अमित पांडे: संपादक

क्या भारत विकसित भारत के अपने बड़े सपने के बीच अचानक उस पुराने मोड़ पर लौट आया है, जहाँ उसे गांधी और अंबेडकर को फिर से पढ़ना पड़ेगा? यह सवाल आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि हल्द्वानी की घटना ने केवल एक राजनीतिक विवाद को जन्म नहीं दिया, बल्कि भारतीय समाज के उस पुराने जख्म को फिर सामने ला दिया है जिसे संविधान, स्वतंत्रता और आधुनिक लोकतंत्र के बावजूद हम पूरी तरह भर नहीं पाए हैं।

8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा हुई। दो दिन बाद उसी स्थान पर कथित तौर पर ‘शुद्धिकरण’ का आयोजन किया गया। खड़गे ने इसे अस्पृश्यता के दर्द से जोड़ा और मामला संसद तक पहुंचा। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने भी घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जांच की बात कही।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि खड़गे ने भाषण में क्या कहा था या किस संगठन ने शुद्धिकरण कराया। असली सवाल यह है कि 21वीं सदी के भारत में किसी सार्वजनिक मंच को किसी व्यक्ति की जाति या सामाजिक पहचान के कारण ‘शुद्ध’ करने का विचार आखिर पैदा कैसे होता है?

गांधी ने अस्पृश्यता को केवल सामाजिक बुराई नहीं माना था। उन्होंने इसे पाप कहा था। उनके लिए किसी मनुष्य को उसके जन्म के कारण छूने योग्य या अछूत मानना मनुष्य और ईश्वर दोनों का अपमान था। गांधी ने यहां तक कहा कि यदि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा है, तो वह ऐसा हिंदू धर्म स्वीकार करने के बजाय उसके मर जाने को बेहतर समझेंगे।

लेकिन गांधी की आलोचना यहीं समाप्त नहीं होती। उनकी जाति और वर्ण को लेकर सोच समय के साथ बदली और उसमें अंतर्विरोध भी रहे। दूसरी ओर डॉ. भीमराव अंबेडकर का प्रश्न कहीं अधिक बुनियादी था—सिर्फ अस्पृश्यता हटाने से क्या जाति समाप्त हो जाएगी? उनका उत्तर था, नहीं।

यही कारण है कि 1936 में ‘Annihilation of Caste’ लिखते हुए अंबेडकर ने कांग्रेस के पुराने राजनीतिक दृष्टिकोण की कठोर आलोचना की। उन्होंने 1892 में कांग्रेस अध्यक्ष डब्ल्यू.सी. बनर्जी के उस तर्क को सामने रखा जिसमें सामाजिक सुधार और राजनीतिक सुधार के बीच संबंध से इनकार किया गया था। अंबेडकर ने पलटकर पूछा—यदि कोई समाज अपने ही लोगों को सार्वजनिक कुओं, स्कूलों और सड़कों के इस्तेमाल से रोकता है, तो क्या वह राजनीतिक सत्ता संभालने के योग्य है?

अंबेडकर का मूल तर्क बेहद आधुनिक था। राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब सामाजिक स्वतंत्रता भी हो। विदेशी शासन से मुक्ति जरूरी है, लेकिन यदि स्वतंत्र भारत में एक भारतीय दूसरे भारतीय को जन्म के आधार पर नीचा समझता रहे, तो स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। उनके लिए जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं थी; वह सत्ता, सम्मान, अवसर और मनुष्य की गरिमा को बांटने वाली व्यवस्था थी।

आज यही सवाल हमारे सामने फिर खड़ा है।

भारत चंद्रमा पर पहुंच चुका है। डिजिटल भुगतान ने दुनिया को चौंकाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष अनुसंधान और स्टार्टअप की बात हो रही है। हम 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य रख रहे हैं। लेकिन उसी समाज में अगर किसी दलित नेता के भाषण के बाद सार्वजनिक मंच के ‘शुद्धिकरण’ की कल्पना सामने आती है, तो हमें कुछ देर रुककर सोचना चाहिए कि हमारी तकनीकी आधुनिकता और सामाजिक आधुनिकता के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है।

यहां भाजपा या कांग्रेस का सवाल नहीं है। यही इस बहस की सबसे कठिन बात है।

खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लेकिन वे किसी ‘अभिजात’ जाति से नहीं आते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं बार-बार अपने पिछड़े सामाजिक वर्ग से आने की बात राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाते रहे हैं। इसलिए सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय राजनीति में जाति अब सामाजिक अन्याय मिटाने का साधन कम और राजनीतिक पहचान बनाने का उपकरण अधिक हो गई है?

यदि कोई दलित व्यक्ति कांग्रेस में है तो क्या वह ‘अभिजात’ हो जाता है? और यदि कोई पिछड़ा व्यक्ति भाजपा में है तो क्या उसकी सामाजिक स्थिति अपने आप ‘अगड़ी’ हो जाती है? यह तर्क जितना राजनीतिक है, उतना ही खतरनाक भी। जाति सत्ता बदलने से समाप्त नहीं होती। सत्ता में किसी जाति के व्यक्ति की मौजूदगी और समाज से जातिगत भेदभाव के समाप्त होने के बीच बहुत बड़ा अंतर है।

भारत की राजनीति ने पिछले दशकों में जाति को खत्म करने के बजाय अक्सर उसे चुनावी गणित में बदल दिया है। कभी पिछड़ा, कभी दलित, कभी सवर्ण, कभी अति-पिछड़ा—राजनीतिक दलों ने सामाजिक पहचान को प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ने के बजाय कई बार उसे वोट-बैंक की भाषा में सीमित कर दिया। परिणाम यह है कि जाति सामाजिक न्याय का प्रश्न होने के साथ-साथ राजनीतिक हथियार भी बन गई।

यहीं गांधी और अंबेडकर आज फिर प्रासंगिक हो जाते हैं।

गांधी हमें बताते हैं कि किसी मनुष्य को छूने से धर्म अपवित्र नहीं होता; मनुष्य को अपमानित करने से समाज अपवित्र होता है। अंबेडकर इससे आगे जाकर कहते हैं कि समस्या केवल व्यक्ति के व्यवहार में नहीं, उस सामाजिक संरचना में है जो जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को स्थायी बनाती है। गांधी आत्मशुद्धि की बात करते हैं; अंबेडकर सामाजिक संरचना के पुनर्निर्माण की। दोनों की राहें अलग थीं, लेकिन अस्पृश्यता और सामाजिक अपमान के खिलाफ उनका नैतिक आग्रह आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

और शायद यही वह जगह है जहां ‘विकसित भारत’ के नारे की वास्तविक परीक्षा होती है।

विकास केवल एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन, डिजिटल इंडिया, जीडीपी और अंतरिक्ष मिशन का नाम नहीं है। विकास उस दिन दिखाई देगा जब किसी बच्चे को स्कूल में उसकी जाति के कारण अलग नहीं बैठना पड़ेगा; जब किसी गांव में कुएं का पानी जाति देखकर नहीं मिलेगा; जब किसी सार्वजनिक मंच को किसी व्यक्ति की उपस्थिति से ‘अपवित्र’ मानने की मानसिकता समाप्त होगी; और जब किसी नागरिक की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और नागरिक अधिकारों से होगी।

अंबेडकर ने जाति को ‘श्रम का विभाजन’ भर नहीं माना था; उन्होंने इसे मनुष्यों का विभाजन कहा। गांधी ने भी माना कि मनुष्य द्वारा मनुष्य की सामाजिक अवमानना सभ्यता के विरुद्ध है।

इसलिए हल्द्वानी की घटना को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई बनाकर देखना इस देश के साथ अन्याय होगा। यह घटना भारतीय समाज के सामने एक बड़ा आईना है। राजनीतिक दल इस आईने को अपने-अपने रंग से ढक सकते हैं, लेकिन उसमें दिखाई देने वाली तस्वीर नहीं बदलेगी।

हम यदि 2047 का विकसित भारत चाहते हैं तो हमें केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं, सामाजिक आधुनिकता का भी लक्ष्य तय करना होगा। भारत को विश्वगुरु बनने से पहले अपने भीतर के उस नागरिक को पहचानना होगा जिसे सदियों तक छुआ तक नहीं गया।

किसी व्यक्ति का जन्म उसके हाथ में नहीं होता। वह किस परिवार, जाति या कुल में पैदा होगा, यह प्रकृति तय करती है। लेकिन वह कैसा मनुष्य बनेगा—सद्गुणी या दुराचारी, न्यायप्रिय या अन्यायी—यह उसके कर्म तय करते हैं। आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने मनुष्य की गरिमा को जन्म से अलग करके नागरिकता से जोड़ दिया।

इसलिए आज जरूरत गांधी को केवल तस्वीरों में लगाने और अंबेडकर को केवल संविधान दिवस पर याद करने की नहीं है। जरूरत उनके सबसे कठिन सवालों का सामना करने की है।

विकसित भारत का रास्ता केवल नई तकनीक से नहीं निकलेगा। वह उस दिन निकलेगा जब भारत को किसी मंच को ‘शुद्ध’ करने की जरूरत महसूस नहीं होगी।