टाटा के बोर्डरूम में घमासान, दिल्ली में सियासत... सवाल चंद्रशेखरन की कुर्सी का नहीं, देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने की आजादी का है
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि टाटा समूह को 'आपराधिक तरीके से बर्बाद' किया जा रहा है। जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन्हें हर कारोबारी विवाद का राजनीतिकरण न करने की सलाह दी है।

अमित पांडे: संपादक
जिस टाटा ग्रुप को भारत में भरोसे, कारोबारी साख और संस्थागत मूल्यों की मिसाल माना जाता है, आज उसी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर नोएल टाटा ने सवाल उठाए हैं। मामला बोर्ड की बैठकों, वोटिंग और कंपनी के नियमों से निकलकर देश की राजनीति तक पहुंच चुका है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि टाटा समूह को 'आपराधिक तरीके से बर्बाद' किया जा रहा है। जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन्हें हर कारोबारी विवाद का राजनीतिकरण न करने की सलाह दी है।
लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच असली सवाल कहीं पीछे छूट रहा है। आखिर टाटा जैसे बड़े कारोबारी समूह का भविष्य कौन तय करेगा—कंपनी के नियम, उसके शेयरधारक और बोर्ड या राजनीतिक ताकतों का प्रभाव?
टाटा की लड़ाई में आखिर दांव पर क्या लगा है?
विवाद की शुरुआत 17 सितंबर की टाटा संस बोर्ड बैठक से हुई, जिसमें चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से अगले पांच साल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले को चुनौती दी है। 26 अक्टूबर को कंपनी सेक्रेटरी को लिखे पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव बैठक के तय एजेंडे में शामिल नहीं था और जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
विवाद का सबसे अहम पहलू वोटिंग से जुड़ा है।
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है। बोर्ड में ट्रस्ट्स के दो नामित डायरेक्टर हैं—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन। चंद्रशेखरन की नियुक्ति के मामले में दोनों की राय अलग थी।
नोएल टाटा का तर्क है कि कंपनी के नियमों के मुताबिक ट्रस्ट्स के नामित डायरेक्टरों का जरूरी समर्थन मिले बिना प्रस्ताव वैध नहीं हो सकता।
दूसरी तरफ टाटा संस का कहना है कि बोर्ड ने बहुमत से फैसला लिया है और नियुक्ति कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक हुई है। कंपनी अपने पक्ष में कानूनी राय का भी हवाला दे चुकी है।
यहां किसी एक पक्ष की बात को अंतिम सच मानना जल्दबाजी होगी। विवाद का फैसला कंपनी के दस्तावेजों, नियमों और जरूरत पड़ने पर सक्षम कानूनी मंच के आधार पर ही होना चाहिए।
लेकिन टाटा जैसी संस्था में नेतृत्व के इतने अहम फैसले पर इस स्तर का टकराव अपने आप में कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए गंभीर चुनौती है।
राहुल गांधी के आरोप और सरकार की सफाई के बीच छिपा बड़ा सवाल
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि देश के कारोबारियों में डर का माहौल है। उन्होंने सवाल किया कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस से जुड़े प्रतिनिधियों को अमित शाह के आवास पर किस कानूनी या कारोबारी मामले के लिए बुलाया गया था।
निर्मला सीतारमण ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि व्यावसायिक और कानूनी मामलों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक बताना उचित नहीं है।
दोनों पक्षों की बातें अपने-अपने राजनीतिक नजरिए से सामने आई हैं। लेकिन किसी कारोबारी विवाद को 'आपराधिक साजिश' बताने के लिए ठोस सबूत चाहिए। अभी सार्वजनिक जानकारी के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
उसी तरह सरकार से जुड़े लोगों की कारोबारी समूह के प्रतिनिधियों से मुलाकात अपने आप में अनुचित हस्तक्षेप का प्रमाण नहीं है।
फिर भी जब मुलाकात किसी बड़े संस्थागत विवाद के बीच हो, तो उसकी प्रकृति और उद्देश्य को लेकर पारदर्शिता जरूरी हो जाती है।
सरकार उद्योग जगत की समस्याएं सुन सकती है। लेकिन किसी निजी कंपनी में नेतृत्व और प्रबंधन के फैसलों की वैधता तय करना उसके बोर्ड, शेयरधारकों, नियामकों और संबंधित कानूनी संस्थाओं का काम है।
इन भूमिकाओं के बीच फर्क बना रहना चाहिए।
टाटा संस की लिस्टिंग पर विवाद भी कम बड़ा नहीं
चंद्रशेखरन की नियुक्ति इस पूरे विवाद का सिर्फ एक हिस्सा है।
दूसरा बड़ा मुद्दा टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने का है। भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी के नियमों का पालन करने को कहा है। इस नियामकीय व्यवस्था में लिस्टिंग की शर्त भी शामिल है।
नोएल टाटा टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखने के पक्ष में रहे हैं। वहीं करीब 18.37 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह लिस्टिंग को अपनी हिस्सेदारी का मूल्य हासिल करने के अवसर के रूप में देखता है।
टाटा ट्रस्ट्स की बड़ी हिस्सेदारी का एक खास महत्व है। इन ट्रस्ट्स से जुड़ी संपत्ति और आय का संबंध परोपकारी गतिविधियों से भी है। इसलिए यहां फैसले सिर्फ किसी एक चेयरमैन की कुर्सी या शेयर बाजार की वैल्यूएशन तक सीमित नहीं हैं।
दूसरी ओर, बड़े कारोबारी समूहों के लिए वित्तीय पारदर्शिता, शेयरधारकों के अधिकार और नियामकीय जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
यही वजह है कि टाटा संस की लिस्टिंग पर बहस को केवल निजी नियंत्रण बनाम शेयर बाजार की लड़ाई मानना अधूरा नजरिया होगा।
टाटा की साख किसी एक व्यक्ति से बड़ी है
टाटा समूह पहले भी नेतृत्व को लेकर बड़े विवाद देख चुका है। 2016 में साइरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद लंबी कानूनी लड़ाई चली थी।
आज फिर एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है।
टाटा परिवार की विरासत का सम्मान अपनी जगह है। कंपनी चलाने वाले पेशेवर नेतृत्व की भूमिका अपनी जगह। लेकिन दोनों से ऊपर संस्था के नियम और उसकी जवाबदेही होनी चाहिए।
अगर नोएल टाटा की आपत्तियां सही हैं, तो उनका निष्पक्ष समाधान जरूरी है। अगर टाटा संस की नियुक्ति प्रक्रिया वैध है, तो संबंधित दस्तावेजों और कानूनी आधार के जरिए यह बात स्पष्ट होनी चाहिए।
कंपनी के बोर्ड मिनट्स, वोटिंग रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का जवाब देना उसकी संस्थागत विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है।
राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण की राजनीतिक बहस सुर्खियां बना सकती है, लेकिन उससे यह तय नहीं होगा कि नियुक्ति वैध थी या नहीं।
टाटा समूह की असली परीक्षा यह नहीं है कि नोएल टाटा या एन. चंद्रशेखरन में किसकी बात मानी जाती है। असली परीक्षा यह है कि इतना बड़ा संस्थान अपने भीतर पैदा हुए मतभेदों को नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही के जरिए कैसे सुलझाता है।
टाटा की पहचान किसी एक नेता, चेयरमैन या सरकार से नहीं बनी है। इसे खड़ा करने में पीढ़ियों का वक्त लगा है।
इसलिए यह विवाद किसी व्यक्ति की जीत या हार पर खत्म नहीं होना चाहिए। इसका समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे यह भरोसा मजबूत हो कि भारत की बड़ी कारोबारी संस्थाओं में फैसले नियमों से होते हैं, न कि किसी व्यक्ति के प्रभाव से।
क्योंकि कंपनियां व्यक्तियों से बड़ी तभी बनती हैं, जब उनके नियम व्यक्तियों से ऊपर हों।