दिल्ली में एक साल से घरेलू काम में लगी 16 वर्षीय किशोरी मुक्त! गर्म प्रेस और चाकू से जलाने का आरोप, AIIMS में भर्ती
यह मामला तब सामने आया जब एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन को एक बच्ची से जुड़ी शिकायत मिली। एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का सहयोगी है। नाबालिग सायरा पिछले करीब एक साल से शाहीन बाग के एक घर में घरेलू काम कर रही थी। उसके माता-पिता को उससे मिलने नहीं दिया जा रहा था।

दीवाली पर जब घरों में रोशनी और खुशियां थीं, तब दक्षिण दिल्ली के शाहीन बाग के एक घर में एक बच्ची कथित तौर पर पिछले एक साल से शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेल रही थी। जिस उम्र में उसके हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए थीं, उस उम्र में उससे सुबह छह बजे से रात दो बजे तक घरेलू काम कराया जा रहा था। 16 साल की सायरा (बदला हुआ नाम) को घर में काम पर रखा, फिर उसे शारीरिक यातनाएं दी गईं। गरम प्रेस और चाकू से जलाया, कई-कई दिन भूखा रखा और माता-पिता से मिलने तक नहीं दिया। एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन की शिकायत पर बच्ची को मुक्त कराया गया। उसके शरीर पर चोटों के काफी निशान थे। सीडब्ल्यूसी के निर्देश पर उसे एम्स में भर्ती कराया गया है।
यह मामला तब सामने आया जब एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन को एक बच्ची से जुड़ी शिकायत मिली। एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का सहयोगी है। नाबालिग सायरा पिछले करीब एक साल से शाहीन बाग के एक घर में घरेलू काम कर रही थी। उसके माता-पिता को उससे मिलने नहीं दिया जा रहा था।

शिकायत के आधार पर एसडीएम कालकाजी को मामले से अवगत कराया गया। इसके बाद तीन नवंबर, 2026 को एसडीएम कार्यालय की ओर से श्रम विभाग और थाना शाहीन बाग की पुलिस टीम गठित की गई। टीम ने मकान पर छापा मारा, लेकिन सायरा वहां नहीं मिली। जांच में पता चला कि मकान मालिक उसे मुरादाबाद भेज चुका है। बताया गया कि सायरा घर में उनकी बुजुर्ग मां की देखभाल करती थी और अगले दिन उसे पेश किया जाएगा। इसके बाद सायरा को एसडीएम कार्यालय में पेश किया गया, जहां उसके बयान दर्ज किए गए। बाल श्रम और किशोर न्याय अधिनियम के तहत कार्रवाई के आदेश दिए गए। सायरा का मेडिकल परीक्षण कराया गया। अगले दिन पुलिस ने सायरा का भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज कराया और उसे बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के सामने पेश किया।
एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन के राष्ट्रीय समन्वयक धनंजय टिंगल ने कहा, “यह मामला घरेलू बाल मजदूरी के उस भयावह और छिपे हुए चेहरे को उजागर करता है, जहां गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर भविष्य और पढ़ाई का झांसा देकर घरों में काम पर रख लिया जाता है। परिवार से दूर कर दिए जाने के बाद ये बच्चे अक्सर शोषण और हिंसा का शिकार होते रहते हैं और उनकी पीड़ा किसी के सामने नहीं आ पाती। इस बच्ची के साथ हुई बर्बरता बेहद पीड़ादायक है। हालांकि, पुलिस, प्रशासन और सीडब्ल्यूसी की तत्परता से उसे इस अमानवीय यातना से मुक्त कराया जा सका। यह कार्रवाई सराहनीय है।”

शरीर पर काफी घाव और निशान
सीडब्ल्यूसी के सामने सायरा ने जो आपबीती सुनाई, वह किसी को भी विचलित कर सकती है। उसके बयान के मुताबिक, उसकी पीठ, हाथों और कूल्हे को कई बार गरम प्रेस से जलाया गया। गरम करके चाकू से भी मारा गया। उसके शरीर पर काफी घाव और पुरानी चोटों के निशान हैं। पूरी पीठ पर जलाने के निशान हैं। सिर में भी कई गहरे घाव हैं। उसका चेहरा कई जगहों से नोंचा गया था। सायरा ने बताया कि उसे लगातार तीन दिन तक भूखा रखा गया और पानी तक नहीं दिया गया। जरा सी गलती होने पर मैडम (घर की मालकिन) उसके साथ मारपीट करती थी। चोट लगने पर उसे डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय मेडिकल स्टोर से दवाएं लाकर दी जाती थीं।
माता-पिता से छिपाई चोटें
सायरा को उसके माता-पिता से भी दूर रखा गया। जब भी वे अपनी बेटी से बात कराने की मांग करते, महिला कोई न कोई बहाना बना देती। पूरे एक साल में मुश्किल से दो-तीन बार फोन पर बात कराई गई। उस दौरान भी सायरा का चेहरा ढंक दिया जाता था, ताकि उसके माता-पिता चेहरे पर लगी चोटें न देख सकें। सायरा को जब एसडीएम कार्यालय में बयान देने के लिए ले जाया गया, तब वह डर के कारण कुछ नहीं बोल पाई। उसे धमकी दी गई थी कि यदि उसने किसी को कुछ बताया तो उसे मारकर बोरे में भरकर फेंक दिया जाएगा और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगेगी। हालांकि, सीडब्ल्यूसी के सामने सायरा ने खुलकर अपनी बात रखी। वह अपनी पीड़ा बताते हुए फूट-फूटकर रोने लगी।
सीडब्ल्यूसी ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए उसे एम्स में भर्ती कराने का निर्देश दिया। सीडब्ल्यूसी ने कहा कि इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि इतनी यातना के बाद भी बच्ची जिंदा कैसे है। एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन की टीम ने इस मामले में बच्ची को मुक्त कराने से लेकर प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीडब्ल्यूसी ने भी संगठन के प्रयासों की सराहना की।

मिलता था बचा हुआ खाना
सायरा ने बताया कि उससे सुबह छह बजे से रात दो बजे तक लगातार काम कराया जाता था। उसे घर का झाड़ू-पोंछा, बर्तन और साफ-सफाई समेत तमाम काम करने पड़ते थे। सुबह करीब 11 बजे चाय दी जाती थी और खाने के लिए अक्सर बचा हुआ खाना मिलता था। एक साल तक काम कराने के बदले उसे महज 18 हजार रुपये दिए गए। सायरा को काम पर एक अन्य महिला के माध्यम से लगाया गया था।
अब पढ़ना चाहती है, टीचर बनने का सपना
इतनी यातनाएं झेलने के बावजूद सायरा के भीतर आगे बढ़ने और अपने सपने पूरे करने की इच्छा बाकी है। उसने सीडब्ल्यूसी के सामने कहा कि वह चाहती है कि उसके साथ अत्याचार करने वाली महिला को कड़ी से कड़ी सजा मिले। उसने यह भी बताया कि वह पढ़ना चाहती है और बड़ी होकर टीचर बनना चाहती है।