टेरर फंडिंग केस: बारामुल्ला सांसद अब्दुल रशीद शेख की जमानत याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
टेरर फंडिंग केस में फंसे बारामुल्ला सांसद अब्दुल रशीद शेख की जमानत याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। जानें कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं।

आतंकी वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) के मामले में फंसे बारामुल्ला के सांसद अब्दुल रशीद शेख की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। रशीद शेख पिछले कई सालों से जेल में हैं और अब सबकी नजरें अदालत के आने वाले फैसले पर टिकी हैं।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस विकास महाजन की खंडपीठ ने की। कोर्ट में दोनों पक्षों की लंबी बहस चली, जिसमें आरोपी सांसद की ओर से सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन और एनआईए (NIA) की तरफ से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने अपनी दलीलें पेश कीं।
कोर्ट में क्या रही दलीलें?
सांसद अब्दुल रशीद शेख के वकील ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल पिछले 7 साल से हिरासत में हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इसी तरह के अपराधों के आरोपी शब्बीर अहमद शाह को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है, इसलिए रशीद शेख को भी राहत मिलनी चाहिए। वकील ने यह भी साफ किया कि शेख को मुख्य चार्जशीट में नामजद नहीं किया गया था, बल्कि उन्हें 2019 में गिरफ्तार कर दूसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में शामिल किया गया था। उन्होंने दलील दी कि रशीद शेख एक निर्वाचित सांसद हैं और उन्होंने हमेशा भारत के संविधान में अपना विश्वास जताया है।
वहीं, एनआईए की ओर से पेश सिद्धार्थ लूथरा ने जमानत का कड़ा विरोध किया। एनआईए ने कोर्ट को बताया कि रशीद शेख के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं कि उन्होंने भारत विरोधी भाषण दिए और देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन किया। एजेंसी ने आरोप लगाया कि जब शेख अंतरिम जमानत पर बाहर थे, तब उन्होंने गवाहों से मुलाकात की और उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की, जिसके कारण दो गवाह अपने बयानों से पलट गए। एनआईए ने यह भी कहा कि अभी केवल सार्वजनिक गवाहों की जांच हुई है, जबकि एजेंसी के आधिकारिक गवाहों की गवाही होना बाकी है, इसलिए उन्हें जमानत देना सही नहीं होगा।
गौरतलब है कि अब्दुल रशीद शेख को अगस्त 2019 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर यूएपीए (UAPA) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं। इससे पहले उन्हें विधानसभा चुनाव प्रचार, सांसद के रूप में शपथ लेने और संसद सत्र में शामिल होने के लिए समय-समय पर हिरासत पैरोल और अंतरिम जमानत दी गई थी।