नितिन उपाध्याय
यदि हम एआई से अपने समय की बचत कर भी रहे हैं, तो सवाल यह उठता है कि उस बचे हुए समय का हम क्या कर रहे हैं? अधिकांश लोग उस समय का उपयोग एआई को और डेटा देने में कर रहे हैं। यानी इंसान एआई से समय बचाकर खुद को बेकार कर रहा है।
प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक युवाल नोआ हरारी (Yuval Noah Harari) पिछले कई वर्षों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के अनियंत्रित प्रसार पर चेतावनी देते आ रहे हैं। अपनी हालिया पुस्तक 'Nexus' और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दिए गए वक्तव्यों में हरारी ने एआई विकास की वर्तमान गति की तुलना दवा उद्योग से की है।
हरारी का मुख्य तर्क है जब कोई फ़ार्मास्यूटिकल कंपनी नई दवा बनाती है, तो उसे बाज़ार में उतारने से पहले कई सालों तक कड़े क्लिनिकल ट्रायल्स से गुज़रना पड़ता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि दवा बीमारी तो ठीक कर रही है, लेकिन मरीज की जान नहीं ले रही। इसके विपरीत, टेक कंपनियों ने बिना किसी सुरक्षा जांच या 'सोशियोलॉजिकल ट्रायल' के एआई जैसी अत्यंत शक्तिशाली तकनीक को सीधे 8 अरब लोगों के हाथों में थमा दिया है।
एआई को केवल उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक सीमित रखना चाहिए था जहाँ इसकी वाकई आवश्यकता है जैसे कि जटिल चिकित्सा, जलवायु परिवर्तन की पहचान, और राष्ट्रीय सुरक्षा। हर छोटी-मोटी चीज़ (जैसे गाना बजाना, बेसिक ड्राफ्ट लिखना, या दैनिक दिनचर्या का निर्णय लेना) में एआई को घुसाने की आवश्यकता नहीं थी।
जब इंसान अपने छोटे-छोटे रूटीन कामों के लिए भी वॉइस असिस्टेंट या एआई पर निर्भर होने लगता है, तो वह केवल अपना समय नहीं बचा रहा होता, बल्कि वह अनजाने में एआई को ट्रेन कर रहा होता है। इंसान का हर एक्शन टेक-कंपनियों के लिए मुफ़्त डेटा बनता है, और बदले में इंसान अपनी सोचने, याद रखने और शारीरिक मेहनत करने की स्वाभाविक क्षमताओं को खोता चला जाता है।
एआई के इस अनियंत्रित विकास के बीच सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर दुनिया की अग्रणी एआई कंपनियों के भीतर एक बड़ा विद्रोह देखा गया है। हाल ही में एंथ्रोपिक (Anthropic) के रिसर्च स्कॉलर जैकोब कॉक्सन (Jacob Coxon) का इस्तीफा इस विवाद के केंद्र में आया।
जैकोब कॉक्सन, जो एंथ्रोपिक और OpenAI में कई वर्षों से कार्यरत गणितज्ञ और शोधकर्ता हैं, ने कंपनी से इस्तीफा देते हुए दुनिया के सामने यह खुलासा किया कि एआई कंपनियों के शीर्ष अधिकारी और वैज्ञानिक निजी बहसों में यह स्वीकार करते हैं कि एआई इंसानी सभ्यता को खत्म कर सकती है, लेकिन सार्वजनिक रूप से और मीडिया के सामने इस खतरे को बहुत छोटा करके दिखाया जाता है।
कंप्यूटर वैज्ञानिक और गूगल के पूर्व डायरेक्टर ऑफ इंजीनियरिंग रे कुर्ज़वील (Ray Kurzweil) का मानना है कि वर्ष 2029 वह सिंगुलैरिटी वर्ष (Singularity Milestone) होगा जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानी बुद्धि के स्तर को पार कर जाएगी । 2029 में इंसान से ज़्यादा स्मार्ट होने के बाद, 2045 तक एआई इंसानी बुद्धि से अरबों गुना आगे निकल जाएगी । वर्तमान समय से देखा जाए तो 2029 केवल 3 साल दूर है। इसका मतलब है कि जिस सुपरइंटेलिजेंस की चेतावनी युवाल नोआ हरारी और जैकोब कॉक्सन दे रहे हैं, वह दूर भविष्य की नहीं, बल्कि बहुत निकट की यथार्थता है।
मेरा मानना है कि एआई से अकारण डरने या इसे पूरी तरह नकारने की आवश्यकता नहीं है। एआई तकनीक अपने आप में केवल एक उपकरण है। मुख्य चिंता इसके अनियंत्रित विकास की गति और हर छोटे-बड़े इंसानी काम में इसके अनावश्यक उपयोग को लेकर है। जिस तरह मनुष्य ने पहिए या बिजली का आविष्कार किया, उसने अपने जीवन को आसान बनाया। लेकिन रूटीन के छोटे कामों (जैसे लाइट ऑन करना या अपनी पसंद का गाना चुनना) को भी मशीन के हवाले कर देना मनुष्य को सुस्त और निर्भर बना रहा है।
वैसे जब AI हमारी नौकरियां, कोड, आर्ट, और यहाँ तक कि बातें भी छीनने लगे, तब समझ आता है कि 'AI' का असली मतलब "अब तो 'A'ना 'I'धर ही पड़ेगा" (वापस गाँव) है!
स्मार्टफोन, चैटबॉट्स और रोबोट्स चाहे कितना भी दिमाग चला लें, लेकिन पेट भरने के लिए तो अंत में अन्न ही काम आएगा, और वह किसी सर्वर पर नहीं, बल्कि मिट्टी में उगेगा!
बढ़ती जनसंख्या और AI के इस बढ़ते दबदबे के बीच सबसे सुरक्षित, रियल और अन-हैकबल करियर एक ही है “स्मार्ट किसान"।
कोविड में भी लोग गांव लौटे थे , इसलिए कुछ भी खतरा हो गांव की ओर चलो, खेती किसानी पे ध्यान दो । फोटो लगाने के लिए कुछ तो ज़बरदस्ती की लाइन लिखनी थी,ऐसा नहीं है।





