सीबीआई द्वारा दिनांक 30.04.2026 को FIR संख्या RC2162026A0005 दर्ज किया जाना, जिसमें WAPCOS के पूर्व CMD श्री राजनीकांत अग्रवाल के विरुद्ध भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं तथा WAPCOS एवं NPCC जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। उक्त FIR में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 एवं 11 के अंतर्गत गंभीर अपराध दर्ज किए गए हैं।
किन्तु यह FIR कई अत्यंत गंभीर और चिंताजनक प्रश्न भी खड़े करती है, विशेषकर उन व्यक्तियों को जानबूझकर FIR से बाहर रखने को लेकर, जिनके नाम मूल शिकायतों, सतर्कता अभिलेखों तथा राजस्थान में दर्ज FIR में बार-बार सामने आते हैं। ये आरोप शिकायतों को दबाने, फर्जी वापसी पत्र (Fake Withdrawal Letters) तैयार करवाने, शिकायतकर्ताओं को डराने-धमकाने तथा अवैध धनराशि प्राप्त करने से संबंधित व्यापक आपराधिक साजिश की ओर संकेत करते हैं।
दिनांक 13.04.2023 की मूल शिकायत में स्पष्ट रूप से श्री सुमिर चावला (कॉरपोरेट ऑफिसर), श्री संजय बोहिदार (मुख्य अभियंता), श्री अवतार सिंह (सहायक प्रबंधक) तथा श्री पी.पी. भारद्वाज (हेड पर्सनल) सहित WAPCOS एवं NPCC के अन्य अधिकारियों के नाम दर्ज थे।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि इन अधिकारियों ने तत्कालीन CMD के हित में शिकायतों को दबाने, शिकायतकर्ताओं को धमकाने, फर्जी दस्तावेज तैयार करवाने तथा विभागीय प्रभाव का दुरुपयोग करने में सक्रिय भूमिका निभाई। शिकायतकर्ताओं एवं व्हिसलब्लोअर्स पर दबाव डालने हेतु फर्जी Withdrawal Letters का उपयोग किए जाने का भी उल्लेख किया गया था।
सतर्कता अभिलेखों में यह भी उल्लेखित है कि श्री आर.के. अग्रवाल द्वारा अपनी पत्नी श्रीमती दीप्ति अग्रवाल के नाम से संचालित खाते में WAPCOS एवं NPCC के ठेकेदारों से कथित अवैध धनराशि प्राप्त की जा रही थी। सतर्कता रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस खाते में प्राप्त लेन-देन, राशि, स्रोत एवं संबंधित वित्तीय विवरणों की गहन जाँच आवश्यक है। इसके बावजूद यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि सीबीआई FIR में श्रीमती दीप्ति अग्रवाल की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जबकि यह तथ्य आधिकारिक सतर्कता सामग्री का हिस्सा था जिसे सीबीआई को भेजा गया था।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सतर्कता रिपोर्ट में स्वयं यह दर्ज है कि थाना गुढ़ा, जिला झुंझुनूं, राजस्थान में FIR संख्या 51/2023 धारा 420, 506 एवं 120-B IPC के अंतर्गत निम्न व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज की गई थी:
- श्री आर.के. अग्रवाल
- श्री सुमिर चावला
- श्री संजय बोहिदार
- श्री अवतार सिंह
इन पर शिकायतकर्ताओं को धमकाने तथा फर्जी Withdrawal Letters का उपयोग करने के आरोप लगाए गए थे।
सतर्कता रिपोर्ट में राजस्थान उच्च न्यायालय में लंबित विभिन्न आपराधिक कार्यवाहियों का भी उल्लेख है, जो इन घटनाओं से संबंधित हैं।
इतने गंभीर आरोपों एवं दस्तावेजी सामग्री के बावजूद सीबीआई द्वारा दर्ज FIR में इन सभी व्यक्तियों को केवल “Unknown Public Servants” एवं “Unknown Private Persons” कहकर छोड़ दिया गया है, जबकि नाम केवल श्री राजनीकांत अग्रवाल का लिया गया है।
यह चयनात्मक कार्रवाई कई गंभीर प्रश्न उत्पन्न करती है:
- जब इन व्यक्तियों के नाम पूर्व शिकायतों, सतर्कता रिपोर्टों एवं FIR में स्पष्ट रूप से मौजूद हैं, तो उन्हें सीबीआई FIR में नामजद क्यों नहीं किया गया?
- शिकायतों को दबाने, फर्जी Withdrawal Letters तैयार करवाने एवं शिकायतकर्ताओं को धमकाने में कथित भूमिका को कमतर दिखाने का प्रयास क्यों किया गया?
- श्रीमती दीप्ति अग्रवाल के खाते में कथित अवैध धनराशि प्राप्त होने के आरोप, जो सतर्कता रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, उन्हें FIR से क्यों बाहर रखा गया?
- क्या प्रभावशाली अधिकारियों एवं मध्यस्थों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि पूरे मामले को केवल एक व्यक्ति तक सीमित दिखाया जा रहा है?
- जिन व्यक्तियों के नाम सतर्कता सामग्री में बार-बार सामने आए, उनकी भूमिका पर सीबीआई द्वारा कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया गया?
FIR के साथ संलग्न दस्तावेज स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि जल शक्ति मंत्रालय, WAPCOS के मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) तथा अन्य सतर्कता एजेंसियाँ इस व्यापक साजिश एवं इसमें शामिल अनेक अधिकारियों और मध्यस्थों की भूमिका से पूर्णतः अवगत थीं।
देश यह जानना चाहता है कि क्या यह जाँच वास्तव में WAPCOS एवं संबंधित संस्थाओं में फैले पूरे भ्रष्टाचार तंत्र को उजागर करेगी, या फिर केवल चयनात्मक कार्रवाई कर कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों को संरक्षण दिया जाएगा।
निष्पक्ष जाँच केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकती। मूल शिकायतों, सतर्कता रिपोर्टों एवं राजस्थान FIR में जिन-जिन व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं, उनकी भूमिका की निष्पक्ष एवं विस्तृत जाँच होना आवश्यक है।
चयनात्मक चुप्पी संस्थागत विश्वसनीयता को नष्ट करती है। केवल पारदर्शिता ही जनता का विश्वास पुनः स्थापित कर सकती है।










