दशकों तक वापकोस लिमिटेड (WAPCOS Limited), भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के अधीन एक मिनी रत्न सार्वजनिक उपक्रम, देश की सबसे सफल और लगातार लाभ अर्जित करने वाली इंजीनियरिंग एवं परामर्श कंपनियों में गिनी जाती रही। किंतु अब इस प्रतिष्ठित संस्था की साख उस समय नए सवालों के घेरे में है, जब ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि वित्तीय वर्ष 2025–26 में कंपनी को लगभग ₹70–75 करोड़ का वार्षिक घाटा हुआ है। यदि कंपनी के लेखापरीक्षित (Audited) वित्तीय विवरण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं, तो यह वापकोस के इतिहास का पहला वार्षिक घाटा होगा।

यह वित्तीय गिरावट इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह एक ऐसे वर्ष में हुई, जब कंपनी के शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन हुआ।

वित्तीय वर्ष 2025–26 के प्रथम छह माह में कंपनी की कमान पद से हटाए गए सीएमडी राजनिकांत अग्रवाल के हाथों में थी, जिनके कार्यकाल के संबंध में बाद में सीबीआई द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई तथा अन्य आधिकारिक कार्यवाहियाँ प्रारम्भ हुईं।

वहीं अगले छह माह में कंपनी का नेतृत्व वर्तमान सीएमडी सुश्री शिल्पा शिंदे के हाथों में रहा, जिन्होंने ऐसे समय में कार्यभार संभाला जब संस्था वित्तीय, प्रशासनिक और संस्थागत चुनौतियों का सामना कर रही थी।

इस प्रकार वर्ष 2025–26 का वित्तीय परिणाम दो अलग-अलग नेतृत्व अवधियों को समाहित करता है। इसलिए यह केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे संस्थागत प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन का विषय बन जाता है।

₹600 करोड़ के बैंक ऋणों पर भी सवाल

इसी के साथ यह भी बताया जा रहा है कि वापकोस पर लगभग ₹600 करोड़ के बैंक ऋण बकाया हैं, जिन्हें कथित रूप से तीन अलग-अलग चरणों (Tranches) में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिया गया।

यदि यह तथ्य आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो स्वाभाविक रूप से कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं—

* इन ऋणों का उद्देश्य क्या था?

* इन ऋणों से किन-किन परियोजनाओं का वित्तपोषण किया गया?

* वर्तमान में कुल बकाया देनदारी कितनी है?

* ऋणों की पुनर्भुगतान (Repayment) की वर्तमान स्थिति क्या है?

* क्या निदेशक मंडल (Board of Directors) ने इन ऋणों और उनसे जुड़े वित्तीय जोखिमों की व्यापक समीक्षा की है?

चूँकि वापकोस भारत सरकार का सार्वजनिक उपक्रम है, इसलिए ये प्रश्न केवल कंपनी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन और संस्थागत जवाबदेही से भी जुड़े हुए हैं।

बैलेंस शीट केवल लाभ-हानि का विवरण नहीं होती

किसी भी कंपनी की बैलेंस शीट केवल आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं होती।

वह यह भी बताती है कि—

* रणनीतिक निर्णय कैसे लिए गए,

* परियोजनाओं का वित्तीय प्रबंधन कैसा रहा,

* उधार लेने की नीति कितनी विवेकपूर्ण थी,

* नकदी प्रवाह (Cash Flow) का प्रबंधन किस प्रकार हुआ,

* और वित्तीय नियंत्रण कितने प्रभावी रहे।

जब किसी सार्वजनिक उपक्रम में बड़े पैमाने पर बैंक ऋण और महत्वपूर्ण वार्षिक घाटा एक साथ दिखाई दें, तो स्वाभाविक रूप से संस्था के वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों सहित सभी हितधारकों के मन में उसकी वित्तीय स्थिति और भविष्य को लेकर प्रश्न उठते हैं।

वित्तीय चुनौतियों के साथ बढ़ी संस्थागत जांच

यह वित्तीय स्थिति ऐसे समय सामने आई है, जब वापकोस पहले से ही विभिन्न आधिकारिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक विमर्श का विषय बनी हुई है।

इनमें शामिल हैं—

* पद से हटाए गए सीएमडी राजनिकांत अग्रवाल के विरुद्ध सीबीआई प्राथमिकी,

* न्यायालयीन कार्यवाहियाँ,

* सूचना के अधिकार (RTI) से जुड़े विवाद,

* तथा कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत विभिन्न अभ्यावेदन, जिनमें प्रशासनिक और संस्थागत शासन (Governance) से जुड़े प्रश्न उठाए गए हैं।

इन सभी मामलों पर संबंधित वैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ जारी हैं।

वित्तीय दबाव और संस्थागत जांच का यह समानांतर क्रम कंपनी की पारदर्शिता, वित्तीय स्थिति और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर और अधिक प्रश्न उत्पन्न करता है।

वे प्रश्न जिनका उत्तर अपेक्षित है

जब कंपनी के लेखापरीक्षित वित्तीय विवरण सार्वजनिक होंगे, तब कर्मचारियों, बैंकों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों को स्वाभाविक रूप से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर अपेक्षित होंगे—

* लगभग ₹70–75 करोड़ के कथित घाटे के प्रमुख कारण क्या रहे?

** इस वित्तीय परिणाम में प्रथम छह माह और अंतिम छह माह के दौरान लिए गए निर्णयों का योगदान कितना रहा?*

* लगभग ₹600 करोड़ के बैंक ऋणों की वर्तमान स्थिति क्या है?

* वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए अब तक कौन-कौन से सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं?

* कंपनी की लाभप्रदता और विश्वसनीयता बहाल करने के लिए भविष्य की क्या रणनीति तैयार की गई है?

ये प्रश्न किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व (Public Accountability) सुनिश्चित करने के लिए उठाए जा रहे हैं।

आगे की राह

वापकोस दशकों से भारत के इंजीनियरिंग और परामर्श क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित संस्था रही है।

उसका भविष्य केवल चल रही जाँचों या न्यायिक कार्यवाहियों पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या वह अपने कर्मचारियों, ग्राहकों, बैंकों, सरकार और जनता का विश्वास पुनः अर्जित कर पाती है।

इसलिए कंपनी के लेखापरीक्षित वित्तीय विवरण, निदेशक मंडल के स्पष्टीकरण तथा प्रशासनिक मंत्रालय की प्रतिक्रिया पर सभी की निगाहें रहेंगी।

अंततः, बैलेंस शीट केवल एक वर्ष का लाभ-हानि विवरण नहीं होगी—वह यह भी बताएगी कि भारत के सबसे प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रमों में से एक इस निर्णायक मोड़ तक कैसे पहुँचा।