सोनम वांगचुक की पत्नी गितांजलि अंगमो ने लिखा कि छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण है और उन्हें गलत तरीके से हिंसा से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि हमारा सिस्टम अपने ही छात्रों पर इतना जल्दी शक क्यों करता है।

स्पष्ट है कि सरकार एक तरफ संवाद का प्रस्ताव दे रही है, दूसरी तरफ पुलिस को कठोर शक्तियाँ दे रही है। यह दोहरी रणनीति लोकतंत्र की आत्मा पर चोट करती है। छात्रों का कहना है कि वे गांधी के रास्ते पर हैं. अहिंसा और धैर्य के साथ। लेकिन जब उनकी आवाज़ को राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा बताया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना बन जाती है।

CJP आंदोलन केवल परीक्षा लीक का विरोध नहीं है, यह युवाओं का विश्वास और भविष्य बचाने की लड़ाई है। एनएसए जैसी कठोर धारा का प्रयोग और शिक्षा मंत्री को बचाने की जिद सरकार की नीयत पर सवाल उठाती है। विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है, जबकि छात्र इसे अपने अधिकारों की लड़ाई मान रहे हैं। असली सवाल यही है. क्या सरकार युवाओं की आवाज़ सुनेगी या उन्हें खामोश करने के लिए कठोर कानूनों का सहारा लेगी?