दिल्ली-गुवाहाटी बुलेट ट्रेन: सिलीगुड़ी के 'चिकन नेक' पर फंसा पेंच, लागत होगी कई गुना ज्यादा
दिल्ली से गुवाहाटी तक बुलेट ट्रेन के विस्तार को मंजूरी मिल गई है, लेकिन 'चिकन नेक' इलाके की तकनीकी चुनौतियां बढ़ा सकती हैं प्रोजेक्ट की लागत।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने दिल्ली से गुवाहाटी तक बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के विस्तार को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट देश की राजधानी को पूर्वोत्तर भारत से हाई-स्पीड कनेक्टिविटी के जरिए जोड़ेगा, जिससे यात्रा का समय घटकर 8 घंटे से भी कम रह जाएगा। हालांकि, इस सपने को हकीकत में बदलने के रास्ते में एक बड़ी तकनीकी बाधा खड़ी है, जिसे पार करना इंजीनियरों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस प्रोजेक्ट की प्रगति और इसमें आने वाली मुश्किलों पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि दिल्ली से गुवाहाटी तक का यह रूट आगरा, कानपुर, लखनऊ, अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, पटना और सिलीगुड़ी जैसे प्रमुख शहरों से होकर गुजरेगा। लेकिन असली समस्या सिलीगुड़ी कॉरिडोर में है, जिसे 'चिकन नेक' (Chicken's Neck) के नाम से जाना जाता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की तकनीकी चुनौती और बढ़ता खर्च
मुख्यमंत्री सरमा के अनुसार, सिलीगुड़ी का यह इलाका महज 16 से 22 किलोमीटर चौड़ा है, जहाँ जमीन की भारी कमी है। इस संकरे गलियारे में पहले से ही नेशनल हाईवे और रेलवे ट्रैक मौजूद हैं, जिसके कारण हाई-स्पीड रेल लाइन के लिए मौजूदा बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करना संभव नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए अब दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है:
- एलिवेटेड ट्रैक: जमीन की कमी को देखते हुए पटरियों को ऊपर उठाकर बनाया जाए।
- अंडरग्राउंड टनल: जमीन के नीचे सुरंग बनाकर ट्रेन को निकाला जाए।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इन विशेष इंजीनियरिंग जरूरतों की वजह से इस प्रोजेक्ट की लागत एक सामान्य हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट के मुकाबले दो से तीन गुना तक बढ़ सकती है। फिलहाल यह परियोजना प्लानिंग और फिजिबिलिटी स्टेज पर है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में रेल मंत्रालय रूट अलाइनमेंट, निर्माण की समय सीमा और कुल लागत का आकलन कर रहा है। सीएम सरमा ने संकेत दिया है कि वह अपनी अगली दिल्ली यात्रा के दौरान रेल मंत्री के साथ इन तकनीकी बारीकियों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।