WAPCOS Limited Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने जल शक्ति मंत्रालय के अधीन आने वाले मिनी रत्न उपक्रम WAPCOS लिमिटेड को कड़ी फटकार लगाई है। कर्मचारियों के रोजगार से जुड़े एक मामले में कंपनी की तरफ से बिना किसी दस्तावेजी साक्ष्य के खुद को ‘डूबता जहाज’ बता दिया गया, जिसके बाद अदालत का रुख बेहद सख्त हो गया है।
कोर्ट में WAPCOS को क्यों कहा गया ‘डूबता जहाज’, जज ने क्यों लगाई फटकार
न्यायार्थी संजीव नरूला के सामने पीयूष कुमार सिंह व अन्य बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान चौंकाने वाली दलीलें दी गईं। कंपनी के वकील (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल) ने दलील दी कि WAPCOS के पास अपने कर्मचारियों को बनाए रखने की वित्तीय क्षमता नहीं है और कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए उसे कर्ज तक लेना पड़ा है।
हाई कोर्ट ने इस मौखिक दलील पर नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि कंपनी ने अपनी नाजुक वित्तीय स्थिति को साबित करने के लिए एक भी दस्तावेज पेश नहीं किया है। कोर्ट ने अब आदेश दिया है कि WAPCOS को पिछले पांच वित्तीय वर्षों के ऑडिटेड बैलेंस शीट कोर्ट के सामने पेश करने होंगे।
682 पदों को खत्म करने के दावे पर फंसा पेंच, नहीं मिले कोई सबूत
मामले में दूसरा बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब WAPCOS ने अपने एक अतिरिक्त हलफनामे में दावा किया कि स्वीकृत 1,541 पदों में से 682 पदों को सरेंडर कर दिया गया है। अदालत ने पाया कि इस बड़े दावे के पीछे भी कोई रिकॉर्ड या स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है कि यह फैसला कब और कैसे लिया गया।
अब कोर्ट ने सख्त निर्देश देकर बोर्ड मीटिंग का एजेंडा, रेजोल्यूशन और मिनट्स की मांग की है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ऐसा कोई आधिकारिक बोर्ड अप्रूवल असल में है ही नहीं, जिससे यह अदालती बयान झूठा साबित हो सकता है। जानकारों के मुताबिक, अब बैकडेट से कोई दस्तावेज तैयार करने की कोशिश मामले को और गंभीर बना देगी।
‘उत्कृष्ट’ से ‘अति निम्न’ तक कैसे पहुंच गई जल शक्ति मंत्रालय की यह शान
साल 1969 में बनी WAPCOS कभी लगातार मुकाबला करने वाली और सरकार को भारी डिविडेंड देने वाली बेहतरीन कंपनी थी। साल 2019-20 तक दुनिया के 55 से अधिक देशों में इसका कारोबार फैला था और इसकी रेटिंग ‘एक्सीलेंट’ हुआ करती थी।
आरोप हैं कि साल 2021 में रजनीकांत अग्रवाल को सीएमडी बनाए जाने के बाद कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण कंपनी गर्त में चली गई और इसकी रेटिंग ‘वेरी पुअर’ हो गई। उनके बाद एक अनुभवहीन आईएएस अधिकारी को कमान सौंपी गई, जिसके कार्यकाल में कई प्रोजेक्ट्स बंद हो गए और सैकड़ों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।







