बचपन को खिलौनों की भरमार नहीं, खेलने की आजादी चाहिए

बच्चे के लिए खेल की शुरुआत बाजार से खरीदी गई किसी वस्तु से नहीं होती। वह अपने आसपास की आवाजों, चेहरों, स्पर्श और लोगों के साथ संवाद से दुनिया को पहचानना शुरू करता है। माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन और दूसरे देखभाल करने वाले लोगों के साथ बातचीत, हंसी-मजाक और छोटी-छोटी गतिविधियां भी उसके लिए खेल का हिस्सा होती हैं। खिलौने इस अनुभव को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे मानवीय संपर्क की जगह नहीं ले सकते।

AAdyansh Singh· 25 Oct, 12:04 AM · 9 मिनट
 बचपन को खिलौनों की भरमार नहीं, खेलने की आजादी चाहिए

अमित पांडे: संपादक

बाजार में बच्चों के लिए खिलौनों की कमी नहीं है। रंग-बिरंगी गुड़िया, टेडी बियर, ब्लॉक, बैटरी से चलने वाली गाड़ियां, रोबोट और रिमोट से नियंत्रित होने वाले खिलौने। उम्र के हिसाब से इनके अलग-अलग रूप उपलब्ध हैं। तकनीक ने खिलौनों की दुनिया को पहले से कहीं अधिक दिलचस्प बना दिया है। लेकिन एक बुनियादी सवाल अब भी कायम है। क्या खिलौनों की बढ़ती संख्या बच्चों के खेलने, सीखने और कल्पनाशील बनने के अवसर भी उसी अनुपात में बढ़ा रही है?

बच्चे के लिए खेल की शुरुआत बाजार से खरीदी गई किसी वस्तु से नहीं होती। वह अपने आसपास की आवाजों, चेहरों, स्पर्श और लोगों के साथ संवाद से दुनिया को पहचानना शुरू करता है। माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन और दूसरे देखभाल करने वाले लोगों के साथ बातचीत, हंसी-मजाक और छोटी-छोटी गतिविधियां भी उसके लिए खेल का हिस्सा होती हैं। खिलौने इस अनुभव को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे मानवीय संपर्क की जगह नहीं ले सकते।

परिवारों की जीवनशैली बदली है। माता-पिता की व्यस्तताएं बढ़ी हैं और बच्चों के मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं। पहले घर में उपलब्ध कपड़े, लकड़ी के टुकड़े, मिट्टी या रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं से भी बच्चों के लिए खेलने की चीजें तैयार की जाती थीं। आज बाजार में तैयार खिलौनों का बड़ा संसार मौजूद है। हालांकि, पुराने समय में खिलौने कम थे या बच्चों को उनकी जरूरत नहीं पड़ती थी, ऐसा कोई व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। असली सवाल खिलौनों की संख्या से अधिक उनके इस्तेमाल और बच्चों के अनुभव का है।

क्या हर नया खिलौना बच्चे को कुछ नया सिखाता है?

बच्चों के जन्मदिन और दूसरे पारिवारिक अवसरों पर खिलौने उपहार देने का चलन आम है। कई बार बच्चे की पसंद को ध्यान में रखकर खिलौना खरीदा जाता है, तो कई बार वही वस्तु दे दी जाती है जो आसानी से उपलब्ध हो। धीरे-धीरे घर में खिलौनों का ढेर लग जाता है। कुछ बच्चों के प्रिय बन जाते हैं, कुछ से वे एक-दो बार खेलते हैं और कुछ डिब्बों में बंद रह जाते हैं।

यह स्थिति बताती है कि किसी खिलौने का नया, महंगा या आकर्षक होना उसके लंबे समय तक उपयोगी रहने की गारंटी नहीं है। कई बार एक साधारण गुड़िया, गेंद या ब्लॉक बच्चों को ज्यादा देर तक व्यस्त रख सकता है, क्योंकि उससे खेलने के कई तरीके निकाले जा सकते हैं। बच्चा उसे अलग-अलग रूप दे सकता है, अपनी कहानी बना सकता है और खेल के नियम खुद तय कर सकता है।

ऐसे खिलौनों की खासियत यही है कि वे बच्चे को केवल तैयार मनोरंजन नहीं देते, बल्कि उसे कुछ बनाने, बदलने और खोजने का अवसर देते हैं। ब्लॉक जोड़ना, आकार बनाना, गुड़िया के साथ काल्पनिक बातचीत करना या सांप-सीढ़ी खेलना बच्चों को अलग-अलग तरह से सोचने, नियम समझने और दूसरों के साथ संवाद करने का मौका देता है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की खेल संबंधी समीक्षा भी बताती है कि उम्र के अनुकूल खेल बच्चों के सामाजिक, भावनात्मक, भाषायी और संज्ञानात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुछ अध्ययनों में पारंपरिक खिलौनों के साथ इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों की तुलना करते हुए पाया गया कि खासकर गैर-संवादात्मक वीडियो आधारित खिलौनों के मुकाबले पारंपरिक खिलौने माता-पिता और बच्चों के बीच भाषा संबंधी बातचीत को बढ़ावा दे सकते हैं। यानी खिलौने का महत्त्व इस बात में भी है कि वह बच्चे को केवल प्रतिक्रिया देने वाला बनाता है या उसे बातचीत और खोजबीन के लिए प्रेरित करता है।

क्या तकनीक वाले खिलौने समस्या हैं?

बाजार में इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों, रोबोटों और डिजिटल उपकरणों का बढ़ना अपने आप में समस्या नहीं है। सही उम्र के अनुरूप और सुरक्षित खिलौना बच्चे की रुचि जगा सकता है। तकनीक के माध्यम से बच्चे नई चीजों को समझ सकते हैं और कुछ गतिविधियों में उपयोगी अनुभव हासिल कर सकते हैं।

समस्या तब शुरू होती है, जब खिलौने का पूरा खेल पहले से तय होता है। बटन दबाते ही आवाज आती है, रोशनी चमकती है या खिलौना कोई गतिविधि करने लगता है। बच्चा उसे देखता और फिर वही क्रिया दोहराता है। ऐसे खिलौनों से भी आनंद मिल सकता है, लेकिन हर बार उनमें बच्चे की कल्पना या सक्रिय भागीदारी के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती।

इसके उलट, साधारण ब्लॉक, मिट्टी, रंग, गेंद और कल्पनाशील खेल बच्चों को अपने तरीके से प्रयोग करने का अवसर दे सकते हैं। वे एक ही वस्तु को अलग-अलग तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं। मिट्टी से घर बन सकता है, कोई काल्पनिक पात्र बनाया जा सकता है या अपनी कल्पना का कोई नया आकार तैयार किया जा सकता है। यहां खिलौने के साथ बच्चे की रचनात्मकता भी विकसित होती है।

इसलिए सवाल इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों को पूरी तरह खारिज करने का नहीं, बल्कि खिलौनों में विविधता और संतुलन बनाए रखने का है। ऐसा खिलौना अधिक उपयोगी हो सकता है, जो बच्चे को केवल दर्शक बनाकर न रखे, बल्कि उसे छूने, सोचने, बनाने, सवाल पूछने और दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करे।

मिट्टी और लकड़ी के खिलौनों की ओर लौटना क्या पर्याप्त है?

मिट्टी, लकड़ी और कपड़े से बने खिलौनों का एक अलग आकर्षण है। उन्हें बनाने और इस्तेमाल करने की प्रक्रिया बच्चों को वस्तुओं, आकारों और आसपास की दुनिया से परिचित करा सकती है। कई पारंपरिक खिलौनों में स्थानीय संस्कृति, कारीगरी और प्रकृति से जुड़ाव भी दिखाई देता है। कुम्हार के चाक पर मिट्टी को आकार लेते देखना या अपने हाथों से मिट्टी की कोई आकृति बनाना बच्चे के लिए एक अनुभव हो सकता है, जिसे तैयार खिलौना हमेशा नहीं दे सकता।

हालांकि, किसी वस्तु का प्राकृतिक सामग्री से बना होना अपने आप में उसकी सुरक्षा या उपयोगिता का प्रमाण नहीं है। छोटे बच्चों के लिए खिलौने का आकार, टूटने की संभावना, नुकीले किनारे, इस्तेमाल की गई सामग्री और निगरानी महत्त्वपूर्ण हैं। खासकर उन बच्चों के मामले में, जो चीजों को मुंह में डालते हैं, छोटे हिस्सों वाले खिलौनों से जोखिम पैदा हो सकता है।

इसलिए अभिभावकों को खिलौने खरीदते समय बच्चे की उम्र और विकास के स्तर के साथ-साथ सुरक्षा मानकों पर भी ध्यान देना चाहिए। भारत में खिलौनों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के सुरक्षा मानक लागू हैं। खिलौने की उपयुक्तता और सुरक्षा की जांच केवल उसकी बाहरी बनावट या प्राकृतिक सामग्री के आधार पर नहीं की जानी चाहिए।

मिट्टी और लकड़ी के खिलौनों को बढ़ावा देने का तर्क तभी मजबूत होगा, जब उनके साथ सुरक्षित निर्माण, अच्छी कारीगरी और बच्चों की उम्र के अनुरूप डिजाइन पर भी ध्यान दिया जाए।

क्या खिलौने अभिभावकों के समय की जगह ले सकते हैं?

बच्चों के लिए खिलौने जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उनसे यह उम्मीद करना गलत है कि वे अभिभावकों की अनुपस्थिति या संवाद की कमी की भरपाई कर देंगे। व्यस्तता के कारण बच्चों को स्मार्टफोन थमा देना या उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन के सामने छोड़ देना आसान रास्ता हो सकता है। मगर इससे बच्चे के लिए दूसरे लोगों के साथ खेलने, शारीरिक गतिविधियों में शामिल होने और अपने आसपास की चीजों को सीधे अनुभव करने के अवसर कम हो सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सक्रिय खेल, पर्याप्त नींद और स्क्रीन के सामने बैठकर बिताए जाने वाले समय को सीमित रखने पर जोर दिया है। दो वर्ष की उम्र में निष्क्रिय स्क्रीन समय एक घंटे से अधिक न रखने और इससे कम रखने को प्राथमिकता दी गई है। तीन से चार वर्ष की उम्र में भी एक घंटे से अधिक निष्क्रिय स्क्रीन समय की सिफारिश नहीं की गई है। एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए निष्क्रिय स्क्रीन समय की सिफारिश नहीं है।

यह मार्गदर्शन हर उम्र और हर डिजिटल गतिविधि को एक जैसा नहीं मानता, लेकिन एक अहम बात स्पष्ट करता है। बच्चों के दिन में सक्रिय खेल, नींद और देखभाल करने वाले लोगों के साथ संवाद के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए।

इसके लिए हर बार महंगे खिलौने की जरूरत नहीं है। अभिभावक बच्चे के साथ कागज के फूल बना सकते हैं, चित्रों पर बातचीत कर सकते हैं, गेंद खेल सकते हैं या घर के सुरक्षित सामान से कोई खेल तैयार कर सकते हैं। दादा-दादी और परिवार के दूसरे सदस्य भी कहानियों, पहेलियों और पारंपरिक खेलों के जरिए बच्चों के साथ जुड़ सकते हैं। ऐसे अनुभव बच्चे को केवल व्यस्त नहीं रखते, बल्कि उसे बातचीत, कल्पना और साझा गतिविधियों का हिस्सा बनाते हैं।

बच्चों के लिए कितने खिलौने पर्याप्त हैं?

इसका कोई एक तय जवाब नहीं हो सकता। बच्चों की उम्र, रुचि और विकास की जरूरतें अलग होती हैं। किसी बच्चे को ब्लॉक पसंद हो सकते हैं, किसी को गुड़िया या चित्रकारी, तो किसी को बाहर दौड़ना और गेंद खेलना। इसलिए खिलौनों की संख्या तय करने से ज्यादा जरूरी है कि वे सुरक्षित हों, बच्चे की उम्र के अनुरूप हों और उसे सक्रिय रूप से खेलने का अवसर दें।

उपहार देने वाले भी बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रख सकते हैं। हर अवसर पर नया खिलौना देने के बजाय ऐसा खेल या सामग्री चुनी जा सकती है, जो बच्चे के पास पहले से मौजूद चीजों के साथ इस्तेमाल हो सके। इससे अनावश्यक दोहराव कम होगा और बच्चे को वस्तुओं के साथ नए प्रयोग करने का अवसर मिलेगा।

खिलौने बनाने और बेचने वालों की भी जिम्मेदारी है कि वे केवल आकर्षक पैकेजिंग और नई तकनीक के आधार पर उत्पाद का महत्त्व न जताएं, बल्कि उसकी उम्र संबंधी उपयुक्तता, सुरक्षा और उपयोग के बारे में स्पष्ट जानकारी दें।

बचपन में खेल का उद्देश्य हर वस्तु से कोई पाठ पढ़ाना भी नहीं है। बच्चों को बिना किसी तय परिणाम के खेलने, कल्पना करने और कभी-कभी सिर्फ आनंद लेने की स्वतंत्रता भी चाहिए। हर खेल को परीक्षा या सीखने की परियोजना बना देना बचपन को एक दूसरी तरह के दबाव में बदल सकता है।

आखिरकार, अच्छा खिलौना वही नहीं जो बच्चे को सबसे ज्यादा देर तक चुप रखे। बेहतर खिलौना वह हो सकता है, जो उसे सवाल पूछने, कुछ नया बनाने, दूसरों के साथ जुड़ने और अपनी कल्पना का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करे। इसके लिए बाजार के महंगे उत्पादों के साथ साधारण, पारंपरिक और घर में सुरक्षित तरीके से बनाई जा सकने वाली चीजों की भी जगह है।

बचपन को खिलौनों की भरमार से नहीं, खेल के अनुभवों की विविधता से समृद्ध किया जा सकता है। तकनीक इस अनुभव का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसे अभिभावकों के साथ संवाद, सक्रिय खेल और बच्चे की अपनी कल्पना की जगह नहीं लेनी चाहिए। जरूरी यह है कि खिलौने बच्चे की दुनिया को बड़ा करें, उसे किसी तैयार आभासी दुनिया तक सीमित न कर दें।

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