लोकतंत्र, विरोध का अधिकार और संवैधानिक मर्यादाएँ
लोकतंत्र नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सार्वजनिक विषयों पर प्रश्न उठाने तथा शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार किसी सरकार, राजनीतिक दल अथवा प्रशासनिक व्यवस्था की कृपा पर निर्भर नहीं है। यह भारतीय संविधान की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था से उत्पन्न नागरिक स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।

लेखक: Lt Col (Dr) Atul Tyagi
प्रस्तावना : लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं
भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जहाँ शासन की वैधता केवल चुनावों में प्राप्त बहुमत से निर्धारित नहीं होती, बल्कि संविधान के प्रति उसकी निष्ठा, संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों की स्वतंत्रता और विधि के शासन के प्रति प्रतिबद्धता से भी सुनिश्चित होती है। लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप इस बात में निहित है कि सत्ता किसके हाथ में है, उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि सत्ता का प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है और वह संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर है अथवा नहीं।
लोकतंत्र नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सार्वजनिक विषयों पर प्रश्न उठाने तथा शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार किसी सरकार, राजनीतिक दल अथवा प्रशासनिक व्यवस्था की कृपा पर निर्भर नहीं है। यह भारतीय संविधान की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था से उत्पन्न नागरिक स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।
किन्तु यह भी उतना ही आवश्यक है कि नागरिक स्वतंत्रता को असीमित अधिकार न समझा जाए। प्रत्येक अधिकार के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। विरोध का अधिकार संविधान के संरक्षण में है, संविधान से ऊपर नहीं। असहमति का अधिकार लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए है, न कि उसकी संस्थागत संरचना को कमजोर करने के लिए।
यही वह मूलभूत अंतर है जिसे समझना आज के लोकतांत्रिक विमर्श में अत्यंत आवश्यक हो गया है।
1. विरोध का अधिकार : संवैधानिक स्वतंत्रता, असीमित विशेषाधिकार नहीं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण एवं निरस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है।
ये दोनों अधिकार लोकतांत्रिक सहभागिता की आधारशिला हैं। इनके माध्यम से नागरिक शासन की नीतियों पर प्रश्न उठा सकते हैं, सार्वजनिक निर्णयों से असहमति व्यक्त कर सकते हैं और सामूहिक रूप से अपनी आवाज सरकार तथा संबंधित संस्थाओं तक पहुँचा सकते हैं।
परंतु संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) इन अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति भी देते हैं। भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, नैतिकता और अन्य संवैधानिक आधारों पर विधिसम्मत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
अतः विरोध का अधिकार न तो निरंकुश है और न ही किसी व्यक्ति अथवा संगठन को कानून से ऊपर स्थापित करता है।
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन, राजनीतिक असहमति और सार्वजनिक आलोचना लोकतंत्र के स्वाभाविक अंग हैं। लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, भय का वातावरण बनाना, न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करना अथवा संस्थाओं के विरुद्ध जानबूझकर असत्य और भ्रामक प्रचार करना उसी अधिकार के संरक्षण में नहीं आता।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों का उपयोग संवैधानिक अनुशासन के साथ होना चाहिए। स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह दूसरों की स्वतंत्रता और समाज की शांति के साथ सह-अस्तित्व में रह सके।
2. आलोचना लोकतंत्र की शक्ति है, संस्थाओं का विनाश नहीं
लोकतंत्र में आलोचना का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में आलोचना के अभाव में सत्ता निरंकुशता की ओर अग्रसर हो सकती है। सरकार, राजनीतिक दल, प्रशासन, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाएँ सार्वजनिक परीक्षण और वैध आलोचना से परे नहीं हैं।
किसी न्यायिक निर्णय से असहमति व्यक्त करना, किसी प्रशासनिक आदेश की वैधता पर प्रश्न उठाना, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की समीक्षा करना अथवा किसी सरकारी नीति के विरुद्ध आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकारों के अंतर्गत आता है।
लेकिन आलोचना और संस्थागत अविश्वास फैलाने के बीच एक स्पष्ट रेखा है।
आलोचना का उद्देश्य किसी निर्णय की कमियों को सामने लाना, तथ्यों का परीक्षण करना और सुधार की संभावनाएँ प्रस्तुत करना होना चाहिए। इसके विपरीत, यदि किसी संस्था को बिना पर्याप्त प्रमाण के लगातार संदेह के घेरे में रखा जाए, उसके प्रत्येक निर्णय को दुर्भावना से प्रेरित बताया जाए और उसके प्रति जनविश्वास को कमजोर करने का संगठित प्रयास किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
संस्थाएँ व्यक्तियों से बड़ी होती हैं। किसी संस्था के पदाधिकारी से गलती हो सकती है। निर्णय त्रुटिपूर्ण हो सकता है। प्रशासनिक विवेक का प्रयोग अनुचित हो सकता है। न्यायिक निर्णय भी संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार समीक्षा के अधीन हो सकते हैं।
लेकिन किसी व्यक्ति की संभावित त्रुटि को संपूर्ण संस्था की विफलता का प्रमाण मान लेना तर्कसंगत नहीं है।
संस्था की आलोचना कीजिए, उसके निर्णयों को चुनौती दीजिए, उत्तरदायित्व निर्धारित कीजिए, लेकिन संस्थागत व्यवस्था को ही अवैध अथवा अनावश्यक घोषित करने से पहले ठोस प्रमाण और संवैधानिक तर्क प्रस्तुत कीजिए।
यही परिपक्व लोकतांत्रिक आचरण है।
3. लोकतंत्र के तीन आधारभूत स्तंभ : जवाबदेही, संस्थागत स्वतंत्रता और संवैधानिक सर्वोच्चता
संवैधानिक लोकतंत्र की स्थिरता तीन परस्पर पूरक सिद्धांतों पर निर्भर करती है।
प्रथम : जवाबदेही (Accountability)
लोकतांत्रिक शासन में कोई भी व्यक्ति, पदाधिकारी, राजनीतिक दल अथवा सरकारी संस्था जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती। सार्वजनिक पद अधिकारों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति उत्तरदायित्व है।
सत्ता का प्रयोग पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानून के अनुरूप होना चाहिए। यदि किसी संस्था या पदाधिकारी के विरुद्ध अनियमितता, पक्षपात अथवा अधिकारों के दुरुपयोग के प्रमाण सामने आते हैं, तो उनकी स्वतंत्र जाँच और विधिसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए।
जवाबदेही लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी विश्वसनीयता का आधार है।
द्वितीय : संस्थागत स्वतंत्रता (Institutional Independence)
लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने संवैधानिक और वैधानिक दायित्वों का निर्वहन बिना अनुचित राजनीतिक, सामाजिक अथवा बाहरी दबाव के करने की स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वायत्तता तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्र कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक संतुलन के लिए अनिवार्य है।
संस्थागत स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है। इसका अर्थ है कि जवाबदेही स्थापित करने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष, स्वतंत्र और विधिसम्मत हो।
तृतीय : संवैधानिक सर्वोच्चता (Constitutional Supremacy)
भारत में संविधान सर्वोच्च है। संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल और नागरिक—सभी संविधान के अधीन हैं।
लोकतांत्रिक बहुमत भी संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता। इसी प्रकार, कोई आंदोलन, संगठन अथवा दबाव समूह अपने जनसमर्थन या राजनीतिक प्रभाव के आधार पर संवैधानिक संस्थाओं को अपनी इच्छानुसार संचालित करने का दावा नहीं कर सकता।
इन तीनों सिद्धांतों का संतुलन ही लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है। जवाबदेही के बिना स्वतंत्रता निरंकुशता का रूप ले सकती है, स्वतंत्रता के बिना जवाबदेही राजनीतिक हस्तक्षेप का साधन बन सकती है और संवैधानिक सर्वोच्चता के बिना दोनों अपनी वैधता खो सकते हैं।
4. चुनिंदा विरोध और संस्थागत निष्पक्षता पर प्रश्न
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का औचित्य उसके तथ्यों, तर्कों और उद्देश्य से निर्धारित होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक सुविधा से।
यदि कोई संगठन किसी विशेष संस्था के निर्णयों में त्रुटियाँ खोजता है, तो उसे उन त्रुटियों के समर्थन में प्रमाण, तथ्य और विधिक आधार प्रस्तुत करने चाहिए। लेकिन यदि वही संगठन समान परिस्थितियों में अन्य संस्थाओं की समान प्रकृति की त्रुटियों पर मौन रहता है, तो उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
चुनिंदा आलोचना अपने आप में किसी आरोप को असत्य सिद्ध नहीं करती, लेकिन यह अवश्य अपेक्षा उत्पन्न करती है कि विरोध करने वाले अपने मानदंड स्पष्ट करें।
यदि विरोध का उद्देश्य केवल किसी संस्था को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, उसकी वैधता पर संदेह उत्पन्न करना अथवा राजनीतिक लाभ के लिए जनभावनाओं को प्रभावित करना रह जाए, तो आंदोलन अपनी मूल लोकतांत्रिक भूमिका से भटक सकता है।
विरोध का नैतिक बल उसके अनुशासन और विश्वसनीयता में निहित है।
5. आंदोलन का उद्देश्य और उसकी विश्वसनीयता
किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की शुरुआत सामान्यतः किसी असहमति, शिकायत, अन्याय अथवा सार्वजनिक हित के प्रश्न से होती है। आंदोलन तब सार्थक होता है जब वह उस प्रश्न का समाधान खोजने के लिए संगठित प्रयास करता है।
लेकिन समय के साथ यदि आंदोलन का मूल उद्देश्य अस्पष्ट हो जाए, नेतृत्व के विचारों में एकरूपता समाप्त हो जाए, माँगें बदलती रहें और उपलब्ध तथ्यों के स्थान पर केवल आरोप-प्रत्यारोप प्रमुख हो जाएँ, तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
किसी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ के आकार, नारों की तीव्रता या मीडिया में उसकी दृश्यता से नहीं मापी जा सकती। उसका मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उसने किस समस्या को उठाया, उसके समाधान के लिए क्या ठोस विकल्प प्रस्तुत किए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कितना सकारात्मक योगदान दिया।
आंदोलन का नेतृत्व करने वालों पर भी विशेष उत्तरदायित्व होता है। उन्हें अपने समर्थकों को तथ्यपरक विमर्श, शांतिपूर्ण आचरण और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति शिक्षित करना चाहिए।
यदि नेतृत्व स्वयं स्पष्ट उद्देश्य प्रस्तुत करने में असफल रहता है, तो आंदोलन दिशाहीनता का शिकार हो सकता है। ऐसी स्थिति में आंदोलन की निरंतरता उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति के बजाय स्वयं एक राजनीतिक उद्देश्य बन जाती है।
यह लोकतांत्रिक सक्रियता का स्वस्थ स्वरूप नहीं है।
6. विपक्ष के असावधानिक रवैये से उपजे प्रश्न
हाल के दिनों में तथाकथित 'Cockroach Janta Party (CJP)' Congress party द्वारा विपक्ष नेता के निवास पर लोकसभा और महाभियोग का भोंडा प्रदर्शन और और रामलीला मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने का असंवैधानिक कार्य किए जाने और लोकतंत्र के विरुद्ध घिनोना कार्य और संबद्ध विरोध प्रदर्शनों और उनकी दिशा को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न सामने आए हैं।
किसी भी संगठन को अपनी बात रखने, सरकार अथवा संस्थाओं की आलोचना करने और शांतिपूर्ण विरोध आयोजित करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी संगठन की राजनीतिक पहचान, लोकप्रियता अथवा विचारधारा के आधार पर उसके संवैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है।
CJP के संदर्भ में मूल प्रश्न यह नहीं है कि उसे विरोध करने का अधिकार है या नहीं। यह अधिकार संवैधानिक व्यवस्था से प्राप्त है। वास्तविक प्रश्न यह है कि उसके विरोध का स्पष्ट उद्देश्य क्या है? उसकी माँगों का तथ्यात्मक आधार क्या है? वह किन विशिष्ट निर्णयों या नीतियों को चुनौती दे रहा है? उसके द्वारा उठाए गए प्रश्नों का समाधान क्या है? और क्या उसका विरोध समान मानदंडों पर आधारित है?
यदि किसी आंदोलन का प्रारंभिक उद्देश्य समय के साथ अस्पष्ट हो जाए, उसके नेतृत्व द्वारा स्पष्ट दिशा प्रस्तुत न की जाए तथा उसके विरोध का आधार विश्वसनीय प्रमाणों के बजाय चुनिंदा आरोप बन जाए, तो उसके जनसमर्थन और नैतिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
किसी भी संगठन को केवल विरोध करने के लिए विरोध करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
लोकतांत्रिक राजनीति का उद्देश्य केवल असंतोष उत्पन्न करना नहीं, बल्कि असंतोष का संवैधानिक समाधान तलाशना भी है।
इसलिए CJP सहित प्रत्येक विरोध करने वाले संगठन से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह अपने उद्देश्य, कार्यप्रणाली, प्रमाणों और प्रस्तावित समाधानों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे।
यह अपेक्षा किसी संगठन के विरुद्ध पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि सभी लोकतांत्रिक पक्षों पर समान रूप से लागू होने वाला मानदंड है।
7. संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और नागरिकों का विश्वास
संवैधानिक संस्थाएँ लोकतंत्र की स्थायी संरचना का निर्माण करती हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं, नेतृत्व बदलता है और नीतियों में संशोधन होता रहता है। लेकिन संस्थागत निरंतरता लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करती है।
यदि प्रत्येक राजनीतिक असहमति को किसी संस्था की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाने का माध्यम बना दिया जाए, तो धीरे-धीरे संस्थाओं के प्रति नागरिकों का विश्वास प्रभावित हो सकता है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
संस्था की प्रतिष्ठा उसके पदाधिकारियों के व्यक्तिगत सम्मान से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष कार्यप्रणाली और संवैधानिक प्रतिबद्धता से निर्धारित होती है।
इसी प्रकार, नागरिकों का दायित्व केवल संस्थाओं पर विश्वास करना नहीं, बल्कि उनके कामकाज की जिम्मेदार निगरानी करना भी है।
अंधसमर्थन और अंधविरोध—दोनों लोकतांत्रिक विवेक के विपरीत हैं।
लोकतंत्र में नागरिकों को तथ्यों के आधार पर अपना मत बनाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक नारों, सोशल मीडिया अभियानों अथवा भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होकर।
8. न्यायपालिका, विधि का शासन और लोकतांत्रिक असहमति
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को व्यापक रिट अधिकारिता प्रदान करता है।
इन संवैधानिक उपायों के माध्यम से नागरिक राज्य की मनमानी, प्रशासनिक अन्याय और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को चुनौती दे सकते हैं।
न्यायिक समीक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि विधायिका और कार्यपालिका संविधान की सीमाओं के भीतर कार्य करें।
किन्तु न्यायपालिका के प्रति भी संवैधानिक दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिए।
न्यायिक निर्णयों से असहमति विधिक विमर्श का सामान्य हिस्सा है। उनके विरुद्ध अपील, पुनर्विचार और अन्य उपलब्ध न्यायिक उपचार अपनाए जा सकते हैं। किसी निर्णय की संवैधानिक वैधता को उचित न्यायिक मंच पर चुनौती दी जा सकती है।
लेकिन किसी प्रतिकूल निर्णय के आधार पर संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था को पक्षपाती घोषित कर देना उचित नहीं है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएँ नहीं हैं। न्यायिक स्वतंत्रता निष्पक्ष न्याय के लिए आवश्यक है, जबकि न्यायिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जनता के विश्वास को मजबूत करते हैं।
विधि का शासन तभी स्थापित होता है जब सत्ता और विरोध, दोनों कानून के अधीन रहें।
9. नागरिक की भूमिका : अधिकारों के साथ संवैधानिक कर्तव्य
भारतीय संविधान का भाग IVA नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लेख करता है। अनुच्छेद 51A के अंतर्गत नागरिकों से संविधान का पालन करने, उसके आदर्शों और संस्थाओं का सम्मान करने, देश की एकता एवं अखंडता की रक्षा करने तथा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करने की अपेक्षा की गई है।
मूल कर्तव्य सामान्यतः न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं होते, लेकिन वे नागरिक आचरण के लिए महत्त्वपूर्ण संवैधानिक मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
एक जिम्मेदार नागरिक केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होता, बल्कि दूसरों के अधिकारों और सार्वजनिक हितों का भी सम्मान करता है।
विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले नागरिकों को यह समझना चाहिए कि सार्वजनिक मार्गों, परिवहन, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और आवश्यक सेवाओं को अनावश्यक रूप से बाधित करने से आम नागरिक प्रभावित होते हैं।
किसी आंदोलन के नाम पर दूसरे नागरिकों के जीवन, आजीविका और स्वतंत्र आवागमन को अनिश्चितकाल तक प्रभावित करना लोकतांत्रिक अधिकारों के संतुलित प्रयोग के अनुरूप नहीं है।
नागरिक चेतना का अर्थ केवल प्रश्न उठाना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को न्यायपूर्ण, तार्किक और जिम्मेदार ढंग से उठाना भी है।
लोकतंत्र तभी परिपक्व होता है जब नागरिक अधिकारों के प्रति सजग होने के साथ-साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति भी प्रतिबद्ध हों।
10. लोकतांत्रिक असहमति और राजनीतिक अवसरवाद के बीच अंतर
राजनीतिक असहमति लोकतंत्र की अनिवार्यता है। विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करना, शासन की कमियों को उजागर करना और जनता के हितों की रक्षा करना भी है।
एक सशक्त विपक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उतना ही आवश्यक है जितनी एक उत्तरदायी सरकार।
लेकिन विपक्ष अथवा किसी आंदोलनकारी संगठन की विश्वसनीयता केवल सत्ता का विरोध करने से स्थापित नहीं होती। उसके लिए वैचारिक स्पष्टता, नीतिगत निरंतरता और प्रमाण आधारित आलोचना आवश्यक है।
यदि किसी संगठन का विरोध परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहे, समान परिस्थितियों में अलग-अलग मानदंड अपनाए जाएँ और किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के बिना केवल असंतोष को राजनीतिक पूँजी बनाने का प्रयास किया जाए, तो उसे स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श नहीं कहा जा सकता।
राजनीतिक अवसरवाद और सिद्धांत आधारित विरोध के बीच अंतर पहचानना नागरिकों की जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र में किसी दल अथवा संगठन की निष्ठा का परीक्षण उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके आचरण, विचारों की निरंतरता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से होना चाहिए।
11. संविधान : सत्ता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का अंतिम आधार
भारतीय संविधान केवल शासन संचालन का दस्तावेज नहीं है। यह भारत के सामूहिक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक संकल्प का प्रतीक है।
इसकी प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों को स्थापित करती है। ये चारों आदर्श एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र अधूरा है। समानता के बिना स्वतंत्रता कुछ वर्गों तक सीमित हो सकती है। न्याय के बिना समानता केवल औपचारिक अवधारणा बनकर रह जाती है और बंधुता के बिना समाज में विश्वास तथा राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ सकती है।
इसलिए लोकतंत्र को केवल चुनावों, राजनीतिक आंदोलनों अथवा सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं किया जा सकता।
संविधान सभी के लिए समान रूप से बाध्यकारी है। किसी को भी अपनी राजनीतिक लोकप्रियता, संगठनात्मक शक्ति, वैचारिक प्रभाव अथवा जनसमर्थन के आधार पर संवैधानिक मर्यादाओं से ऊपर होने का अधिकार नहीं है।
इसी सिद्धांत में भारतीय लोकतंत्र की शक्ति निहित है।
12. सुधार का मार्ग : विरोध से समाधान की ओर
लोकतांत्रिक विरोध का अंतिम उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए।
यदि किसी संस्था में त्रुटि है, तो उसका प्रमाण प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यदि किसी पदाधिकारी ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है, तो विधिसम्मत जाँच की माँग की जानी चाहिए। यदि कोई निर्णय संविधान के विरुद्ध है, तो सक्षम न्यायिक मंच का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए। यदि कोई सरकारी नीति जनहित के प्रतिकूल है, तो उसके स्थान पर व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
आंदोलन को समस्या के साथ समाधान भी प्रस्तुत करना चाहिए।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संवाद, तथ्य, विधिक उपचार और संस्थागत सुधार के लिए पर्याप्त स्थान है। इन माध्यमों को दरकिनार करके केवल टकराव को प्राथमिकता देना दीर्घकालीन समाधान नहीं दे सकता।
किसी भी विरोध की सफलता इस बात से निर्धारित होनी चाहिए कि उससे समाज में संवैधानिक जागरूकता कितनी बढ़ी, शासन में पारदर्शिता कितनी आई और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कितनी प्रभावी हुई।
यही विरोध की सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका है।
उपसंहार : लोकतंत्र की रक्षा केवल अधिकारों से नहीं, उत्तरदायित्व से भी होती है
भारत का लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल, सरकार, विचारधारा, आंदोलन अथवा संगठन की संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों के विश्वास, संविधान की सर्वोच्चता और संस्थागत निरंतरता पर आधारित एक सामूहिक राष्ट्रीय व्यवस्था है।
इस व्यवस्था में सरकार से प्रश्न पूछना नागरिक का अधिकार है। विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना करना उसका लोकतांत्रिक दायित्व है। संस्थाओं द्वारा सत्ता को संवैधानिक सीमाओं में रखना उनकी जिम्मेदारी है। और नागरिकों द्वारा इन सभी प्रक्रियाओं पर जागरूक निगरानी रखना लोकतांत्रिक सहभागिता का सार है।
लेकिन इन सभी भूमिकाओं का निर्वहन संविधान के दायरे में होना चाहिए।
आलोचना को संरक्षण मिलना चाहिए, परंतु प्रमाणहीन आरोपों को लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का पर्याय नहीं बनाया जा सकता। विरोध को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन उसे संस्थाओं को अस्थिर करने का साधन नहीं बनने देना चाहिए। जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए, परंतु संस्थागत स्वतंत्रता को राजनीतिक दबाव के अधीन नहीं किया जा सकता।
CJP हो अथवा कोई अन्य राजनीतिक संगठन, प्रत्येक आंदोलन को अपने उद्देश्य, तथ्यों, नेतृत्व और कार्यप्रणाली के आधार पर सार्वजनिक परीक्षण के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि किसी आंदोलन की दिशा अस्पष्ट हो जाती है, उसकी माँगें अपनी विश्वसनीयता खो देती हैं और उसका विरोध ठोस प्रमाणों के स्थान पर चुनिंदा आरोपों पर आधारित होने लगता है, तो उसके नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी संगठन को आलोचना से छूट नहीं मिल सकती। जो संगठन दूसरों से जवाबदेही की अपेक्षा करता है, उसे स्वयं भी जवाबदेह होना चाहिए।
अंततः यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि चुनाव में कौन विजयी हुआ, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि विजयी पक्ष संविधान से बँधा रहता है या नहीं; विपक्ष को प्रश्न उठाने की स्वतंत्रता प्राप्त रहती है या नहीं; संस्थाएँ निष्पक्ष जाँच और आलोचना के लिए सक्षम बनी रहती हैं या नहीं; और नागरिक अपने अधिकारों तथा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए कितने सजग रहते हैं।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के समर्थन में उठने वाली आवाजों की संख्या में नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता, संस्थाओं की निष्पक्षता और संविधान के प्रति सामूहिक निष्ठा में निहित है।
संविधान सर्वोपरि है, संस्थाएँ उसकी संरक्षक हैं और नागरिक उसकी लोकतांत्रिक आत्मा हैं। इन तीनों के बीच संतुलन ही भारत के लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति, स्थिरता और विश्वसनीयता सुनिश्चित कर सकता है।
“लोकतंत्र की उत्तरजीविता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि चुनाव कौन जीतता है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि विजेता संविधान की मर्यादाओं से बँधा रहता है या नहीं; विपक्ष को प्रश्न उठाने की स्वतंत्रता बनी रहती है या नहीं; संस्थाएँ निष्पक्ष समीक्षा और आलोचना के लिए सक्षम रहती हैं या नहीं; और नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कितने सजग तथा प्रतिबद्ध रहते हैं।”
— Lt Col (Dr) Atul Tyagi
Practising Advocate | Professor of Practice | Author