- एडीजी (सीआईडी) पारसनाथ ने प्रेस वार्ता में दी विस्तृत जानकारी, कई तरह की तकनीकों का हो रहा तेजी से उपयोग
- 6 बैच में 2018 पुलिस पदाधिकारियों को वैज्ञानिक अनुसंधान के विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों का दिया जा चुका है प्रशिक्षण
पटना, 18 मई। अपराध को नियंत्रित करने का सशक्त माध्यम अपराधियों पर समुचित नकेल कसना है। इसके लिए आपराधिक मामलों का वैज्ञानिक अनुसंधान करते हुए कम समय में वास्तविक दोषियों पर कार्रवाई करवाना प्रमुख पहल है। इसी कवायद के अंतर्गत सीआईडी (अपराध अनुसंधान विभाग) के स्तर से 12 दिवसीय एक खास ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। पिछले वर्ष से अब तक 6 बैच में 2018 पुलिस पदाधिकारियों को ट्रेनिंग मुहैया करा दी गई है। यह जानकारी एडीजी (सीआईडी) पारसनाथ ने सोमवार को पुलिस मुख्यालय सरदार पटेल भवन के सभागार में आयोजित प्रेस वार्ता में दी। उन्होंने कहा कि आने वाले 5 से 6 महीने पुलिस का पूरा अनुसंधान डिजिटल करने की योजना है। इसके मद्देनजर अपराध अनुसंधान में कई स्तर पर डिजिटल एप का उपयोग बढ़ाने के साथ ही डाटा अपडेट करने और ऑनलाइन मॉनीटरिंग की पूरी व्यवस्था की गई है।
एडीजी ने कहा कि गुणवत्तापूर्वक अनुसंधान के लिए पोर्टल और एप का उपयोग किया जा रहा है। इनकी समुचित ट्रेनिंग पुलिस पदाधिकारियों को दी जा रही है। सभी थाना स्तर पर सीसीटीएनएस (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम) का समुचित उपयोग अनुसंधानकर्ता के स्तर से किया जा रहा है। वर्तमान में 968 थाने इससे जुड़े हुए हैं। जल्द ही बचे हुए सभी थानों को इससे जोड़ लिया जाएगा। इसकी मदद से एफआईआर, केस डायरी, चार्जशीट, अंतिम प्रपत्र समेत अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों की विवरणी ऑनलाइन देखी जा सकती है। इस वर्ष जनवरी में सीसीटीएनएस पर दर्ज एफआईआर की संख्या 26 हजार 335 थी, जो अप्रैल में बढ़कर 26 हजार 981 हो गई है। इसी तरह चार्जशीट की संख्या जनवरी में 26 हजार 660 से बढ़कर अप्रैल में 37 हजार 631 हो गई है। केस डायरी इंट्री के मामले में अप्रैल में बढ़कर 1 लाख 14 हजार 552 हो गई है।
अन्य पोर्टल का उपयोग कर अपडेट किया जा रहा डाटा
एडीजी ने कहा कि अन्य पोर्टल या एप का उपयोग कर अपराध अनुसंधान से जुड़े आंकड़े निरंतर अपडेट किए जा रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्र के लिए अलग ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है। ई-साक्ष्य की मदद से अनुसंधान के दौरान एकत्र किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की सुचिता एवं पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। यह भारत सरकार के स्तर से तैयार किया गया खास पोर्टल है। जनवरी से अप्रैल तक इस पर 68 हजार 844 केसों के दस्तावेज अपलोड कर दिए गए हैं और इनमें 13 हजार 587 को एफआईआर से जोड़ भी दिया गया है।
इसी तरह मिशन वात्सल्य पोर्टल पर गुमशुदा या पीड़ित नाबालिग बच्चों का पूर्ण विवरण एवं फोटो अनिवार्य रूप से दर्ज करना होता है। ताकि उसे खोजने में सुविधा हो। ई-प्रिजन, एक ऑनलाइन जेल प्रबंधन प्रणाली है। इससे जेलों और कैदियों से संबंधित सभी कार्यों का कंप्यूटर के माध्यम से एकत्र किया जाता है। आईसीजेएस (इंटर-ऑपरेवल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) की मदद से सभी पांच जरूरी विभागों कोर्ट, पुलिस महकमा, एफएसएल, हॉस्पिटल समेत अन्य को आपस में समन्वय स्थापित करने में सहूलियत होती है।
इनके अतिरिक्त एनएएफआईएस (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के स्तर से बनाए गए वेब आधारित फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली का उपयोग अपराधियों या संदिग्धों के फिंगर प्रिंट एकत्र करने के लिए किया जाता है। ताकि इनका डिजिटल तरीके से मिलान किसी केस के अनुसंधान में किया जा सके। ऐसे अन्य कई प्रयासों से पुलिस को डिजिटल तरीके से सशक्त करते हुए अपराध अनुसंधान की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल करने की कवायद जारी है।












