हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: वेतन और पेंशन बकाया किस्तों में देना गलत, सरकार 6% ब्याज भी दे
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन बकाया को किस्तों में देने के फैसले को रद्द कर 6% ब्याज देने का आदेश दिया है।

हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी सामने आई है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें संशोधित वेतन और पेंशन के बकाया (Arrears) को किस्तों में जारी करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वित्तीय तंगी या प्रशासनिक अधिकार का हवाला देकर कर्मचारियों के कानूनी हक को नहीं रोका जा सकता।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की डिवीजन बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 3 जनवरी 2022 को अधिसूचित 'संशोधित वेतन नियमों' के तहत बकाया भुगतान के तरीके को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सिविल सर्विसेज (रिवइज्ड पे) रूल्स, 2022 के नियम 13 को उस हद तक प्रभावी नहीं माना, जहाँ सरकार को यह तय करने का अधिकार था कि वह बकाया राशि कब और कैसे चुकाएगी।
बकाया भुगतान के लिए कोर्ट ने तय की समयसीमा
हाईकोर्ट ने न केवल किस्तों में भुगतान के प्रावधान को रद्द किया, बल्कि सरकार को आदेश दिया कि वह मुख्य याचिकाकर्ता को संशोधित वेतन बकाया और सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान दो समान किस्तों में करे। पहली किस्त 15 दिसंबर 2026 तक और दूसरी किस्त 28 फरवरी 2027 तक देनी होगी। इसमें पेंशन, फैमिली पेंशन, ग्रेच्युटी, कम्यूटेड पेंशन और लीव एनकैशमेंट जैसे सभी लाभ शामिल होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने 1 जून 2022 से वास्तविक भुगतान होने तक 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी आदेश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि ब्याज का लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा जिन्होंने 30 अक्टूबर 2026 तक याचिका दायर की थी, लेकिन बाकी सभी कर्मचारी और पेंशनभोगी अपने मूल बकाया लाभ पाने के हकदार रहेंगे।
राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा 'रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट' बंद करने के कारण राज्य की वित्तीय स्थिति खराब है, इसलिए किस्तों में भुगतान किया जा रहा है। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जब सरकार ने 1 जनवरी 2016 से पिछली तारीख से संशोधित वेतन नियम लागू किए हैं, तो वह प्रशासनिक आदेशों के जरिए भुगतान को अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाल सकती। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत कानूनी अधिकारों का उल्लंघन माना और कहा कि पेंशनभोगियों के बीच भेदभाव करना गलत है।