अमित पांडे: संपादक
बाढ़ भारत की सच्चाई है, शायद खूबसूरती भी। कहते हैं न कि हर खूबसूरत चीज़ जानलेवा होती है। लेकिन सरकारी आँकड़ों के मुताबिक सब कुछ ठीक है। कई बाँध, तटबंध, नदी परियोजनाएँ, हाईवे आदि-इत्यादि के बाद भी सरकार पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ रोकने में असमर्थ रही है। हालाँकि कुछ विज्ञजन इसे नेहरू सरकार की विफलता मानते हैं, पर परेशानी दलगत नहीं, कालखंड की होती है। आँकड़े बताते हैं कि बाढ़ केवल जीवन को खत्म करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि जीवन को विस्थापित करने से लेकर शरणार्थी शिविरों तक सिमटने और "SIR" जैसी प्रक्रियाओं का पीड़ित बनने तक, इसकी महती भूमिका को सहजता से अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
भारतीय जीवन में बाढ़ कोई नई घटना नहीं है। यह सदियों से इस भूगोल और समाज की सच्चाई रही है। लेकिन आज़ादी के साथ एक नया विश्वास भी जन्मा कि अब अपनी सरकार उन समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने का प्रयास करेगी, जिन्हें औपनिवेशिक शासन में कभी गंभीरता से प्राथमिकता नहीं मिली। यही कारण था कि स्वतंत्रता के कुछ वर्षों बाद, 1954 में केंद्र सरकार ने पहली बार राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम (National Flood Control Programme) शुरू किया। इसके बाद तटबंध बने, जलाशय बने, ड्रेनेज योजनाएँ बनीं, बाढ़ पूर्वानुमान तंत्र विकसित हुआ, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम आया, एनडीएमए और एनडीआरएफ का गठन हुआ, राज्यों में एसडीआरएफ बनी, उपग्रह आधारित चेतावनी प्रणाली शुरू हुई और हाल के वर्षों में Flood Management and Border Areas Programme (FMBAP) के लिए 2021-26 की अवधि में ₹4,100 करोड़ का केंद्रीय प्रावधान किया गया।
इतनी संस्थागत तैयारी के बावजूद 2026 का मानसून फिर वही सवाल पूछ रहा है - यदि व्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है तो हर वर्ष करोड़ों भारतीयों का जीवन पानी के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाता है?
आज देश के कई हिस्से—असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और पूर्वोत्तर के अनेक राज्य—फिर बाढ़ की चपेट में हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में बाढ़ प्रभावित राज्यों के लिए ₹2,117.85 करोड़ की अग्रिम SDRF सहायता जारी की है, जबकि प्रभावित क्षेत्रों में घर-घर जाकर क्षति का आकलन करने की नई व्यवस्था भी लागू की जा रही है ताकि पुनर्वास प्रक्रिया तेज हो सके।
सरकारी प्रतिक्रिया पर प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि प्रतिक्रिया हर साल क्यों देनी पड़ती है?
भारत में बाढ़ प्रबंधन की यात्रा केवल राहत वितरण तक सीमित नहीं रही। 1976 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग का गठन किया गया, जिसने तटबंधों की सीमाएँ, बाढ़ मैदानों के अतिक्रमण और नदी प्रबंधन की खामियों पर विस्तृत रिपोर्ट दी। उसके बाद अनेक पंचवर्षीय योजनाओं में हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए। 2007 में Flood Management Programme शुरू किया गया, जिसे बाद में विस्तारित कर Flood Management and Border Areas Programme बनाया गया। फरवरी 2026 तक इस योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्यों की 50 परियोजनाएँ स्वीकृत हुईं, जिनमें से 24 परियोजनाओं पर केंद्र की वित्तीय सहायता जारी की जा चुकी है। केवल 2021-26 की अवधि में ही इन परियोजनाओं पर ₹2,813 करोड़ से अधिक की स्वीकृत लागत दर्ज की गई है।
इतना ही नहीं, 15वें वित्त आयोग की अवधि में राज्यों को आपदा प्रबंधन के लिए अभूतपूर्व संसाधन उपलब्ध कराए गए। मार्च 2026 तक केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों को ₹20,735 करोड़ से अधिक SDRF, ₹3,628 करोड़ NDRF, तथा अलग से राज्य एवं राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण निधि के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये जारी कर चुकी थी।
समस्या यह है कि भारत ने बाढ़ को रोकने की तुलना में बाढ़ के बाद राहत पहुँचाने की क्षमता अधिक विकसित की है। नदी को उसके प्राकृतिक मार्ग से बाँधने की कोशिशें, बाढ़ मैदानों पर अनियोजित निर्माण, शहरों में नालों का अतिक्रमण, जल निकासी तंत्र की विफलता और जलग्रहण क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण ने खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। अब कम समय में अत्यधिक वर्षा सामान्य घटना बनती जा रही है, जबकि हमारी अधिकांश शहरी और ग्रामीण जल निकासी व्यवस्था दशकों पुराने मानकों पर आधारित है।
बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। राज्य का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र में आता है। कोसी, गंडक, बागमती, कमला और महानंदा जैसी नदियाँ हर वर्ष लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। असम में ब्रह्मपुत्र केवल पानी नहीं लाती, बल्कि हर वर्ष हजारों हेक्टेयर भूमि का कटाव भी करती है। हिमालयी राज्यों में बादल फटना और अचानक आने वाली बाढ़ अब अपवाद नहीं रहे। दूसरी ओर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और गुरुग्राम जैसे महानगर कुछ घंटों की बारिश में जलमग्न हो जाते हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या केवल नदी की नहीं, बल्कि विकास की दिशा की भी है।
सरकार ने तकनीक को समाधान का माध्यम बनाने की कोशिश की है। भारतीय मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अब सैकड़ों बाढ़ पूर्वानुमान केंद्रों, डॉप्लर रडार, उपग्रह निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चेतावनी प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं। हिमालयी राज्यों के लिए ग्लेशियल झीलों से आने वाली अचानक बाढ़ की स्वदेशी चेतावनी प्रणाली का भी परीक्षण किया जा चुका है।
लेकिन चेतावनी तभी प्रभावी होती है जब उसके बाद सुरक्षित पुनर्वास, नियोजित शहरीकरण और वैज्ञानिक नदी प्रबंधन भी साथ चले। दुर्भाग्य से भारत में अधिकांश चर्चा तब शुरू होती है जब पानी घरों में घुस चुका होता है। हेलीकॉप्टर उड़ते हैं, राहत शिविर खुलते हैं, मुआवज़े घोषित होते हैं और कुछ सप्ताह बाद सब कुछ अगले मानसून तक भुला दिया जाता है।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि इस वर्ष कितने करोड़ रुपये जारी हुए। प्रश्न यह है कि पिछले सात दशकों में बाढ़ नियंत्रण, तटबंधों, पुनर्वास, नदी प्रबंधन और आपदा राहत पर खर्च हुए लाखों करोड़ रुपये ने स्थायी सुरक्षा कितनी दी? यदि हर मानसून वही गाँव डूबते हैं, वही सड़कें टूटती हैं, वही फसलें नष्ट होती हैं और वही परिवार राहत शिविरों में पहुँचते हैं, तो समस्या संसाधनों की नहीं, नीति की प्राथमिकताओं की है।
बाढ़ भारत की नियति नहीं है। वह हमारी योजना, प्रशासन और विकास मॉडल की परीक्षा है। जब तक नदी को केवल नियंत्रित करने की वस्तु और बाढ़ को केवल राहत वितरण का अवसर समझा जाएगा, तब तक बजट बढ़ते रहेंगे, परियोजनाएँ बनती रहेंगी, समीक्षा बैठकें होती रहेंगी—लेकिन मानसून आते ही देश का एक बड़ा हिस्सा फिर उसी प्रश्न के साथ खड़ा मिलेगा: क्या हमने सचमुच बाढ़ से लड़ना सीखा है, या केवल उसके बाद आँसू पोंछने की व्यवस्था विकसित की है?





