'जिला अदालत ही न्याय प्रणाली का पहला चेहरा', CJI ने वकीलों की तुलना डॉक्टरों से की
CJI सूर्यकांत ने जिला अदालतों को न्याय प्रणाली का पहला चेहरा बताया और वकीलों की तुलना डॉक्टरों से करते हुए प्रोफेशनल एथिक्स पर जोर दिया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने जिला अदालतों की अहमियत और वकीलों की पेशेवर नैतिकता (Professional Ethics) को लेकर एक बेहद मार्मिक और गहरी बात कही है। उन्होंने कहा कि जब कोई आम इंसान पहली बार न्याय प्रणाली के संपर्क में आता है, तो वह जिला अदालत ही होती है। एक व्यक्ति जब वहां पहुंचता है, तो वह न्याय की तलाश में होता है और उसके मन में ढेरों आशंकाएं होती हैं, ऐसे में उसे सही कानूनी सहायता और मार्गदर्शन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
यह बयान CJI ने गुरुवार शाम राउज एवेन्यू जिला अदालत में 'ऑल दिल्ली डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशंस' की समन्वय समिति द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह के दौरान दिया। इस मौके पर उन्होंने न्याय प्रक्रिया को चिकित्सा सेवा से जोड़ते हुए एक दिलचस्प उदाहरण दिया।
वकील हैं समाज के 'डॉक्टर'
CJI सूर्यकांत ने कहा कि जिस तरह अस्पताल में गंभीर स्थिति में आए मरीज को नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ तुरंत प्राथमिक उपचार देते हैं और यह भरोसा दिलाते हैं कि वह सुरक्षित है, जिससे मरीज का आधा तनाव कम हो जाता है, ठीक वैसा ही काम जिला अदालतों में वकीलों का होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक वकील को अपने क्लाइंट को कानूनी बारीकियों के जरिए यह स्पष्टता देनी चाहिए कि उसके मामले का संभावित परिणाम क्या हो सकता है और वह अपने छीने हुए अधिकारों को कैसे वापस पा सकता है। CJI के अनुसार, एक वकील के लिए यही सबसे बड़ी सफलता है कि वह अपने क्लाइंट को वह 'इलाज' दे सके जिसकी उसे उम्मीद है।
मुख्य न्यायाधीश ने युवा वकीलों के करियर में सीनियर वकीलों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि एक सीनियर वकील किसी भी युवा वकील के करियर को पूरी तरह बदल सकता है। साथ ही, उन्होंने महिला वकीलों के योगदान की सराहना की और कहा कि दिल्ली के पास देश के बेहतरीन वकील हैं, जिससे यहां अलग-अलग तरह के मामलों का शानदार अनुभव मिलता है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारतीय कानूनी बिरादरी दुनिया में नेतृत्व करने की क्षमता रखती है।
इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव सचदेवा ने भी महिला वकीलों के संघर्ष और उनकी क्षमता की तारीफ की। उन्होंने कहा कि महिलाएं पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ-साथ घर और परिवार को जिस तरह संभालती हैं, वह काबिल-ए-तारीफ है और पुरुष शायद ऐसा नहीं कर पाएंगे। कार्यक्रम में जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे, दिल्ली बार काउंसिल के चेयरमैन एडवोकेट नितिन अहलावत और कई अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता मौजूद थे।