अमित पांडे: संपादक
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति और विदेश नीति की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि टेक अरबपति एलन मस्क प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 24 मार्च को हुई फोन वार्ता में मौजूद थे। यह दावा असामान्य था क्योंकि दो राष्ट्राध्यक्षों की बातचीत में किसी निजी नागरिक का शामिल होना अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के खिलाफ है। भारत ने तुरंत इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कहा कि वार्ता केवल मोदी और ट्रंप के बीच हुई थी। लेकिन इस पूरे विवाद ने यह उजागर कर दिया है कि भारत की वैश्विक राजनीति में साख कितनी कमजोर हो चुकी है।
भारत का खंडन एक औपचारिक प्रतिक्रिया थी, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी रिपोर्टें क्यों बार-बार सामने आती हैं और क्यों भारत को बार-बार सफाई देनी पड़ती है। यह स्थिति बताती है कि भारत की विदेश नीति अब आत्मनिर्भरता और गरिमा से अधिक अमेरिकी दबाव और राजनीतिक सुविधा पर आधारित हो गई है। मोदी सरकार ने जिस तरह से अमेरिका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है, उसने भारत की स्वतंत्र आवाज़ को कमजोर कर दिया है।
ट्रंप और मोदी की बातचीत का विषय ईरान युद्ध था। अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा है। भारत, जो परंपरागत रूप से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलता रहा है, अब अमेरिकी एजेंडे के साथ खड़ा दिखाई देता है। यही कारण है कि जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने मस्क की मौजूदगी का दावा किया, तो यह केवल एक तकनीकी विवाद नहीं था बल्कि भारत की साख पर चोट थी।
मस्क का नाम इस वार्ता में क्यों आया, यह स्पष्ट नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि उनकी मौजूदगी ट्रंप के साथ रिश्तों में सुधार का संकेत है। लेकिन भारत के लिए यह अपमानजनक है कि उसकी सर्वोच्च नेतृत्व की वार्ता में किसी निजी व्यक्ति की मौजूदगी की खबरें फैलें। यह भारत की संप्रभुता और गरिमा पर सीधा सवाल है।
मोदी सरकार ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह खंडन केवल औपचारिकता है। असली समस्या यह है कि भारत की विदेश नीति अब इतनी निर्भर हो चुकी है कि उसकी स्वतंत्रता पर संदेह करना आसान हो गया है। जब भारत अमेरिकी दबाव में बार-बार झुकता है, तो उसकी साख कमजोर होती है। यही कारण है कि आज भारत को “विश्व राजनीति में आत्मसमर्पण करने वाला राष्ट्र” कहा जा रहा है।
भारत की राजनीति में यह स्थिति नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में संसद और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठे हैं। अब विदेश नीति भी उसी दिशा में जाती दिख रही है। मोदी सरकार ने बार-बार अमेरिका के साथ खड़े होने का दावा किया है, लेकिन यह खड़ा होना भारत की स्वतंत्रता और गरिमा की कीमत पर हो रहा है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने यह भी दिखाया कि अमेरिका भारत को केवल एक सहयोगी नहीं बल्कि एक अनुयायी के रूप में देखता है। जब किसी निजी व्यक्ति की मौजूदगी को लेकर विवाद उठता है, तो यह संकेत है कि भारत की आवाज़ अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रही। यह स्थिति भारत की वैश्विक राजनीति में साख को खत्म कर रही है।
भारत का खंडन सही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि भारत कब तक अमेरिकी दबाव में अपनी स्वतंत्रता खोता रहेगा। अगर भारत को विश्व राजनीति में सम्मान चाहिए, तो उसे अपनी आवाज़ को स्वतंत्र और मज़बूत बनाना होगा। वरना भारत की पहचान केवल एक अनुयायी राष्ट्र की रह जाएगी।
यह विवाद केवल एक रिपोर्ट का मामला नहीं है। यह भारत की विदेश नीति की दिशा का संकेत है। अगर भारत अपनी साख बचाना चाहता है, तो उसे अमेरिकी दबाव से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र नीति बनानी होगी। वरना भारत की पहचान केवल एक अनुयायी राष्ट्र की रह जाएगी।
मोदी सरकार के आलोचक कहते हैं कि यह घटना भारत की “साख का पतन” है। एक ओर सरकार दावा करती है कि भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है, दूसरी ओर उसकी विदेश नीति इतनी कमजोर है कि किसी भी विदेशी मीडिया रिपोर्ट से उसकी गरिमा पर सवाल उठ जाते हैं। यह विरोधाभास भारत की राजनीति को खोखला बना रहा है।
अमेरिका के साथ संबंधों में भारत की भूमिका अब “समान साझेदार” की नहीं बल्कि “अनुयायी” की हो गई है। यही कारण है कि जब मस्क का नाम सामने आया, तो भारत को तुरंत सफाई देनी पड़ी। लेकिन सफाई देने से साख नहीं बचती। साख तभी बचती है जब राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता और गरिमा पर अडिग रहे।
यह विवाद भारत के लिए चेतावनी है। अगर भारत अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र नहीं बनाएगा, तो उसकी पहचान केवल एक अनुयायी राष्ट्र की रह जाएगी। और यही वह स्थिति है जिसे आलोचक “मोदी का आत्मसमर्पण” कहते हैं।











