अमित पांडे: संपादक
भारत में न्याय आज सबसे अधिक मायावी प्रतीत होता है, जब भ्रष्टाचार उन योजनाओं को ही खोखला कर देता है जिन्हें जनता को सशक्त बनाने के लिए बनाया गया था। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया रिपोर्ट इसी विफलता का सबसे कठोर अभियोग है। 2015–2022 की अवधि को कवर करते हुए ऑडिट ने उजागर किया कि लगभग 94.5% लाभार्थियों के बैंक खाते और मोबाइल नंबर फर्जी, अमान्य या रिक्त थे। जिस कार्यक्रम को युवाओं को कौशल देकर विकसित भारत की नींव बनाना था, वह नारों तक सीमित रह गया और वास्तविकता में धोखाधड़ी का पर्याय बन गया।
यह केवल दस हज़ार करोड़ रुपये की बात नहीं है जो राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की पुस्तकों में दर्ज हुए। यह उस वचन का प्रश्न है जो गणराज्य ने अपने बेरोज़गार युवाओं से किया था। 2025 तक 15–29 आयु वर्ग में भारत की बेरोज़गारी दर लगभग 15% है। PMKVY इसी संकट का समाधान बनने के लिए शुरू किया गया था। लेकिन यह योजना सत्ता के निकट बैठे लोगों के लिए धन कमाने का साधन बन गई, जबकि मेरठ, मुज़फ्फरनगर, गया और रायपुर के युवाओं को केवल फर्जी डेटाबेस में नाम भरने का धोखा मिला।
यह धोखा इसलिए और गहरा है क्योंकि PMKVY को विश्वगुरु भारत की राह बताया गया था। अब यह प्रतीक बन गया है कि शासन के नारे ज़मीनी सच्चाई की कसौटी पर कैसे ढह जाते हैं। सवाल उठना ही चाहिए—जब संवैधानिक संस्थाएँ जैसे CAG इतने बड़े घोटाले उजागर करती हैं, तब भी यदि जवाबदेही नहीं तय होती, तो “सुशासन” का दावा किस आधार पर किया जा सकता है।
यह संकट केवल एक योजना तक सीमित नहीं है। किसान देखते हैं कि व्यापारिक समझौते बिना परामर्श के होते हैं, महँगाई बढ़ती है, ऊर्जा की कीमतें ग्यारह दिनों में चार बार उछलती हैं, और उत्तर प्रदेश बिजली संकट से जूझता है। लेकिन PMKVY का घोटाला सबसे अधिक घातक है क्योंकि यह सीधे अवसर के वादे पर चोट करता है।
विडंबना तीखी है। सरकार कर्मयोगी जैसे कार्यक्रमों का प्रचार करती है, पर हर कर्म व्यवस्था की सड़ाँध से चुनौतीग्रस्त है। यदि NSDC धन और आँकड़ों का दुरुपयोग करता है तो मंत्री और सचिव क्यों बच निकलते हैं? जवाबदेही हमेशा सबसे नीचे क्यों रुक जाती है? अर्थव्यवस्था दबाव में है, रसोई में तेल की खपत घटाने और विदेशी दौरों पर रोक लगाने की अपीलें हो रही हैं। अमेरिकी अर्थशास्त्री जॉन केनेथ गैल्ब्रेथ ने कहा था कि मंदी से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका आम जनता की क्रय–शक्ति बढ़ाना है। भारत इसके विपरीत हर अवसर पर नारे देता है—कर्मयोगी, विकसित भारत, विश्वगुरु—पर संरचनात्मक विफलताओं को अनदेखा करता है।
CAG की रिपोर्ट ने परत दर परत खोली है—फर्जी नामांकन, भूतिया प्रशिक्षु, नकली नियुक्तियाँ और बढ़ा–चढ़ा कर दिखाए गए प्रशिक्षक। लगभग 20% धन अप्रयुक्त पड़ा रहा, 36% लाभार्थियों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण नहीं मिला। प्रशिक्षण बाज़ार की माँग के बजाय मनमाने ढंग से तय हुआ। एनएसडीसी से जुड़े एनजीओ और प्रशिक्षण साझेदार इस धोखाधड़ी के केंद्र बने, जबकि मंत्रालय ने अनुपालन सुनिश्चित करने में विफलता दिखाई।
यह घोटाला छिपा नहीं था, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों और लक्ष्यों की आड़ में खुलेआम फलता–फूलता रहा। परिणाम यह हुआ कि लाखों युवाओं को प्रमाणपत्र तो मिला, पर नौकरी नहीं।
बचपन में जब माँ हमें चाँद दिखाकर कहती थी—“देखो, तुम्हारे मामा”—तो वह भरोसे और मासूमियत का प्रतीक था। आज वही भरोसा टूट चुका है। गणराज्य युद्धों में ही नहीं, बल्कि चुपचाप भी ढहते हैं—ऑडिट रिपोर्टों में, जो एक समाचार चक्र तक चर्चा में रहती हैं और फिर भुला दी जाती हैं। PMKVY का घोटाला दस हज़ार करोड़ की चोरी है, पर यह धन कोषागार से नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य से चुराया गया है।
इतिहास भारत को उसके वादों की भव्यता से नहीं आँकेगा। वह भारत को इस आधार पर आँकेगा कि जब उन वादों की लूट उजागर हुई, तब उसने क्या किया—और किसे जवाबदेह ठहराया।







