बिहार में शराब बंद पर बढ़ा नशीले पदार्थो का सेवन , ड्रग्स के आंकड़ों ने चौंकाया
बिहार में शराबबंदी के 10 साल बाद अब सिंथेटिक ड्रग्स और ब्राउन शुगर का जाल फैल रहा है। देखें चौंकाने वाले आंकड़े।

बिहार में शराबबंदी कानून लागू हुए एक दशक बीत चुका है, लेकिन अब राज्य के सामने एक नई और अधिक खतरनाक चुनौती खड़ी हो गई है। शराब पर पाबंदी के बाद लोगों का रुझान अब घातक नशीले पदार्थों की ओर बढ़ गया है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि राज्य में नार्कोटिक्स का कारोबार और सेवन इतनी तेजी से बढ़ा है कि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में दर्ज एनडीपीएस (NDPS) मामलों की संख्या 2022 के पूरे साल के कुल मामलों से भी ज्यादा हो गई है।
शराब की कमी ने एक तरह से 'सब्सटिट्यूशन इफेक्ट' पैदा कर दिया है, जहाँ लोग अब शराब के बजाय हार्ड ड्रग्स का सहारा ले रहे हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जहाँ एक तरफ पुलिस ने 2016 से अब तक करीब 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त की और 7.15 लाख लोगों को गिरफ्तार किया, वहीं दूसरी तरफ सिंथेटिक ड्रग्स का बाजार चुपके से फल-फूल रहा है।
दवाइयों और इंजेक्शनों की तस्करी में भारी उछाल
बिहार पुलिस मुख्यालय और स्पेशल टास्क फोर्स के आंकड़े इस संकट की गहराई को बयां करते हैं। साल 2022 में जहां केवल 29,762 फार्मास्युटिकल टैबलेट्स जब्त की गई थीं, वहीं 2026 के पहले पांच महीनों में ही यह संख्या बढ़कर 9.29 लाख तक पहुंच गई है। यही हाल नशीले इंजेक्शनों का है, जिनकी बरामदगी 2022 के 3,677 से बढ़कर 2026 के शुरुआती महीनों में 3.83 लाख हो गई है। मई 2026 तक दर्ज एनडीपीएस मामले 1,905 तक पहुंच गए, जबकि 2022 में पूरे साल केवल 1,822 मामले दर्ज हुए थे।
इस बदलाव के पीछे आर्थिक कारण भी हैं। बिहार के ब्लैक मार्केट में भारतीय व्हिस्की की एक बोतल, जिसकी कीमत अन्य राज्यों में 650-750 रुपये है, यहाँ करीब 1,500 रुपये में बिकती है। इसके विपरीत, मिलावटी ब्राउन शुगर के छोटे पैकेट महज 300 से 500 रुपये में उपलब्ध हैं। शराब की तुलना में ड्रग्स की छोटी मात्रा को छिपाना और ट्रांसपोर्ट करना तस्करों के लिए कहीं ज्यादा आसान होता है।
भौगोलिक स्थिति ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। नेपाल से सटी सीमा और पूर्वोत्तर राज्यों से कनेक्टिविटी के कारण बिहार ड्रग्स के लिए एक ट्रांजिट पॉइंट बन गया है। असम के रास्ते हेरोइन और ब्राउन शुगर आ रही है, जबकि नेपाल, त्रिपुरा और ओडिशा से गांजा की सप्लाई होती है। यहाँ तक कि म्यांमार-लाओस-थाईलैंड क्षेत्र से 'कोटा' नामक कच्ची हेरोइन मिजोरम और मणिपुर बॉर्डर के जरिए बिहार पहुंच रही है।
इसका सबसे बुरा असर युवाओं और स्वास्थ्य पर दिख रहा है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार, नशामुक्ति केंद्रों का लाभ लेने वालों की संख्या 2022-23 के 1,487 से बढ़कर 2024-25 में 29,429 हो गई है। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के डॉ. राजेश कुमार का कहना है कि अब मरीज पारंपरिक नशों के बजाय सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन की लत लेकर आ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 2016 से 2023 के बीच केवल 11 किशोरों को एनडीपीएस एक्ट के तहत पकड़ा गया था, लेकिन 2024 में यह संख्या बढ़कर 50 हो गई है।
इस स्थिति से निपटने के लिए बिहार सरकार ने सितंबर 2025 में 'निषेध एवं राज्य narcotics नियंत्रण ब्यूरो' का गठन किया है, जिसमें एंटी-नार्कोटिक्स यूनिट और प्रोहिबिशन विंग को मिला दिया गया है। वहीं, स्पेशल टास्क फोर्स ने भी अप्रैल 2025 में एक समर्पित नार्कोटिक्स सेल शुरू किया है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'विज़न डॉक्यूमेंट 2026-2029' के तहत 31 दिसंबर 2029 तक भारत को नशा मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है।