सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: विरोध का हक है, लेकिन सड़कों पर कब्जा नहीं चलेगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल तक रोकना गलत है। व्यापारियों के नुकसान पर भी जताई चिंता।

देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में हर नागरिक और संगठन को विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई भी समूह किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा जमा ले।
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों का उपयोग सभी के लिए खुला होना चाहिए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि प्रदर्शन के लिए तय किए गए स्थलों का उपयोग किसानों, पत्रकारों और अन्य समूहों द्वारा रोटेशन (बारी-बारी) के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि किसी एक समूह के कारण दूसरों का रास्ता न रुके।
व्यापारियों का नुकसान और प्रशासन की जवाबदेही
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतागी ने किराना कमेटी दिल्ली और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन जैसे व्यापारिक संगठनों का पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि कनॉट प्लेस जैसे प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों के बंद होने और प्रदर्शनों के कारण व्यापारियों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है।
वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रशासन की ओर से दलील दी कि प्रदर्शन आयोजकों को सार्वजनिक व्यवधान के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर प्रदर्शन की अनुमति एक सीमित समय के लिए दी जाती है, लेकिन आयोजक वहां स्थायी रूप से डेरा डाल लेते हैं।
कोर्ट ने अब यह निर्देश दिया है कि भविष्य में विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने या उसे खारिज करने वाले किसी भी आदेश में स्पष्ट कारणों का उल्लेख होना चाहिए। साथ ही, कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने व्यापारिक संघों को भी निर्देश दिया है कि वे प्रदर्शन के आयोजकों को इस मामले में पक्षकार बनाएं ताकि उनकी बात भी सुनी जा सके।