अररिया: खेती के साथ मछली पालन बना किसानों की कमाई का नया जरिया
अररिया के किसान खेती के साथ मछली पालन अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं। जानें कैसे बायो फ्लॉक और वैज्ञानिक तरीके से बदल रही है उनकी किस्मत।

बिहार के अररिया जिले में अब किसान सिर्फ पारंपरिक खेती पर निर्भर नहीं हैं। जिले के ग्रामीण इलाकों में खेती के साथ-साथ मछली पालन आमदनी का एक शानदार विकल्प बनकर उभरा है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार देखने को मिल रहा है। जिला मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन में फारबिसगंज, भरगामा और नरपतगंज जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन किया जा रहा है।
आजकल के किसान केवल पुराने तरीकों पर नहीं, बल्कि बायो फ्लॉक जैसी आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन का सहारा ले रहे हैं। तालाबों का सही निर्माण और मछली की सही प्रजातियों का चुनाव कर किसान अपनी कमाई को कई गुना बढ़ा रहे हैं। इस बदलाव का असर यह हुआ है कि बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों को अपने ही गांव में रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
सफलता का मंत्र: सही प्रजाति और वैज्ञानिक देखरेख
भरगामा के किसान राजकुमार गुप्ता और फारबिसगंज के पीयूष मिश्रा का मानना है कि बाजार में मछली की मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए यदि योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो यह व्यवसाय बेहद लाभदायक है। उन्होंने मछली पालन शुरू करने वाले नए लोगों को कुछ जरूरी सुझाव दिए हैं:
- पानी की जांच: मछली पालन शुरू करने से पहले तालाब की स्थिति और पानी की गुणवत्ता की जांच करना अनिवार्य है।
- सही चयन: मछली की ऐसी प्रजाति चुनें जो स्थानीय वातावरण के अनुकूल हो और जिसकी बाजार में मांग हो।
- संतुलित आहार: मछलियों की तेजी से वृद्धि के लिए उन्हें समय पर संतुलित आहार देना और तालाब की नियमित सफाई करना जरूरी है।
- सतर्कता: पानी की गुणवत्ता में लापरवाही बरतने से मछलियों की ग्रोथ रुक सकती है, जिससे आर्थिक नुकसान का खतरा रहता है।
जिला मत्स्य पदाधिकारी ने इस दिशा में किसानों को प्रोत्साहित करते हुए कहा है कि मत्स्य विभाग के विशेषज्ञों की सलाह लेकर काम करना सबसे बेहतर रहता है। इससे न केवल उत्कृष्ट प्रजातियों का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को इसे स्वरोजगार के तौर पर अपनाने की सलाह दी है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।