अमित पांडे: संपादक
भारत ने हरियाणा के जिंद–सोनीपत सेक्शन पर देश की पहली हाइड्रोजन संचालित ट्रेन को मंजूरी देकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और राजनीतिक उपलब्धि का प्रतीक है। दस कोच वाली यह हाइड्रोजन डीईएमयू ट्रेन 75 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति से चलेगी और इसके लिए जिंद में हाइड्रोजन स्टोरेज व रिफ्यूलिंग यूनिट स्थापित की गई है।
हाइड्रोजन ट्रेन का सबसे बड़ा विकासात्मक स्कोर यह है कि यह शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक है। भारत जैसे देश, जहां प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय हैं, वहां यह परियोजना पर्यावरणीय दृष्टि से क्रांतिकारी है। यूरोप में जर्मनी ने 2018 में पहली बार हाइड्रोजन ट्रेन चलाई थी और आज फ्रांस, जापान तथा चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत का यह कदम उन्हें टक्कर देने वाला है और यह दिखाता है कि देश अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीकी नवाचार का निर्माता भी बन रहा है।
| देश | पहली हाइड्रोजन ट्रेन | अधिकतम गति | प्रमुख लाभ |
| जर्मनी | 2018 (Coradia iLint) | 140 kmph | यूरोप में शून्य उत्सर्जन रेल नेटवर्क की शुरुआत |
| फ्रांस | 2022 | 120 kmph | राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन रणनीति से जुड़ा |
| चीन | 2023 | 160 kmph | हाई-स्पीड नेटवर्क में हाइड्रोजन का प्रयोग |
| भारत | 2026 (जिंद–सोनीपत) | 75 kmph | ग्रामीण सेक्शन पर पहली बार स्वच्छ ऊर्जा ट्रेन |
आर्थिक दृष्टि से देखें तो हाइड्रोजन ट्रेन का लाभ बहुआयामी है। डीज़ल पर निर्भरता घटेगी, जिससे आयातित ईंधन पर खर्च कम होगा। अनुमान है कि यदि बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन आधारित रेल नेटवर्क विकसित किया जाए तो भारत सालाना हजारों करोड़ रुपये की बचत कर सकता है। साथ ही, हाइड्रोजन उत्पादन और भंडारण से जुड़ी नई इंडस्ट्रीज़ का विकास होगा, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। यह परियोजना हरियाणा जैसे राज्य को औद्योगिक निवेश का नया केंद्र बना सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह कदम भाजपा सरकार के लिए एक बड़ा माइलस्टोन है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास की नई उपलब्धि बताया। यह बयान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश है कि हरियाणा अब राष्ट्रीय स्तर पर रेल और ऊर्जा नवाचार का केंद्र बन रहा है। विपक्ष जहां बिजली संकट और महंगाई पर सरकार को घेरता है, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन जैसी परियोजनाएं सरकार को यह कहने का अवसर देती हैं कि वह भविष्य की तकनीक में निवेश कर रही है।
सुरक्षा और रखरखाव के लिए रेलवे बोर्ड ने विशेष प्रावधान किए हैं—24×7 कंट्रोल रूम, डेटा लॉगिंग, नियमित ऑडिट और स्टैंडबाय कम्प्रेसर यूनिट। यह दिखाता है कि परियोजना केवल प्रयोग नहीं, बल्कि दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है। यदि यह सफल होती है तो आने वाले वर्षों में भारत का रेल नेटवर्क हाइड्रोजन आधारित हो सकता है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्वच्छ परिवहन सुनिश्चित होगा।
गांधीजी ने कहा था कि विकास का पैमाना अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। हाइड्रोजन ट्रेन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्रामीण सेक्शन पर शुरू की गई है। जिंद–सोनीपत जैसे मार्ग पर इसे चलाना यह संदेश देता है कि तकनीकी नवाचार केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा।
अंततः, यह परियोजना केवल रेल परिवहन का नया अध्याय नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और राजनीतिक रणनीति का संगम है। यदि इसे बड़े पैमाने पर लागू किया गया तो यह न केवल लाभकारी होगी बल्कि भारत को ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का वैश्विक नेता बना सकती है। हरियाणा से शुरू हुई यह यात्रा आने वाले वर्षों में पूरे देश को स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन की पटरी पर ले जाएगी।












