अमित पांडे: संपादक
भारत में परीक्षा–लीक का संकट इस कदर गहराता जा रहा है कि कठोर कानून भी इसकी जड़ों में पैठी धांधली को रोकने में असमर्थ दिखते हैं। 2024 में केंद्र सरकार ने पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट लागू किया, जिसमें दोषी पाए जाने पर पाँच से दस वर्ष की सज़ा और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना तय किया गया। निजी एजेंसियों या “सॉल्वर” गिरोहों को बराबर का दोषी माना गया और सरकारी कर्मचारियों के लिए तीन से पाँच वर्ष की सज़ा का प्रावधान रखा गया। लेकिन कठोर प्रावधानों के बावजूद अब तक इस अधिनियम के तहत कोई बड़ी सज़ा नहीं हुई। पहले अपराधियों पर आईपीसी की धारा 120बी (षड्यंत्र) और 420 (धोखाधड़ी) या आईटी एक्ट के तहत मुकदमे चलते थे, पर व्यवहार में अधिकतम तीन महीने की कैद और तुरंत ज़मानत ही होती रही।
राज्यों ने भी अपने–अपने स्तर पर कानून बनाए—उत्तर प्रदेश ने 1981 में, राजस्थान ने 2021 में और उत्तराखंड व गुजरात ने 2023 में। फिर भी ज़मीनी हालात जस के तस हैं। 2014 से 2024 के बीच चालीस से अधिक बड़े पेपर–लीक मामले सामने आए, जिनसे लाखों छात्र प्रभावित हुए। अकेले उत्तर प्रदेश में बीस लाख से अधिक विद्यार्थियों को परीक्षा रद्दीकरण या पुनः परीक्षा का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला, जिसमें कम से कम सत्रह संदिग्ध मौतें हुईं, आज भी सबसे भयावह उदाहरण है कि किस तरह परीक्षा–भ्रष्टाचार करियर और जीवन दोनों को नष्ट कर देता है।
कानून मौजूद हैं, सज़ाएँ तय हैं, पर अमल नदारद है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) लगातार पाँच वर्षों से लीक रोकने में विफल रही है। शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय करने के बजाय निर्दोष शिक्षकों और निचले कर्मचारियों को निलंबित कर दिया जाता है या सेवानिवृत्ति लाभ रोक दिए जाते हैं, जबकि असली गिरोह सुरक्षित रहते हैं। यह चुनिंदा बलि–बकरा बनाने की प्रवृत्ति विश्वास को और खोखला करती है।
आँकड़े स्वयं बोलते हैं—नए अधिनियम के तहत कोई बड़ी सज़ा नहीं, राज्यों में बार–बार लीक, और लाखों छात्रों का भविष्य दाँव पर। शिक्षा यदि सामाजिक गतिशीलता की सीढ़ी है तो पेपर–लीक ने उसकी पायदानें तोड़ दी हैं। सवाल यह नहीं कि कानून कितने मज़बूत हैं, बल्कि यह है कि उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति है या नहीं। बिना वास्तविक जवाबदेही के भारत परीक्षा–धोखाधड़ी को “नया सामान्य” बनाने की ओर बढ़ रहा है, और अपनी युवा पीढ़ी का भविष्य तंत्रगत भ्रष्टाचार की वेदी पर बलिदान कर रहा है।
आज स्थिति छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए धुँधली और असहनीय हो चुकी है। छात्रों की न्यायसंगत माँगें सुस्त और समझौता–ग्रस्त व्यवस्था में अनसुनी रह जाती हैं। 2024 में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा तो मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि अदालत “निरंतर व्यवस्था” में हस्तक्षेप नहीं करेगी। यह टिप्पणी, भले ही प्रक्रियात्मक थी, पर अनेक लोगों ने इसे तंत्रगत विफलता की मौन स्वीकृति माना।
लीक की नियमितता सबसे चौंकाने वाली है। यह आकस्मिक दुर्घटनाएँ नहीं बल्कि संगठित गिरोहों की आदतें हैं, फिर भी सूत्रधार अछूते रहते हैं। इसके विपरीत प्रश्न–निर्माण करने वाले शिक्षक निशाने पर आ जाते हैं। जून 2026 में सेवानिवृत्ति से ठीक पहले निलंबित की गई भौतिकी शिक्षिका का मामला देखें। उन्होंने सौ प्रश्नों में से केवल कुछ प्रश्न दिए थे, जिनमें से कंप्यूटर को दस चुनने थे। फिर भी उन्हें दंडित किया गया, जबकि एनटीए के महानिदेशक, जिनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी परीक्षा की सुरक्षा थी, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। रिकॉर्ड बताते हैं कि एक पूर्व महानिदेशक, जो लीक रोकने में विफल रहे, उन्हें छत्तीसगढ़ में प्रमुख सचिव का पद देकर पुरस्कृत किया गया।
यह चयनात्मक दंड न केहै, बल्कि हास्यास्पद भी है। यदि दोष का आधार केवल प्रश्न देना है तो हर शिक्षक दोषी ठहराया जा सकता है, जबकि पूरी व्यवस्था देखने वाले अधिकारी बच निकलते हैं। शिक्षा मंत्रालय की भूमिका भी विफलता की परत जोड़ती है। एक मंत्री जो परीक्षा–प्रणाली की बुनियादी समझ तक नहीं रखते, जो दक्ष अधिकारियों की नियुक्ति नहीं कर पाते, वे बिना किसी परिणाम के पद पर बने रहते हैं। यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन बाईस लाख छात्रों का भविष्य है जिनके सपने कुचल दिए गए।
इसके परिणाम दूरगामी हैं। छात्रों और शिक्षकों को न्याय के बजाय लाठीचार्ज मिलता है। वे न तो मतदान अधिकार माँग रहे हैं, न ही सीधे सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। उनकी माँग केवल इतनी है कि उन्हें एक निष्पक्ष अवसर मिले, एक पारदर्शी परीक्षा–प्रणाली मिले, और उनकी व उनके परिवारों की बलिदान–साधना सार्थक हो। माता–पिता ने त्योहार, उत्सव और आराम छोड़े हैं ताकि बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो सके। शिक्षक, जिन्होंने विद्यार्थियों को अपने बच्चों की तरह सँवारा, उन्हें अपराधी बना कर निलंबित कर दिया जाता है।
पेपर–लीक अब आकस्मिक घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया बन चुकी है, जिसके तीन आयाम हैं। पहला, यह छात्रों को चिकित्सा, अभियंत्रण और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों के साथ–साथ सरकारी सेवाओं की ओर बढ़ने से हतोत्साहित करेगा। दूसरा, यह शिक्षकों को प्रश्न–निर्माण से विमुख करेगा, क्योंकि कोई भी अनचाहा जोखिम नहीं लेना चाहता। तीसरा, यह कुछ लोगों के लिए जीवन की कीमत पर धन कमाने का अवसर है—वह भी बिना किसी आपराधिक दायित्व के।
हर लीक केवल अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के साथ विश्वासघात है।








