Bihar Politics News: दो दशकों से अधिक समय से बिहार की सियासत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक ऐसी शख्सियत बने हुए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना उनके विरोधियों के लिए हर बार महंगा साबित हुआ है। जब-जब चुनाव का बिगुल बजा, नीतीश बाबू के विरोधी उनकी हार की भविष्यवाणी करने में जुट गए, लेकिन हर बार नतीजों ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया। चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा उपचुनाव, नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू ने हर मौके पर यह साबित किया कि बिहार की जनता का भरोसा उनके साथ अटूट है।
2024 का लोकसभा चुनाव: नीतीश की चाल ने तेजस्वी के दावों को धो डाला
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत को मुद्दा बनाकर खूब शोर मचाया। तेजस्वी का दावा था कि उनकी पार्टी आरजेडी बिहार में जेडीयू को धूल चटा देगी। लेकिन जब 4 जून 2024 को नतीजे आए, तो नीतीश बाबू ने 16 में से 12 सीटें जीतकर सबको हैरान कर दिया। बीजेपी से कम सीटों पर लड़ते हुए भी जेडीयू का स्ट्राइक रेट शानदार रहा। इस जीत ने न सिर्फ तेजस्वी के दावों की हवा निकाल दी, बल्कि नीतीश कुमार को केंद्र की एनडीए सरकार में किंगमेकर की भूमिका में ला खड़ा किया। बिहार की सियासत में नीतीश का यह दमखम देखकर विरोधी खेमे में हड़कंप मच गया।
उपचुनाव में भी नीतीश का जलवा, आरजेडी का किला ढहा
लोकसभा चुनाव के बाद हुए बिहार के चार विधानसभा उपचुनावों में भी नीतीश कुमार ने अपनी बादशाहत कायम रखी। तरारी, रामगढ़, बेलागंज और इमामगंज सीटों पर हुए उपचुनाव में एनडीए ने इंडिया गठबंधन को करारी शिकस्त दी। खास तौर पर बेलागंज सीट, जो 35 साल से आरजेडी का अभेद्य गढ़ मानी जाती थी, वहां जेडीयू की मनोरमा देवी ने आरजेडी के दिग्गज सुरेंद्र यादव के बेटे को 20,968 वोटों से पटखनी दी। तरारी में माले का किला ढहा तो रामगढ़ में आरजेडी के वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह के बेटे अजित सिंह तीसरे स्थान पर खिसक गए। यह उपचुनाव बिहार विधानसभा चुनाव से पहले का लिटमस टेस्ट था, जिसमें नीतीश बाबू ने बाजी मार ली और आरजेडी को शून्य पर समेट दिया।
हार से बौखलाए लालू-तेजस्वी, नीतीश को लुभाने की कोशिश में नाकाम
लगातार हार के बाद आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को समझ आ गया कि नीतीश कुमार के बिना बिहार में सत्ता का सपना अधूरा है। नए साल की शुरुआत में लालू ने नीतीश को गठबंधन का ऑफर देते हुए कहा, “हमारा दरवाजा खुला है, उन्हें भी खुला रखना चाहिए। अगर वो लौटना चाहें तो हम माफ कर देंगे।” लेकिन इस बयान से आरजेडी की किरकिरी हुई और तेजस्वी को इससे किनारा करना पड़ा। लालू का यह बयान नीतीश की ताकत का सबूत था, लेकिन यह भी दिखाता है कि आरजेडी के पास अब कोई ठोस रणनीति नहीं बची।
‘तेजस्वी की नाकामी का सबूत है नीतीश की सेहत पर हमला’
तेजस्वी यादव बार-बार नीतीश कुमार की सेहत को निशाना बनाते हैं, लेकिन बिहार की जनता इसे हर बार खारिज कर देती है। नीतीश सरकार ने बेरोजगारी, सड़क, बिजली और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर जो काम किया, उसकी वजह से तेजस्वी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं बचा। ऐसे में वे नीतीश की उम्र और सेहत को लेकर व्यक्तिगत हमले करते हैं, जो उनकी हताशा को ही उजागर करता है।
नीतीश की ताकत का राज: सामाजिक समीकरणों का जादू
नीतीश कुमार की सफलता का सबसे बड़ा आधार उनका सामाजिक गठजोड़ है। महिलाएं, महादलित, अतिपिछड़े और मुस्लिम वोटर नीतीश के साथ मजबूती से खड़े हैं। बीजेपी, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के साथ गठबंधन से सवर्ण और पासवान वोट भी उनके पाले में आते हैं। यह ऐसा मजबूत समीकरण है, जिसे तोड़ने की ताकत अभी तक न आरजेडी में दिखी और न ही इंडिया गठबंधन में।
इंडिया गठबंधन में दरार, नीतीश की ताकत से घबराहट
नीतीश के दम पर एनडीए की मजबूती देखकर इंडिया गठबंधन में फूट पड़ रही है। कांग्रेस ने लालू के करीबी अखिलेश सिंह को हटाकर नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया, जो लालू के दरबार में हाजिरी नहीं लगाता। कन्हैया कुमार की पदयात्रा और लालू की इफ्तार पार्टी में कांग्रेस नेताओं की गैरमौजूदगी ने गठबंधन की कमजोरी उजागर कर दी। लालू के ममता बनर्जी को विपक्ष का नेता बताने से राहुल गांधी नाराज हैं और आरजेडी को सबक सिखाने में जुटे हैं। जेडीयू नेता नीरज कुमार का तंज सटीक है, “लालू जी के ‘पाप कर्म’ का कोई भागीदार बनने को तैयार नहीं।”
नीतीश का जवाब: काम और परिणाम
प्रगति यात्रा में नीतीश कुमार ने जिलों का दौरा किया, योजनाओं की घोषणा की और विधानसभा सत्र में विपक्ष के सवालों का जवाब दिया। उनकी सक्रियता से साफ है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और मुख्यमंत्री की जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे हैं। तेजस्वी के दावे महज सियासी हथकंडे साबित हुए।
आने वाला समय भी नीतीश का
नीतीश कुमार की राजनीतिक चतुराई, सामाजिक आधार और जनता का भरोसा उन्हें बिहार का सियासी शहंशाह बनाए हुए है। आरजेडी और इंडिया गठबंधन की कमजोर रणनीति और आपसी फूट को देखते हुए आने वाले विधानसभा चुनाव में भी नीतीश बाबू का दबदबा कायम रहने के पूरे आसार हैं। विरोधी भले ही कितना शोर मचाएं, नीतीश हर बार चुपचाप अपनी चाल से बाजी पलट देते हैं।