श्रीनाथ दीक्षित, वरिष्ठ संवाददाता, दिल्ली
यूँ तो, अक्सर देखा गया है कि जब भी हम कोई काम करने की सोचते हैं; तो, शुरुआत में हम बहुत ही कॉन्फ़िडेंट होते हैं! लेकिन बीच-बीच में हम थोड़ा-सा घबरा जाते हैं या एकदम बोलते-बोलते अटक-से जाते हैं! ऐसे में कई बार हमें लगता है कि शायद अपनी बात को जल्दी से बताने की उत्सुकता के कारण ऐसा हुआ है और हम अपनी इस आदत की ओर ग़ौर भी नहीं करते और इसे हल्के में ले जाते हैं। क्यों? होता है ना आपके साथ भी कुछ ऐसा ही!
लेकिन, ज़रा संभलकर! क्योंकि, यह सिचुएशन सिर्फ़ जल्दबाज़ी के कारण नहीं; बल्कि, हो सकता है एक बीमारी का लक्षण! जी! हाँ! ऐसे में अगर आपके साथ भी होता है कुछ ऐसा ही; तो, शायद यह सिग्नल है नर्वसनेस का!
वैसे तो, यह कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं; लेकिन, इसकी अनदेखी डाल सकती है आपकी पर्सनैलिटी पर एक निगेटिव इंप्रैशन! घबराइए मत! इससे बचने के लिए आपको सिर्फ़ चैक-ऑउट करने हैं यह ख़ास प्वॉइंट्स और आप भी कह सकते हैं नर्वसनेस को गुडबाय थोड़ा स्टाइल में:
- बात करते-करते पैर हिलाना!
अक्सर होता है ना कुछ ऐसा ही कि जब हम किसी भी चीज़ या बात को लेकर थोड़े-से भी कॉन्शियस होते हैं; तो, अचानक हमारे पैर में एक अजीब-सी बेचैनी-सी होती है और हमारे पैर अपने आप ही हिलने या यूँ कहें कि रैस्टलैस हो जाते हैं।
यूँ तो, इस बात पर हमारा ध्यान नहीं जाता; लेकिन, सामने वाले को यह साफ़ पता चल जाता है कि आप इस पल के लिए हो चुके हैं नर्वसनेस के शिकार! ऐसे में कई बार आप कहना कुछ चाहते हैं और कह कुछ जाते हैं।

- बात करते समय अपनी अँगुलियों से कोई पैटर्न बनाना!
यह एक बहुत ही नॉर्मल पर्सनैलिटी ट्रेट होता है। अक्सर हम जब भी किसी काम को लेकर थोड़े-से टैंस्ड होते हैं; तो, अपने आप ही हम अपने दोनों हाथों को जोड़कर अँगुलियों से कोई पैटर्न बनाना शुरू कर देते हैं।
क्यों? सच है ना! इससे ना केवल सामने वाले की निगाहों में आपकी निगेटिव पर्सनैलिटी बनती है; बल्कि, आप अपना पूरा कॉन्फ़िडेंस खो चुके होते हैं! जो कि सीधा आपके काम और हैल्थ पर असर डालता है।
- बात करते समय बहुत तेज़ी से दूसरे व्यक्ति को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर देखना!
यह एक बहुत ही आम आदत होती है। आम तौर पर देखा जाता है कि जो भी व्यक्ति हमसे बात करते-करते तेज़ी से हमें ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर या दाँये और बाँये देखता है; तो, हम उसे चालाक समझने लगते हैं और सोचते हैं कि शायद वो एक ग़लत विचार वाला व्यक्ति है।
लेकिन, आपने यह कभी नहीं सोचा होगा कि आपके सामने ऐसे बिहेव करने वाले व्यक्ति को शायद ख़ुद आपसे बात करने में घबराहट हो रही होगी और वो भी आ चुका होगा नर्वसनेस नामक बीमारी के शिकंजे में!
- क्या हैं उपाय नर्वसनेस से लड़ने के?
- माइंड को डायवर्ट करें!
एक्सपर्ट्स की मानें; तो, नर्वसनेस नामक बीमारी का सीधा कनैक्शन होता है आपके ब्रेन से! जहाँ और जिस पल भी आपके दिमाग में कोई भी टेंशन दस्तक देती है; तो, अपने आप ही आपको घबराहट होने लगती है और आपकी घड़कनें तेज़ हो जाती हैं और आने लगते हैं आपको पसीने! जिसके कारण आपको कमज़ोरी महसूस होने लगती है।
ऐसे में अगर आपको भी लग रहा है कि आप भी आने वाले हैं नर्वसनेस के शिकंजे में; तो, तुरंत ही अपने दिमाग को किसी और काम में डायवर्ट कर लें।
- टेंशन को रखें दूर!
कहते हैं कि टेंशन कई बीमारियों की जननी है! इससे आपका दिमाग हर पल खोया-सा रहता है, जिसका सीधा असर आपकी हैल्थ पर पड़ता है। इसी कारण बोलते-बोलते आपकी ज़ुबान लड़खड़ा जाती है। जिसकी वजह से सामने वाले को यह लगता है कि शायद आप हकला रहे हैं!
तो, अपने आपको इस सिचुएशन से बचाने के लिए आप कर सकते हैं डीप-ब्रीथिंग, रिलैक्सेशन एक्सर्साइज़ और सेल्फ़-हिप्नोसिस और रख सकते हैं ख़ुद को टेंशन फ़्री!
- चैक-ऑउट करें अपने नर्वस होने वाले पलों को!
नर्वसनेस एक ऐसी बीमारी है, जो हमें भी नहीं पता चल पाता कि वो कब आ जाती है और कब और किस हद तक हमें अपना शिकार बना लेती है! डाॅक्टर्स की मानें; तो, टेंशन की वजह से हमारे दिमाग में कुछ ऐसे कैमिकल चेंजेस उत्पन्न हो जाते हैं; जो बहुत ही तेज़ी से हमारे दिमाग पर असर डालते हैं और इसी के चलते हम नर्वसनेस जैसी बीमारियों के शिकार बहुत ही आसानी से हो जाते हैं।
यूँ तो, हम कब और किस सिचुएशन में नर्वस होते हैं, इसका पता लगाना मुश्किल है। लेकिन, फिर भी अगर हम थोड़ी-सी कोशिश करें; तो, हम अपने उन पलों को थोड़ा ध्यान दें, जब हमें अचानक से टेंशन होने लगती है। ऐसा करने से हम ख़ुद को ना केवल डिप्रैशन या टेंशन से; बल्कि, नर्वसनेस जैसी बीमारियों से भी बचा सकेंगे!
- अपनी इस प्रॉब्लम को किसी क़रीबी के साथ डिस्कस करें!
हम जब भी थोड़े-से भी परेशान होते हैं; तो, हम एकदम अकेलेपन में ही रहना पसंद करते हैं! जिसके कारण हमारी वो ही छोटी-सी परेशानी एक बड़ी समस्या का रूप धारण कर लेती है। और, बदले में हमारी वही परेशानी सॉल्व होने के बदले और भी उलझती जाती है। और, इसी के चलते हम कई बार घबराहट के कारण बोलते-बोलते अटक-से जाते हैं।
क्यों? होता है ना कुछ ऐसा ही! भई! बड़े-बुज़ुर्गों की मानें; तो, उनके हिसाब से अगर आपको लगता है कि आप भी इस तरह की सिचुएशन से जूझ रहे हैं; तो, तुरंत ही अपने किसी क़रीबी से अपनी प्रॉब्लम को शेयर करें!
- क्या कहना है साॅयकोलॉजिस्ट्स का?
- डॉ. शिल्पी शर्मा,
क्लीनिकल सायकोलाॅजिस्ट
दिल्ली।
देखा जाए; तो, नर्वसनेस हमारे जीवन में घटे किसी-ना-किसी इंसीडैंट से जुड़ी होती है। क्योंकि, हमारे जीवन में कुछ ऐसे इंसीडैंट्स घटित होते हैं, जिनकी छाप हमारे दिमाग में जीवनभर के लिए रह जाती है।
अगर टेक्नीकली बात करें; तो, आपकी बाॅडी में बॉयो-साॅयको-सोशल मॉडल होता है। जो जेनेटिकली आपकी जीन्स से आप तक पास होता है। इस मॉडल में बॉयो का मतलब है आपकी जीन्स से; वहीं साॅयको का मतलब है कि आप किसी भी चीज़ को किस तरह से लेते और उससे डील करते हैं और वहीं सोशल का मतलब है कि आपके आसपास का वातावरण कैसा है और किस तरह के लोगों से आपका वास्ता पड़ता है। तो, ऐसे में आपकी एक अच्छी पर्सनैलिटी के लिए इन तीनों तथ्यों का प्रॉपर बैलेंस होना बेहद ज़रूरी है। अगर इस मॉडल में ज़रा-सी भी गड़बड़ होती है; तो, यह आपके अंदर साफ़ तौर पर दिखाई दे सकती है। इसके अलावा यह आपकी पर्सनैलिटी पर भी डिपैंड करता है कि आप किसी भी चीज़ और सिचुएशन को किस रूप में देखते और उससे डील करते हैं।
वैसे देखा जाए; तो, आज हम ख़ुद ही स्ट्रैसफ़ुलफ़ुल लाइफ़ जीने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे में हमारे दिमाग में लाखों ख़याल एक साथ घूमते रहते हैं, जिनकी वजह से हम कंफ़्यूज़्ड रहते हैं। यही कारण है कि हम बात करते-करते एकदम पिछले घटित हुए इंसीडैंट्स के बारे में सोचने लगते हैं और हाल ही में करने वाली बात को भूल-से जाते हैं। लेकिन, जैसे ही हमें ध्यान आता है; तो, हम एकदम हड़बड़ा जाते हैं और अटक-से जाते हैं।
यूँ तो, आज एक सायकाइट्रिस्ट के पास जाने को एक अभिशाप और बेइज़्ज़ती मानते हैं! लेकिन, अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं; तो, बिल्कुल भी देर ना करें और लें एक अच्छी सायकाइट्रिक हैल्प! इससे आप भी पाएँगे अपनी पर्सनैलिटी में एक अलग ही चेंज!






