अमित पांडे: संपादक

आज दिनभर आंदोलन करने वाले युवाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। संसद कई बार के गतिरोध के बाद स्थगित हुई, जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का बयान भी शामिल था। जब वे आंदोलनरत युवाओं की समस्या और उन पर हो रही पुलिसिया कार्रवाई का ज़िक्र कर रहे थे, तभी संसद का सत्र कल तक के लिए स्थगित कर दिया गया। सवाल यह है कि क्या संसद में माननीय सदस्य भी अपनी बात रख पाने में असमर्थ हैं? अगर ऐसा है तो आम लोगों की बात कौन और किस प्रकार कह सकेगा?

सरकार की तैयारी अपने कई महत्वपूर्ण बिल सदन में पास कराने की है। इनमें परिसीमन और महिला आरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन ये दोनों ही बिल आज सदन में नहीं रखे गए। जानकार मानते हैं कि सरकार की तैयारी पूरी नहीं है और वह सहयोगी दलों को विश्वास में लेना चाहती है, ताकि बिल पास कराने के लिए आवश्यक संख्या की व्यवस्था हो सके। हालांकि सरकार के प्रतिनिधि और सहयोगी दलों के जाने‑माने नेता इसके लिए अपने हिसाब से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन शायद भरोसा पक्का नहीं है। इसी कारण दोनों ही महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी विधेयक आज सदन में नहीं रखे गए।

संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही सरकार ने दो अहम विधेयक पेश किए। पहला था सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव है। दूसरा था राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026, जिसमें राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के अपमान को अपराध मानते हुए तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया है।

सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है, इसलिए अतिरिक्त जजों की नियुक्ति जरूरी है। वहीं, राष्ट्रीय गीत पर सख्ती को वह राष्ट्रीय गौरव की रक्षा बता रही है।

लेकिन विपक्ष का रुख अलग है। कांग्रेस और अन्य दलों ने कहा कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष का आरोप है कि जब लाखों छात्रों का भविष्य नीट परीक्षा लीक से प्रभावित हुआ है और बेरोजगारी चरम पर है, तब सरकार भावनात्मक मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। विपक्ष ने यह भी कहा कि सरकार पहले ही अध्यादेश के जरिए जजों की संख्या बढ़ा चुकी है, अब संसद में विधेयक लाना केवल औपचारिकता है।

राज्यसभा में पेश राष्ट्रीय सम्मान विधेयक पर भी विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया। उनका कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है और युवाओं की समस्याओं से ध्यान हटाने का तरीका है।

सत्र के पहले दिन ही लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामा हुआ। विपक्ष ने नीट पेपर लीक और अयोध्या राम मंदिर दान विवाद जैसे मुद्दों पर जोरदार नारेबाजी की। कार्यवाही बार‑बार स्थगित करनी पड़ी।

संसद के बाहर भी माहौल गर्म रहा। जंतर‑मंतर पर 23 दिनों से धरना दे रहे छात्रों ने “चलों संसद” मार्च निकाला। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग की, लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कई प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव भी गिरफ्तार हुईं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के पास संख्यात्मक बहुमत है, इसलिए दोनों विधेयक पास होने की संभावना है। लेकिन विपक्ष ने जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार युवाओं की आवाज़ नहीं सुन रही है।

सवाल यह नहीं कि बहुमत का अंकड़ा किसके पास है, सवाल यह है कि उस बहुमत से लोग कितने संतुष्ट हैं और किसके पक्ष में हैं। सदन की ज़रूरत है कि वह NTA जैसे दागी संस्थान पर निर्णय ले, जो केवल 1860 एक्ट के तहत बिना ज़िम्मेदारी निभाए पूरे देश के तंत्र को खोखला कर रहा है। सरकार उस तरफ से निश्चिंत है और जो चल रहा है, उसी स्थिति का पालन कर रही है।

अगर सदन नहीं चला तो नुकसान आम जनता का है, जिसके टैक्स के पैसे से इतना भारी‑भरकम खर्च उठाया जा रहा है। क्यों कोई उसका मालिक बने और जनता के हित पर प्रभाव डाले? सभी नेता, चाहे जिस भी पार्टी के हों, अपनी तमाम ज़रूरतें जनता के पैसों से पूरी करते हैं, तो जनता पहले क्यों नहीं आएगी।

प्रतिपक्ष पर यह आरोप लगाना बड़ा आसान है कि सदन में हंगामा हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि सरकार क्या अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर रही है? ऐसा पहली बार नहीं हुआ। अटल जी की सरकार थी, 1999 में सदन नहीं चल पा रहा था। तब वे दुखी थे और सरकार को अपने नेतृत्व में चलाना नहीं चाहते थे। सुरजीत ने कहा कि आप ऑल पार्टी मीटिंग बुलाएँ और सबसे बात करें। उसके बाद सदन अपनी मर्यादा के साथ चला और काम भी हुआ।

जब सत्ता पक्ष विपक्ष को मर्यादा देने और शामिल करने से कतराने लगे, तो ऐसी स्थिति रहेगी। पर नुकसान हमेशा जनता का होगा, जिसके लिए वे चुने गए हैं।