नयी दिल्ली 02 फरवरी (कड़वा सत्य) सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से बचने के
लिये आर्द्रभूमि को बचाने की जरूरत है और तालाबों तथा झीलों को नहीं बचाया गया, तो आने वाले समय में लोगों को इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
श्रीमती नारायण ने यहां विश्व आर्द्रभूमि दिवस के मौके पर वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि स्थिति भयावह है और इसको लेकर लोगों
को जागरूक होने की जरूरत है। उन्होंने वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया की पहल की प्रशंसा करते हुये कहा कि आर्द्रभूमि के संरक्षण को लेकर इस तरह के कार्यक्रमों का बड़े पैमाने पर आयोजित करने की जरूरत है।
उन्होंने बताया कि पिछले दो-तीन सालों में स्थिति थोड़ी सुधरी है, लेकिन अभी भी चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि तालाबों को नहीं बचायेंगे, तो परिणाम बहुत बुरे होंगे। उन्होंने कहा कि पहले हम करते थे कि जल संरक्षण के लिये तालाब जरूरी है, लेकिन अब हम करते हैं कि तालाबों की क्या जरूरत है। उन्होंने कहा कि तालाबों तथा झीलों की जरूरत है क्योंकि यदि हम जल संरक्षण नहीं करेंगे, तालाबों और झीलों को नहीं बचाएंगे, तो एक ओर बाढ़ आयेगी और दूसरी ओर सूखा पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों हम सभी ने देखा था कि बारिश के कारण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की क्या स्थिति हो गयी थी।
गौरतलब है कि विश्व वेटलैंड्स दिवस 2024 का विषय ‘वेटलैंड्स और मानव कल्याण’ है। इस अवसर पर वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के अध्यक्ष डॉ सिद्धार्थ कौल ने विश्व वेटलैंड्स दिवस 2024 की थीम पेश की और संगठन की ओर से पिछले 26 वर्षों में आर्द्रभूमिक के संरक्षण निरंतर प्रयासों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया पारिस्थितिक संतुलन और मानव समृद्धि के लिये आर्द्रभूमि संरक्षण के महत्व पर जोर देने की खातिर विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और जनता के माध्यम से जागरूकता निर्माण के लिये कुछ स्वस्थ चर्चाओं
के लिये एक मंच के रूप में कार्य करता है।
इस अवसर पर वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक डॉ रितेश कुमार ने मेहमानों का स्वागत किया। कार्यक्रम में दो ज्ञान और आउटरीच सामग्री जारी की गयी।
श्री कुमार ने कहा कि ‘लाइफ इंटरलेस्ड, वेटलैंड्स एंड पीपल’ थीम वाला एक पोस्टर, वेटलैंड्स और मानव कल्याण के बीच अंतर्संबंध के महत्व पर प्रकाश डालता है और उनके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देता है। वहीं, दूसरा प्रकाशन वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के न्यूज़लेटर 'सरोवर' का नौवां संस्करण था, जिसका विषय 'वेटलैंड्स की पारिस्थितिक बहाली' था।
कार्यक्रम में 'वेटलैंड्स: प्रकृति-आधारित समाधान' पर एक पैनल चर्चा भी आयोजित की गयी, जिसमें विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में वेटलैंड्स की परिवर्तनकारी क्षमता का पता लगाया।
उल्लेखनीय है कि वेटलैंड्स कन्वेंशन को रामसर कन्वेंशन कहा जाता है। रामसर सम्मेलन 1971 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि संधि है। यह सम्मेलन 1975 में कार्रवाई में आया। रामसर ईरान में स्थित वह स्थान है, जहाँ 1971 में अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि संधि पर हस्ताक्षर किये गये थे।
संतोष.श्रवण
जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से बचने के लिये आर्द्रभूमि को बचाना जरूरी: नारायण


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