संपादकीय

सौरव दास और आशुतोष रांका जेल से बाहर, लेकिन प्रदर्शन पर लगी शर्तों ने उठाए सवाल... कानून-व्यवस्था और विरोध के अधिकार की सीमा कहां है?

AAasim· 22 Oct, 4:53 PM · 6 मिनट
सौरव दास और आशुतोष रांका जेल से बाहर, लेकिन प्रदर्शन पर लगी शर्तों ने उठाए सवाल... कानून-व्यवस्था और विरोध के अधिकार की सीमा कहां है?

अमित पांडे: संपादक

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सौरव दास और आशुतोष रांका सात दिन बाद तिहाड़ जेल से बाहर आ गए हैं। 21 अक्टूबर को दिल्ली के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने दोनों को 50-50 हजार रुपये के व्यक्तिगत और जमानती बॉन्ड पर रिहा करने का आदेश दिया। इसके बदले दोनों ने लिखित भरोसा दिया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे और उनके विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में होंगे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

22 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दोनों को जंतर-मंतर से जुड़े एक अलग आपराधिक मामले में पूछताछ के लिए बुलाया। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों उस दिन पूछताछ के लिए पेश नहीं हुए और अतिरिक्त समय मांगा।

यानी एक तरफ न्यायिक हिरासत खत्म हुई है, तो दूसरी तरफ कानूनी कार्यवाही जारी है।

इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ दो नेताओं की गिरफ्तारी और रिहाई का सवाल नहीं है। एक बड़ा संवैधानिक सवाल भी है। लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था की रक्षा करते हुए शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाए?

जमानत मिली, लेकिन क्या मामला खत्म हो गया?

21 अक्टूबर के आदेश में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने माना कि दोनों के लिखित आश्वासन और बॉन्ड के बाद फिलहाल न्यायिक हिरासत बढ़ाना ज़रूरी नहीं है।

इससे पहले दिल्ली पुलिस ने तीन दिन की अतिरिक्त हिरासत मांगी थी। पुलिस की दलील थी कि दोनों के पिछले आचरण और बयानों को देखते हुए शांति भंग होने का खतरा बना हुआ है।

अदालत ने इस आशंका को पूरी तरह निराधार घोषित नहीं किया। उसने यह माना कि मौजूदा परिस्थितियों में शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड और लिखित आश्वासन पर्याप्त हो सकते हैं।

यही फर्क समझना ज़रूरी है।

रिहाई का आदेश किसी आरोप को गलत साबित करने वाला अंतिम फैसला नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 135(3) के तहत चल रही निवारक कार्यवाही में दोनों को जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखने का निर्देश दिया गया है।

इसके अलावा जंतर-मंतर की घटना से जुड़ी आपराधिक जांच भी अलग से चल रही है।

इसलिए जमानत को न तो पूरी कानूनी जीत कहा जा सकता है और न ही आरोप सिद्ध होने का प्रमाण माना जा सकता है।

शांति बनाए रखने की शर्त क्या विरोध के अधिकार को सीमित करती है?

भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति और बिना हथियार शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार देता है। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।

यानी प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है, लेकिन किसी भी स्थान पर, किसी भी तरीके से प्रदर्शन करने की असीमित छूट नहीं है।

दिल्ली पुलिस का आरोप है कि CJP नेताओं ने जंतर-मंतर के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश किया और पहले से दिए गए शांति संबंधी बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया।

यदि वैध रोक, सुरक्षा बैरिकेड या कानूनी निर्देशों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जांच और विधिसम्मत कार्रवाई का आधार मौजूद हो सकता है।

लेकिन यहां दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

किसी प्रदर्शन की जगह या तरीके को नियंत्रित करने का अधिकार और शांतिपूर्ण असहमति को अनुचित ढंग से दबाने का अधिकार एक ही बात नहीं हैं।

निवारक कानूनों का मकसद संभावित हिंसा और सार्वजनिक अशांति को रोकना है। उनकी वैधता इस बात पर भी निर्भर करती है कि कार्रवाई कितनी जरूरी है और क्या उससे कम प्रतिबंधात्मक उपाय प्रभावी हो सकते हैं।

इस मामले में अदालत ने अंततः बॉन्ड को पर्याप्त मानकर हिरासत खत्म करने का फैसला किया। इससे एक व्यापक सवाल निकलता है कि नागरिक स्वतंत्रता सीमित करते समय क्या हर चरण पर हिरासत की वास्तविक आवश्यकता की पर्याप्त जांच हो रही है?

क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए साफ और व्यावहारिक नियम हैं?

जंतर-मंतर लंबे समय तक देश में राजनीतिक और सामाजिक विरोध की प्रमुख जगहों में शामिल रहा है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता देते हुए यह भी स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारियों और स्थानीय निवासियों के अधिकारों में संतुलन जरूरी है।

अदालत ने विरोध को पूरी तरह रोकने के बजाय उसके नियमन और उचित दिशानिर्देशों की जरूरत पर जोर दिया था।

इसी संदर्भ में वर्तमान विवाद एक अहम सवाल उठाता है।

अगर किसी प्रदर्शन स्थल की कानूनी स्थिति बदल दी जाती है, तो क्या नागरिकों को वैध विकल्प, स्पष्ट प्रक्रिया और समय पर अनुमति प्राप्त करने की व्यावहारिक व्यवस्था उपलब्ध है?

जंतर-मंतर का मामला सिर्फ एक जगह पर प्रदर्शन करने की इच्छा का नहीं होना चाहिए। इसकी व्यापक अहमियत इस बात में है कि सार्वजनिक असहमति व्यक्त करने के लिए कानून किस तरह का रास्ता उपलब्ध कराता है।

राज्य की जिम्मेदारी केवल प्रतिबंध लागू करना नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाए रखना भी है।

क्या पुलिस की चिंता को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?

बिल्कुल नहीं।

पुलिस का यह तर्क गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि पहले से दिए गए शांति संबंधी आश्वासनों का उल्लंघन होने पर भविष्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका का आकलन जरूरी है।

अगर कोई प्रदर्शनकारी जानबूझकर वैध प्रतिबंधों को तोड़ता है, तो उससे कानूनी जवाबदेही की अपेक्षा करना अनुचित नहीं है।

यह भी सही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार पुलिसकर्मियों, राहगीरों, आसपास के कारोबारियों और दूसरे नागरिकों के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता।

लेकिन इस तर्क की भी सीमा है।

हर राजनीतिक विरोध को संभावित अशांति समझना ठीक नहीं होगा। हिरासत या दूसरी निवारक कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों, संबंधित व्यक्ति के आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों को महत्व देना जरूरी है।

यहीं अदालतों और मजिस्ट्रेटों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

वे केवल पुलिस की आशंका को रिकॉर्ड करने के लिए नहीं हैं। उन्हें यह भी परखना होता है कि स्वतंत्रता पर लगाई गई पाबंदी कानूनी और परिस्थितियों के अनुपात में है या नहीं।

इस मामले से लोकतंत्र के लिए क्या सबक निकलता है?

सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई से एक बात साफ है। अदालत ने आगे की हिरासत के बजाय लिखित आश्वासन और बॉन्ड के जरिए शांति सुनिश्चित करने का विकल्प चुना।

लेकिन इससे पहले की हिरासत की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं हुआ और न ही आपराधिक आरोपों का निपटारा हुआ है।

दोनों नेताओं की कानूनी जिम्मेदारियां जारी हैं। उन्हें जांच और अदालती प्रक्रिया का पालन करना होगा।

वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी भी खत्म नहीं होती।

किसी लोकतंत्र की मजबूती सिर्फ इस बात से नहीं मापी जा सकती कि सरकार कानून-व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से बनाए रखती है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि असहमति रखने वाले नागरिकों के संवैधानिक अधिकार कितने सुरक्षित हैं।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आज़ादी और सार्वजनिक व्यवस्था को परस्पर विरोधी लक्ष्य बनाना जरूरी नहीं है। स्पष्ट नियम, अनुपातिक कार्रवाई और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा दोनों की रक्षा कर सकते हैं।

सौरव और आशुतोष का मामला अभी जारी है। आने वाली कानूनी कार्यवाही से आरोपों और प्रतिबंधों की स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।

फिलहाल सबसे जरूरी सिद्धांत यही है कि प्रदर्शनकारियों से कानून के पालन की अपेक्षा होनी चाहिए और राज्य से नागरिक स्वतंत्रता के सम्मान की। दोनों में से किसी एक को छोड़कर लोकतंत्र का संतुलन कायम नहीं रह सकता।

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