महिलाओं की आर्थिक बराबरी के लिए घर का काम भी बराबर बंटना चाहिए
इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। भारत में महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (PLFS) के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर 34.8 प्रतिशत रही, जो अगस्त 2025 के 33.7 प्रतिशत से 1.1 प्रतिशत अंक अधिक है।

अमित पांडे: संपादक
विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने 16 सितंबर 2026 को जारी अपनी वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट में भारत को 145 अर्थव्यवस्थाओं में 131वें स्थान पर रखा है। भारत का समग्र लैंगिक समानता स्कोर 64.5 प्रतिशत और आर्थिक भागीदारी एवं अवसर का स्कोर 41.2 प्रतिशत है। श्रमबल भागीदारी में महिला-पुरुष समानता का स्कोर 44.1 प्रतिशत है। यानी आर्थिक जीवन में बराबरी की दिशा में भारत की प्रगति अभी सीमित है। हालांकि, इन स्कोर को महिलाओं की वास्तविक श्रमबल भागीदारी दर समझना ठीक नहीं होगा। ये सूचकांक में महिला-पुरुष के बीच अंतर के बंद हुए हिस्से को दर्शाते हैं।
इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। भारत में महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (PLFS) के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर 34.8 प्रतिशत रही, जो अगस्त 2025 के 33.7 प्रतिशत से 1.1 प्रतिशत अंक अधिक है। ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 37.4 से बढ़कर 39.4 प्रतिशत हुई। इसके उलट, शहरी महिलाओं की दर 26.1 से घटकर 25.4 प्रतिशत रह गई।
इसलिए बढ़ती भागीदारी की तस्वीर को ध्यान से पढ़ना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर सुधार जरूर हुआ है, लेकिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की दिशा एक जैसी नहीं है। और भागीदारी बढ़ने का अर्थ अपने आप यह नहीं कि महिलाओं को बेहतर वेतन, सुरक्षित रोजगार या आगे बढ़ने के समान अवसर भी मिलने लगे हैं।
इस सवाल का एक महत्त्वपूर्ण जवाब घर के भीतर महिलाओं और पुरुषों के काम के बंटवारे में मिलता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के वर्ष 2024 के समय उपयोग सर्वेक्षण (Time Use Survey) के मुताबिक, छह वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं में 81.5 प्रतिशत ने सर्वेक्षण के संदर्भ दिवस पर परिवार के सदस्यों के लिए बिना भुगतान वाली घरेलू सेवाओं में हिस्सा लिया। पुरुषों में यह अनुपात 27.1 प्रतिशत था।
इन गतिविधियों में हिस्सा लेने वाली महिलाओं ने औसतन प्रतिदिन 289 मिनट, जबकि पुरुषों ने 88 मिनट खर्च किए। परिवार के सदस्यों की देखभाल में शामिल महिलाओं का औसत समय 137 मिनट और पुरुषों का 75 मिनट था। ध्यान रहे कि ये औसत उन लोगों के लिए हैं, जिन्होंने संबंधित गतिविधि में हिस्सा लिया। इन्हें हर महिला या हर पुरुष के रोजाना काम करने का निश्चित समय नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी, आंकड़े घरेलू श्रम के बंटवारे में बड़ा अंतर दिखाते हैं।
घरेलू श्रम को काम मानने में हिचक क्यों?
घर चलाने के लिए भोजन बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना और परिवार के रोजमर्रा के काम व्यवस्थित करना जरूरी है। ये गतिविधियां समय, मेहनत और कौशल मांगती हैं। इनके बिना परिवार का जीवन ही नहीं, बाजार की अर्थव्यवस्था भी सुचारु रूप से नहीं चल सकती।
इसके बावजूद भुगतान वाले रोजगार को अक्सर वास्तविक काम का दर्जा दिया जाता है, जबकि घरेलू श्रम को स्वाभाविक जिम्मेदारी मान लिया जाता है। चूंकि इन सेवाओं के बदले आम तौर पर कोई वेतन नहीं मिलता, इसलिए इनका पूरा आर्थिक मूल्य सामान्य आय और सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में सीधे दिखाई नहीं देता।
यही नजरिया समस्या की जड़ में है। अगर किसी महिला का दिन भोजन तैयार करने, घर की सफाई और परिवार की देखभाल में बीतता है, तो उसकी मेहनत कम नहीं हो जाती। लेकिन इस काम को कर्तव्य मानकर छोड़ देने से उसके समय, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अवसरों पर पड़ने वाला असर अदृश्य बना रहता है।
समय उपयोग के सर्वेक्षण में घरेलू काम में शामिल पुरुषों का अनुपात वर्ष 2019 के 26.1 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 27.1 प्रतिशत हुआ। महिलाओं में यह अनुपात भी 81.2 से बढ़कर 81.5 प्रतिशत रहा। यह बदलाव बताता है कि पुरुषों की भागीदारी कुछ बढ़ी है, लेकिन इसे बराबरी की दिशा में बड़ा परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। घरेलू सेवाओं में शामिल लोगों का औसत समय भी दोनों लिंगों के लिए कम हुआ, फिर भी महिलाओं और पुरुषों के बीच समय का अंतर लगभग उतना ही बना रहा।
इसलिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि घर का काम करने वाले पुरुषों की संख्या बढ़ रही है या नहीं। यह भी देखना होगा कि कुल जिम्मेदारी किस पर है, काम का कितना हिस्सा कौन संभालता है और दोनों को अपने रोजगार, शिक्षा, आराम तथा व्यक्तिगत विकास के लिए कितना समय मिल पाता है।
क्या रोजगार अपने आप आर्थिक सशक्तीकरण देता है?
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए रोजगार के अवसर जरूरी हैं, लेकिन केवल नौकरी मिल जाना पर्याप्त नहीं है। काम का स्वरूप, वेतन, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की सुरक्षा और पदोन्नति की संभावनाएं भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं।
WEF की 2026 की रिपोर्ट में भारत में विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के स्तर पर महिला-पुरुष समानता का स्कोर केवल 13.1 प्रतिशत है। दूसरी ओर, पेशेवर और तकनीकी काम करने वालों के मामले में यह स्कोर 49.9 प्रतिशत तक पहुंचा है। दोनों संकेतकों के बीच का अंतर बताता है कि कुछ व्यावसायिक क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने के बावजूद निर्णय लेने और नेतृत्व की भूमिकाओं में उनकी बराबरी अभी काफी दूर है।
इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास बेअसर हैं। बल्कि यह कि अवसर बढ़ाने के साथ काम की गुणवत्ता और आगे बढ़ने की संभावना पर भी ध्यान देना होगा। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की नीतियों को यह भी देखना चाहिए कि क्या उन्हें अपनी आय पर निर्णय लेने, कौशल विकसित करने और काम के क्षेत्र में तरक्की करने की वास्तविक स्वतंत्रता मिल रही है।
यहां एक दूसरी बात भी समझनी जरूरी है। श्रमबल भागीदारी और समय उपयोग के आंकड़े अलग-अलग अवधारणाओं को मापते हैं। PLFS में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की श्रमबल भागीदारी का अनुमान वर्तमान साप्ताहिक स्थिति के आधार पर लगाया जाता है, जबकि समय उपयोग सर्वेक्षण यह दर्ज करता है कि छह वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों ने एक संदर्भ दिवस में किन गतिविधियों में कितना समय लगाया। इन दोनों के प्रतिशतों की सीधी तुलना करके रोजगार या घरेलू श्रम के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
क्या काम की लैंगिक पहचान बचपन से बनती है?
'यह काम महिलाओं का है और यह पुरुषों का' जैसी धारणाएं केवल घर के भीतर नहीं बनतीं। परिवार, शिक्षा, सामाजिक व्यवहार और काम की दुनिया में दिखने वाले उदाहरण भी उन्हें मजबूत करते हैं।
यदि पाठ्यपुस्तकों और कहानियों में महिला हमेशा घर संभालती और पुरुष बाहर कमाता दिखाई दे, तो बच्चों के लिए यही व्यवस्था स्वाभाविक बन सकती है। इसके उलट, लड़कियों को वैज्ञानिक, किसान, इंजीनियर, चालक और प्रशासक के रूप में तथा लड़कों को शिक्षक, रसोइया और देखभालकर्ता के रूप में सहजता से दिखाना काम के बारे में उनकी कल्पना का दायरा बढ़ा सकता है।
हालांकि, केवल पाठ्यपुस्तकों में बदलाव से संरचनात्मक असमानता दूर नहीं होगी। इसके साथ सुरक्षित कार्यस्थल, उचित पारिश्रमिक, कौशल विकास, निष्पक्ष पदोन्नति, सुरक्षित परिवहन और काम तथा परिवार के बीच संतुलन बनाने वाली व्यवस्थाएं भी चाहिए। बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है, ताकि परिवार की सारी जिम्मेदारी घर की किसी एक महिला पर न आ पड़े।
बेशक, हर परिवार में काम के बंटवारे का तरीका एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग अपनी पसंद, परिस्थिति या पारिवारिक जरूरत के मुताबिक अलग भूमिकाएं चुन सकते हैं। समस्या किसी एक व्यवस्था को अनिवार्य रूप से गलत ठहराने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि क्या किसी व्यक्ति के अवसर केवल उसके लिंग के कारण सीमित हो रहे हैं। स्वतंत्र चुनाव तभी सार्थक है, जब उसके लिए वास्तविक विकल्प मौजूद हों।
बराबरी की शुरुआत जिम्मेदारी साझा करने से होगी
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की चर्चा को केवल नौकरी देने या श्रमबल में उनकी संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सार्वजनिक नीतियों, नियोक्ताओं और परिवारों, तीनों को इस चुनौती का हिस्सा मानना होगा।
सरकारों को बाल देखभाल की सुविधाओं, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और देखभाल संबंधी सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। नियोक्ताओं को सुरक्षित कार्यस्थल, उचित वेतन, लचीली कार्य व्यवस्थाओं और आगे बढ़ने के निष्पक्ष अवसरों को सुनिश्चित करना चाहिए। परिवारों में घरेलू काम और देखभाल को साझा जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करना होगा।
पुरुष का घर के काम में योगदान केवल 'मदद' नहीं है। वह परिवार के प्रति उसकी अपनी जिम्मेदारी है। उसी तरह, महिला की कमाई परिवार के लिए महज अतिरिक्त सहायता नहीं, बल्कि उसका आर्थिक योगदान और व्यक्तिगत अधिकार भी है।
लैंगिक समानता का अर्थ यह नहीं कि हर महिला और पुरुष एक जैसा काम करें। इसका अर्थ यह है कि काम चुनने, कौशल विकसित करने, कमाने और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के अवसर किसी व्यक्ति के लिंग से तय न हों।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी महिलाएं रोजगार में शामिल हैं। यह भी पूछा जाना चाहिए कि वे किस तरह का काम कर रही हैं, उन्हें कितना पारिश्रमिक मिलता है, निर्णय लेने में उनकी कितनी भूमिका है और उनके पास अपने जीवन के लिए कितना समय बचता है।
'यह काम किसका है?' से आगे बढ़कर 'यह जिम्मेदारी कैसे साझा की जा सकती है?' पूछना जरूरी है। जब घरेलू श्रम को भी श्रम का सम्मान मिलेगा, कमाई को साझा सम्मान के साथ देखा जाएगा और देखभाल की जिम्मेदारी परिवार के सभी सक्षम सदस्यों के बीच बंटेगी, तभी आर्थिक भागीदारी में बढ़ोतरी को अधिक वास्तविक लैंगिक समानता में बदला जा सकेगा।