डॉ. आशीष कुमार पाण्डेय
हिंदी विभाग, हंसराज कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
साहित्य में रामकथा भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक स्मृति नैतिक चेतना और जीवन-दर्शन का सबसे व्यापक एवं सर्वाधिक प्रभावशाली आख्यान है। भारतीय समाज ने अपने आदर्शों मर्यादाओं संघर्षों पारिवारिक मूल्यों राज्य-दृष्टि और लोकमंगल की कल्पना को सबसे अधिक यदि किसी चरित्र में मूर्त रूप दिया है तो वह राम हैं। यही कारण है कि राम केवल एक पौराणिक पात्र या आराध्य देवता नहीं बल्कि भारतीय मानस की सांस्कृतिक चेतना के शाश्वत प्रतीक हैं। वाल्मीकि के रामायण से लेकर भवभूति के उत्तररामचरित तुलसीदास के रामचरितमानस केशवदास की रामचंद्रिका मैथिलीशरण गुप्त के साकेत और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की राम की शक्ति-पूजा तक प्रत्येक रचनाकार ने राम को अपने समय की दृष्टि से देखा है। इसलिए रामकाव्य की परंपरा कभी स्थिर नहीं रही; वह निरंतर विकसित होती रही है। प्रत्येक युग ने अपने प्रश्नों के आलोक में राम की पुनर्व्याख्या की है और यही इस परंपरा की सबसे बड़ी जीवंतता है।
इक्कीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज भी अनेक प्रकार के नैतिक सामाजिक सांस्कृतिक और वैचारिक संक्रमणों से गुजर रहा है। मूल्य और बाज़ार परंपरा और आधुनिकता व्यक्तिवाद और लोकमंगल अधिकार और कर्तव्य के बीच निरंतर द्वंद्व उपस्थित है। ऐसे समय में यदि कोई रचनाकार रामकथा की ओर लौटता है तो उससे केवल कथा के पुनर्लेखन की अपेक्षा नहीं की जाती अपितु यह अपेक्षा की जाती है कि वह रामकथा के भीतर से आज के मनुष्य के लिए नए अर्थ खोजे। आशुतोष अग्निहोत्री का काव्य-संग्रह ‘सब पर राम : तपस्वी राजा’ इसी अर्थ में समकालीन हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक रामत्व की पुनर्खोज करती है साथ ही वर्तमान के नैतिक प्रश्नों के बीच राम के व्यक्तित्व को पुनः स्थापित करने का सृजनात्मक प्रयास है।
इस काव्य-संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक का लक्ष्य घटनाओं का विस्तार करना नहीं है। रामकथा के प्रसंग भारतीय समाज के लिए सर्वविदित हैं; इसलिए कवि उन घटनाओं को दुहराने में अपनी ऊर्जा व्यय नहीं करते। वे उन घटनाओं के पीछे छिपे मौन उन पात्रों के अंतर्मन में चल रहे संघर्ष उनकी संवेदनाओं उनके आत्मसंवाद और उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं को स्वर देते हैं। यही कारण है कि यह कृति कथा की अपेक्षा चेतना का काव्य अधिक प्रतीत होती है।
किसी भी साहित्यिक कृति का शीर्षक उसके संपूर्ण दर्शन का संकेतक होता है। इस दृष्टि से ‘सब पर राम तपस्वी राजा’ अत्यंत सार्थक और विचारोत्तेजक शीर्षक है। सामान्यतः राजा का संबंध शक्ति वैभव सामर्थ्य और शासन से जोड़ा जाता है जबकि तपस्वी त्याग संयम आत्मानुशासन और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है। पहली दृष्टि में ये अवधारणाएँ परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं किंतु आशुतोष अग्निहोत्री इन्हें राम के व्यक्तित्व में इस प्रकार एकाकार करते हैं कि यह विरोध स्वयं समाप्त हो जाता है। उनके यहाँ राम इसलिए महान नहीं हैं कि वे राजा हैं; वे इसलिए महान हैं कि राजा होकर भी तपस्वी हैं। वे सत्ता के उपभोगकर्ता नहीं सत्ता के संयमी साधक हैं। यह दृष्टि राम के चरित्र को धार्मिक आस्था से ऊपर उठाकर नैतिक नेतृत्व के आदर्श के रूप में स्थापित करती है। लेखक का यह दार्शनिक दृष्टिकोण समकालीन राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में भी अत्यंत अर्थपूर्ण हो उठता है।
कवि की रचनात्मक दृष्टि का परिचय प्रारंभिक रचनाओं से ही मिलने लगता है। वे लिखते हैं
‘वन-वन घूम देश को बाँधा दीन-दुखी को देकर काँधा।
तप से शठ अभिमान मिटाकर सीता को सम्मान दिलाकर’
पहली दृष्टि में यह एक सरल गीतात्मक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है किंतु इसकी व्यंजना अत्यंत व्यापक है। ‘देश को बाँधा’ का आशय केवल राम की वनयात्रा नहीं है; यह भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। राम उत्तर से दक्षिण और वन से नगर तक जिस प्रकार विभिन्न समुदायों जातियों जनजातियों और संस्कृतियों को जोड़ते हैं कवि उसी सांस्कृतिक सेतु का स्मरण कराते हैं। दूसरी पंक्ति ‘दीन-दुखी को देकर काँधा’ राम को शक्ति के प्रतीक के रूप में नहीं बल्कि करुणा के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। आधुनिक समय में नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान संवेदनशीलता मानी जाती है; कवि ने राम के इसी स्वरूप को अत्यंत सहजता से सामने रखा है। इन पंक्तियों में इतना व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक आशय समेट लेना कवि की परिपक्व अभिव्यक्ति का प्रमाण है।
इस संग्रह का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लेखक राम को अलौकिक चमत्कारों के देवता के रूप में प्रस्तुत नहीं करते। वे उन्हें मनुष्य की सर्वोच्च संभावनाओं के रूप में चित्रित करते हैं। यही कारण है कि इस कृति में राम का ईश्वरत्व उनके मनुष्यत्व के भीतर से प्रकट होता है। वे दुखी भी होते हैं निर्णय भी लेते हैं त्याग भी करते हैं किंतु प्रत्येक स्थिति में मर्यादा का पालन करते हैं। आशुतोष अग्निहोत्री की दृष्टि में राम की सबसे बड़ी शक्ति उनका धनुष नहीं उनका आत्मसंयम है; उनका सबसे बड़ा वैभव अयोध्या का सिंहासन नहीं लोककल्याण के लिए सब कुछ त्याग देने की क्षमता है। यही विचार इस पूरे काव्य-संग्रह की आत्मा बनकर बार-बार विभिन्न प्रसंगों में उभरता है।
यहीं से यह कृति अपने समय से संवाद करना प्रारंभ करती है। आज का समाज सफलता को पद प्रतिष्ठा और अधिकार से मापता है जबकि यह पुस्तक बार-बार यह स्थापित करती है कि चरित्र संयम और कर्तव्य ही मनुष्य की वास्तविक पहचान हैं।
मर्यादा का मनोविज्ञान : दशरथ, राम, कौशल्या और कैकेयी के माध्यम से मानवीय अंतर्द्वंद्व का सृजन
इस काव्य-संग्रह ‘सब पर राम : तपस्वी राजा’ की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि यह है कि लेखक ने रामायण के बहुचर्चित प्रसंगों को केवल घटनाओं के रूप में नहीं देखा बल्कि उन्हें मानवीय मनोविज्ञान के धरातल पर पुनः स्थापित किया है। यही कारण है कि इस कृति का पाठ करते समय पाठक को बार-बार यह अनुभव होता है कि वह किसी धार्मिक आख्यान का नहीं मनुष्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्षों का साक्षी है। लेखक ने कथा को इतिहास से उठाकर संवेदना के धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। यही उनकी मौलिकता है।
विशेष रूप से दशरथ और राम का संवाद इस कृति का भावात्मक तथा वैचारिक केंद्र है। भारतीय साहित्य में दशरथ को प्रायः वचनबद्ध राजा या पुत्र-वियोग से मृत पिता के रूप में देखा गया है किंतु आशुतोष अग्निहोत्री उनके व्यक्तित्व के एक ऐसे पक्ष को उद्घाटित करते हैं जिस पर अपेक्षाकृत कम विचार हुआ है। यहाँ दशरथ की सबसे बड़ी पीड़ा राम का वनगमन नहीं बल्कि अपने ही पुत्र के विश्वास के सम्मुख स्वयं को असहाय पाना है। यही कारण है कि वे कहते हैं
‘जो मस्तक पर मैं धारे था
वह मुकुट नहीं विश्वास पुत्र।’
इन दो पंक्तियों में कवि ने दशरथ के समूचे चरित्र का पुनर्सृजन कर दिया है। सामान्यतः मुकुट राजसत्ता का प्रतीक माना जाता है किंतु यहाँ वह विश्वास का रूपक बन जाता है। यह अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली प्रतीक-विधान है। लेखक संकेत करते हैं कि किसी राजा की वास्तविक शक्ति उसका राजदंड नहीं बल्कि उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। जिस क्षण विश्वास टूटता है उसी क्षण सत्ता का वैभव भी अपना अर्थ खो देता है। यह केवल दशरथ की आत्मस्वीकृति नहीं बल्कि प्रत्येक उत्तरदायी व्यक्ति के जीवन का शाश्वत सत्य है।
यहीं आशुतोष अग्निहोत्री अन्य रामकाव्यों से भिन्न दिखाई देते हैं। वे पात्रों को देवत्व के सिंहासन पर नहीं बैठाते वह राम को मनुष्य के रूप में समझने का प्रयास करते हैं। उनके दशरथ रोते हैं टूटते हैं आत्मग्लानि से भर जाते हैं और अपने निर्णयों का बोझ स्वयं उठाते हैं। यही मानवीय धरातल इस कृति को आधुनिक संवेदनशीलता से जोड़ता है।
इसी प्रकार राम का चरित्र भी यहाँ किसी चमत्कारी देवता का नहीं सिद्धांतों पर अडिग मनुष्य का चरित्र है। लेखक ने राम के व्यक्तित्व का सार अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया है
‘जो पद पाने की अभिलाषा में
गिर जाए वह राम नहीं।
जो अपनों से भी ज़्यादा
अपने को चाहे वह राम नहीं।’
यहाँ राम केवल वनगमन का औचित्य सिद्ध नहीं कर रहे वह नेतृत्व का शाश्वत सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे हैं। आज जब राजनीति प्रशासन शिक्षा और सामाजिक जीवन में पद को सेवा से अधिक महत्व मिलने लगा है तब ये पंक्तियाँ किसी नैतिक उद्घोष की तरह सामने आती हैं। कवि ने राम को इतिहास का पात्र नहीं रहने दिया; उन्होंने उन्हें समकालीन समाज के लिए नैतिक कसौटी बना दिया है। यही किसी कालजयी साहित्य की पहचान होती है।
इस संग्रह में कौशल्या का चित्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारतीय रामकाव्य परंपरा में कौशल्या को प्रायः धैर्य और करुणा की प्रतिमूर्ति के रूप में चित्रित किया गया है किंतु आशुतोष अग्निहोत्री उनके भीतर के उस स्वाभिमान और नैतिक प्रतिरोध को भी स्वर देते हैं जो एक माँ होने के साथ-साथ न्यायप्रिय स्त्री का भी है। उनके प्रश्न केवल पुत्र-वियोग की पीड़ा नहीं हैं; वे व्यवस्था से संवाद करते हैं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं कि राजधर्म के नाम पर मातृत्व की उपेक्षा कर दी जाए। इस प्रकार कौशल्या का चरित्र आधुनिक स्त्री-चेतना के निकट पहुँच जाता है। वे विद्रोह नहीं करतीं किंतु मौन भी नहीं रहतीं। उनके प्रश्नों में करुणा के साथ-साथ नैतिक साहस भी है।
कैकेयी का चित्रण इस कृति की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हिंदी साहित्य में कैकेयी को प्रायः एकांगी रूप से प्रस्तुत किया गया है मानो वे केवल महत्वाकांक्षा की प्रतीक हों। किंतु आशुतोष अग्निहोत्री इस रूढ़ छवि को तोड़ते हैं। वे कैकेयी के भीतर चल रहे द्वंद्व को बड़ी संवेदनशीलता से चित्रित करते हैं। उनके यहाँ कैकेयी अपराधबोध से भरी हुई स्त्री हैं जो एक ओर अपने निर्णय का भार उठाती हैं और दूसरी ओर राम के प्रति अपने स्नेह को भी छिपा नहीं पातीं। इस प्रकार लेखक कैकेयी को खलनायिका नहीं त्रासद मानवीय चरित्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
यही इस कृति की सबसे बड़ी शक्ति है कि लेखक किसी पात्र का न्यायाधीश नहीं बनते। वे न तो कैकेयी का महिमामंडन करते हैं और न ही उनका दानवीकरण। वे केवल उनके भीतर के मनुष्य को सामने लाते हैं। यही दृष्टि एक बड़े रचनाकार की पहचान है। साहित्य का कार्य निर्णय सुनाना नहीं बल्कि मनुष्य को उसकी सम्पूर्ण जटिलता के साथ समझना है। आशुतोष अग्निहोत्री इस कसौटी पर पूर्णतः सफल दिखाई देते हैं।
इन सभी प्रसंगों को पढ़ते हुए सहज ही अनुभव होता है कि लेखक ने रामायण के पात्रों को इतिहास की मूर्तियों के रूप में नहीं देखा बल्कि आज के मनुष्य की तरह समझा है। यही कारण है कि इस कृति के संवाद त्रेतायुग की घटनाएँ नहीं लगते वह हमारे अपने समय के नैतिक प्रश्न बन जाते हैं।
उपेक्षित पात्रों की पुनर्प्रतिष्ठा: उर्मिला, श्रुतकीर्ति, मन्दोदरी और स्त्री-चेतना का नवीन आख्यान
पुस्तक की सबसे बड़ी रचनात्मक उपलब्धियों में यदि किसी एक पक्ष का विशेष उल्लेख किया जाए तो निःसंदेह वह है रामायण के उन पात्रों को केंद्र में प्रतिष्ठित करना जो मूल कथा में उपस्थित तो हैं किंतु जिनकी संवेदनाएँ प्रायः महाकाव्य की विराटता के बीच दब जाती हैं। राम, सीता, लक्ष्मण और भरत जैसे प्रमुख पात्रों पर सदियों से विपुल साहित्य रचा गया है परंतु उर्मिला, श्रुतकीर्ति, माण्डवी, मन्दोदरी और यहाँ तक कि कैकेयी जैसी स्त्रियों के अंतर्मन तक बहुत कम कवि पहुँच पाए हैं। आशुतोष अग्निहोत्री की मौलिकता इसी बात में है कि उन्होंने इतिहास के मुख्य मंच पर नहीं बल्कि उसके नेपथ्य में जलते दीपकों को देखने का साहस किया है। यह दृष्टि केवल साहित्यिक नहीं सांस्कृतिक और मानवीय भी है।
भारतीय महाकाव्य परंपरा में अक्सर युद्ध विजय और राजधर्म की चर्चा अधिक हुई है जबकि मौन त्याग प्रतीक्षा और आत्मबलिदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। यह काव्य-संग्रह उसी विस्मृत पक्ष का पुनर्स्मरण है। लेखक मानो यह कहना चाहते हैं कि किसी भी महान इतिहास का निर्माण केवल वे लोग नहीं करते जिनके नाम इतिहास में दर्ज होते हैं; अनेक ऐसे व्यक्तित्व भी होते हैं जिनका त्याग इतिहास की नींव बनता है किंतु जिनकी कथा समय की धूल में दब जाती है। यह पुस्तक उन मौन पात्रों के प्रति साहित्य का एक विनम्र नमन है।
इस संदर्भ में उर्मिला पर लिखी गई कविताएँ पूरे संग्रह की सबसे मार्मिक उपलब्धियों में गिनी जा सकती हैं। हिंदी साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत के माध्यम से उर्मिला को नई प्रतिष्ठा दी थी किंतु आशुतोष अग्निहोत्री का दृष्टिकोण उससे भिन्न है। वे उर्मिला के त्याग का केवल वर्णन नहीं करते बल्कि उसके मनोविज्ञान में प्रवेश करते हैं। उर्मिला केवल लक्ष्मण की पत्नी नहीं हैं; वे उस स्त्री की प्रतिनिधि हैं जिसे जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बिना किसी यश, बिना किसी प्रशंसा और बिना किसी इतिहास के लड़ना पड़ता है।
कवि लिखते हैं
‘मुझको तो यह लगता था कि जीवन का मधुमास मिला
लेकिन मुझको वैभव की परिसीमा में वनवास मिला।’
इन पंक्तियों में निहित ‘वैभव की परिसीमा में वनवास’ जैसा रूपक हिंदी काव्य की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में स्थान पाने योग्य है। वनवास सामान्यतः अभाव कष्ट और कठिनाइयों का प्रतीक माना जाता है किंतु कवि ने राजमहल के भीतर के एकाकी जीवन को उससे भी बड़ा वनवास सिद्ध किया है। यह केवल उर्मिला की पीड़ा नहीं है; यह उन असंख्य स्त्रियों का सांस्कृतिक रूपक है जिनके जीवन में बाहरी वैभव होते हुए भी भावनात्मक रिक्तता बनी रहती है। यह अभिव्यक्ति पाठक को केवल द्रवित नहीं करती उसे स्त्री-जीवन के उस मौन पक्ष से परिचित कराती है जिसे साहित्य ने लंबे समय तक पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया।
उर्मिला के प्रसंगों में आशुतोष अग्निहोत्री का कविमन सबसे अधिक संवेदनशील दिखाई देता है। वे आँसुओं का वर्णन नहीं करते बल्कि उस मौन का चित्रण करते हैं जिसमें आँसू भी सूख जाते हैं। यही कारण है कि उर्मिला का चरित्र इस संग्रह में करुणा का नहीं बल्कि धैर्य और आत्मबल का प्रतीक बनकर उभरता है। यह प्रस्तुति आधुनिक स्त्री-विमर्श के अनेक बिंदुओं से संवाद करती है किंतु कहीं भी वैचारिक आग्रह का बोझ नहीं उठाती। कवि की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वे विचार को कविता बनने देते हैं।
यदि उर्मिला इस कृति की करुणा हैं तो श्रुतकीर्ति इसकी सबसे मौलिक खोज हैं। रामकाव्य परंपरा में श्रुतकीर्ति पर बहुत कम लिखा गया है। सामान्य पाठक तो अनेक बार उनका नाम तक स्मरण नहीं रख पाता। आशुतोष अग्निहोत्री ने इसी उपेक्षित पात्र को जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ चित्रित किया है वह इस संग्रह की विशिष्ट उपलब्धियों में गिना जाएगा।
श्रुतकीर्ति कहती हैं-
‘कभी किसी भी सघन पृष्ठ पर नाम नहीं दिख पाएगा
किन्तु कीर्ति के तरल हृदय में वही स्वतः लिख जाएगा।’
इन पंक्तियों की व्यंजना अत्यंत व्यापक है। यहाँ ‘सघन पृष्ठ’ केवल इतिहास नहीं है वह समूची सामाजिक स्मृति है जहाँ कुछ नाम बार-बार लिखे जाते हैं और कुछ नाम सदैव हाशिए पर रह जाते हैं। कवि ने अत्यंत सहज शब्दों में इतिहास और स्मृति के बीच का अंतर स्पष्ट कर दिया है। इतिहास नामों को दर्ज करता है किंतु हृदय त्याग को याद रखता है। यही इस कविता का सबसे बड़ा संदेश है।
श्रुतकीर्ति का चरित्र इस संग्रह में उन सभी अनाम व्यक्तित्वों का प्रतिनिधि बन जाता है जिनके त्याग के बिना कोई महान परंपरा संभव नहीं होती। आशुतोष अग्निहोत्री ने इस पात्र के माध्यम से वस्तुतः इतिहास-दृष्टि पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है। वे संकेत करते हैं कि इतिहास केवल विजेताओं का नहीं होना चाहिए; उसमें उन मौन आत्माओं का भी स्थान होना चाहिए जिन्होंने बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
मन्दोदरी का चित्रण भी उतना ही उल्लेखनीय है। सामान्यतः रामायण में मन्दोदरी को रावण की विवेकशील पत्नी के रूप में देखा जाता है किंतु यहाँ लेखक उनके भीतर के उस गहन संताप को शब्द देते हैं जो एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन बिताने की विवशता से उत्पन्न होता है जिसकी प्रतिभा उसके अहंकार के सामने पराजित हो चुकी है। मन्दोदरी के माध्यम से कवि केवल एक पत्नी का दुख नहीं कहते; वे यह स्थापित करते हैं कि किसी भी परिवार का सबसे बड़ा संकट बाहरी शत्रु नहीं बल्कि भीतर का अहंकार होता है।
रावण और मन्दोदरी के प्रसंगों में लेखक का दृष्टिकोण विशेष रूप से संतुलित है। वे न तो रावण का महिमामंडन करते हैं और न ही उसे एकरेखीय खलनायक बनाते हैं। जब रावण स्वीकार करता है-
‘सब कहते मुझको ज्ञानी हैं
पर ज्ञान बड़ा अभिमानी है।’
तो यह स्वीकारोक्ति केवल रावण की नहीं रह जाती; वह समूचे मानव इतिहास की त्रासदी बन जाती है। ज्ञान यदि विनम्रता से रहित हो जाए तो वह निर्माण नहीं विनाश का कारण बनता है। आशुतोष अग्निहोत्री ने इस छोटी-सी अभिव्यक्ति में भारतीय दर्शन का एक गहन सत्य समेट दिया है।
इस पूरे संग्रह का अध्ययन करते हुए यह स्पष्ट होता है कि लेखक स्त्री-पात्रों को केवल करुणा का विषय नहीं बनाते। वे उन्हें विचार विवेक धैर्य और नैतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। कौशल्या के प्रश्न हों, कैकेयी की ग्लानि हो, उर्मिला की प्रतीक्षा हो, श्रुतकीर्ति का मौन हो या मन्दोदरी का विवेक सभी पात्र अपनी स्वतंत्र मानवीय पहचान के साथ उपस्थित हैं। यह दृष्टि इस कृति को आधुनिक संवेदना से जोड़ती है।
भाषा शिल्प काव्य-सौंदर्य और समकालीन संदर्भ : ‘सब पर राम : तपस्वी राजा’ का साहित्यिक वैशिष्ट्य
किसी भी काव्य-कृति का स्थायित्व केवल उसके कथ्य से निर्धारित नहीं होता; उसकी वास्तविक शक्ति उसकी अभिव्यक्ति भाषा शिल्प प्रतीक-योजना और भाव-संरचना में निहित होती है। अनेक बार विषय अत्यंत महान होता है किंतु भाषा उसका साथ नहीं दे पाती और अनेक बार भाषा इतनी अलंकृत हो जाती है कि भाव उससे पीछे छूट जाते हैं। आशुतोष अग्निहोत्री का काव्य-संग्रह इस दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यहाँ कथ्य और शिल्प का संतुलन अत्यंत स्वाभाविक रूप में उपस्थित हुआ है। कवि न तो भाषा के वैभव का अनावश्यक प्रदर्शन करते हैं और न ही भावों को अत्यधिक सरल बनाकर उनकी गरिमा कम होने देते हैं। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ गरिमा भी है लोकजीवन की आत्मीयता भी है गीतात्मक प्रवाह भी है और संवाद की सहजता भी। यही संतुलन इस संग्रह को विद्वानों और सामान्य पाठकों दोनों के लिए समान रूप से ग्राह्य बनाता है।
आशुतोष अग्निहोत्री की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें कृत्रिमता नहीं है। रामकथा जैसा विषय सहज ही अलंकारिक अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ और उपदेशात्मक भाषा की ओर ले जा सकता था किंतु कवि ने इस प्रलोभन से स्वयं को बचाया है। उनकी भाषा में शास्त्रीय गरिमा तो है पर वह बोझिल नहीं होती; उसमें भावुकता है पर वह भावुकतावाद नहीं बनती; उसमें दर्शन है पर वह दुरूह नहीं होता। यह संतुलन किसी भी परिपक्व कवि की पहचान है।
इस संग्रह का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका संवाद-विधान है। सामान्यतः आधुनिक कविता आत्मकथात्मक या वर्णनात्मक शैली की ओर अधिक उन्मुख दिखाई देती है जबकि आशुतोष अग्निहोत्री ने संवाद को अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाया है। यही कारण है कि उनकी अनेक कविताएँ पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई नाट्य-दृश्य हमारे सामने घटित हो रहा हो। पात्र केवल शब्द नहीं बोलते वे अपने भीतर की संपूर्ण भाव-भूमि के साथ उपस्थित होते हैं। दशरथ की विवशता, कौशल्या का प्रश्न, कैकेयी की ग्लानि, उर्मिला का मौन, श्रुतकीर्ति का आत्मसंयम और रावण का आत्मबोध ये सभी संवाद पाठक के मन में दृश्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। यह नाटकीयता कृत्रिम नहीं बल्कि भावों की स्वाभाविक परिणति है।
इस कृति की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता इसका प्रतीक-विधान है। आशुतोष अग्निहोत्री वस्तुओं को केवल वस्तु नहीं रहने देते; वे उन्हें विचार और दर्शन का प्रतीक बना देते हैं। ‘मुकुट’ राजसत्ता से आगे बढ़कर विश्वास का प्रतीक बन जाता है; ‘वनवास’ केवल भौगोलिक दूरी नहीं रह जाता बल्कि आत्मानुशासन त्याग और आंतरिक साधना का रूप ग्रहण कर लेता है; ‘सेतु’ केवल समुद्र पर बना पुल नहीं बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच विश्वास करुणा और सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक बन जाता है; ‘तप’ केवल धार्मिक साधना नहीं बल्कि चरित्र-निर्माण और आत्मविजय की प्रक्रिया बनकर उभरता है। यही बहुस्तरीय प्रतीकात्मकता इस संग्रह को बार-बार पढ़े जाने योग्य बनाती है।
यदि इस पुस्तक की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता का उल्लेख करना हो तो वह है इसके भीतर प्रवाहित मानवीय संवेदना। लेखक ने कहीं भी पात्रों पर अपने विचार आरोपित नहीं किए हैं। वे उन्हें बोलने देते हैं, उन्हें रोने देते हैं, उन्हें प्रश्न करने देते हैं, उन्हें पश्चाताप करने देते हैं और अंततः उन्हें स्वयं अपने सत्य तक पहुँचने देते हैं। यही कारण है कि यह कृति उपदेश नहीं देती अपितु आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। एक बड़ा साहित्य वही होता है जो पाठक को उत्तर देने के बजाय प्रश्नों के साथ छोड़ जाए। आशुतोष अग्निहोत्री इस कसौटी पर पूर्णतः सफल सिद्ध होते हैं।
समकालीन हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में इस कृति का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। वर्तमान समय में पौराणिक आख्यानों का पुनर्पाठ अनेक स्तरों पर हो रहा है। कहीं उन्हें वैचारिक विमर्श का माध्यम बनाया जा रहा है, कहीं राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है और कहीं सांस्कृतिक पहचान के आधार के रूप में। ऐसे समय में ‘सब पर राम : तपस्वी राजा’ इन सभी सीमाओं से ऊपर उठकर रामकथा को मूलतः मानवीय संवेदना के धरातल पर पुनः स्थापित करती है। यह पुस्तक मनुष्य के भीतर निहित मर्यादा करुणा त्याग और आत्मसंयम की पुनर्खोज है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
आशुतोष अग्निहोत्री की यह विशेषता भी उल्लेखनीय है कि वे राम को इतिहास का विषय नहीं रहने देते; वे उन्हें वर्तमान का नैतिक संदर्भ बना देते हैं। उनके यहाँ राम केवल त्रेतायुग के नायक नहीं हैं आज के समाज के लिए भी उतने ही आवश्यक मूल्य हैं। यही कारण है कि इस पुस्तक की अनेक पंक्तियाँ पाठ समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक पाठक के भीतर गूँजती रहती हैं। यही किसी प्रभावशाली साहित्य की सबसे बड़ी पहचान है।
यदि समकालीन हिंदी रामकाव्य की परंपरा में इस पुस्तक का स्थान निर्धारित किया जाए तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ‘सब पर राम : तपस्वी राजा’ उन कृतियों में सम्मिलित है जिन्होंने रामकथा के बहुचर्चित प्रसंगों से अधिक उसके मौन प्रदेशों को स्वर दिया है। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह प्रसिद्ध कथा में भी अप्रकाशित भावों का अन्वेषण करता है। लेखक ने रामायण को दोहराया नहीं बल्कि उसके भीतर छिपी हुई मानवीय संवेदनाओं का पुनः आविष्कार किया है। यही किसी भी मौलिक रचनाकार का सबसे बड़ा साहित्यिक गुण है।




