Singer S Janaki Death: दक्षिण भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित आवाजों में से एक और ‘साउथ इंडिया की नाइटिंगेल’ के नाम से मशहूर दिग्गज प्लेबैक सिंगर एस. जानकी (जानकी अम्मा) का 88 साल की उम्र में निधन हो गया है। उनके जाने से पूरे देश के संगीत जगत में शोक की लहर है। छह दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज करने वाली इस महान गायिका ने सिनेमा को एक नई पहचान दी थी।
6 दशक का सफर और ‘साउथ इंडिया की नाइटिंगेल’ का खिताब
एस. जानकी का संगीत सफर भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। उन्होंने साल 1957 में महज 19 साल की उम्र में तमिल फिल्म ‘विधिइन विलायाट्टू’ से अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक ही साल में छह अलग-अलग भाषाओं में गाने रिकॉर्ड कर सबको चौंका दिया।
तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम और हिंदी जैसी भाषाओं में उनकी पकड़ बेजोड़ थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों सदाबहार गाने गाए जो आज भी हर दक्षिण भारतीय घर में गूंजते हैं। साल 2016 में उन्होंने लाइव स्टेज और रिकॉर्डिंग से संन्यास लिया था, लेकिन साल 2018 में प्रशंसकों की भारी मांग पर उन्होंने तमिल फिल्म ‘पन्नाडी’ के लिए अपना आखिरी गाना रिकॉर्ड किया।
जब पद्म भूषण ठुकराकर की थी ‘भारत रत्न’ की मांग
एस. जानकी सिर्फ अपने गानों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और बेबाक फैसलों के लिए भी जानी जाती थीं। साल 2013 में जब केंद्र सरकार ने उन्हें देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ देने का ऐलान किया, तो उन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था। उनका यह फैसला उस समय काफी सुर्खियों में रहा था।
जानकी अम्मा का स्पष्ट मानना था कि भारतीय संगीत में उनके छह दशकों के योगदान को देखते हुए उन्हें ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा था कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। सम्मान ठुकराने के बावजूद उनके प्रति लोगों का आदर और बढ़ गया। उन्हें अपने करियर में 4 नेशनल फिल्म अवॉर्ड और रिकॉर्ड 33 राज्य स्तरीय फिल्म पुरस्कार मिले।
गुंटूर से चेन्नई तक का सफर: बिना शास्त्रीय ट्रेनिंग के बनीं सुरों की मल्लिका
एस. जानकी का जन्म 23 अप्रैल 1938 को मद्रास प्रेसिडेंसी के गुंटूर जिले के पल्लापाटला गांव में हुआ था। उनके पिता एक आयुर्वेदिक डॉक्टर और शिक्षक थे। संगीत के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही था और उन्होंने महज 9 साल की उम्र में अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस दिया था।
हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कभी भी शास्त्रीय संगीत की कोई औपचारिक या प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं ली थी। उन्होंने नादस्वरम के विद्वान पैडिसवामी से केवल संगीत की बुनियादी बातें सीखी थीं। इसके बावजूद उनकी मातृभाषा तेलुगु होने के साथ-साथ वे अन्य भाषाओं को इतनी शुद्धता से गाती थीं कि सुनने वाले दंग रख जाते थे। उनके करियर को संवारने में उनके पति वी. रामप्रसाद का बहुत बड़ा योगदान था, जिनका साल 1997 में निधन हो गया था।







