E100 को मंजूरी, लेकिन क्या सिर्फ पेट्रोल का विकल्प बदलने से आम आदमी को राहत मिलेगी?
यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब भारत के सामने आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने की चुनौती है। देश में गन्ने, मक्का और दूसरे कृषि उत्पादों से बनने वाला इथेनॉल पेट्रोल का विकल्प दे सकता है। इससे किसानों के लिए नया बाजार भी तैयार हो सकता है।

अमित पांडे: संपादक
भारत सरकार ने E100 यानी लगभग पूरी तरह इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों के लिए कानूनी रास्ता खोल दिया है। सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 में बदलाव के बाद अब ऐसी फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों को सर्टिफिकेट मिल सकेगा, जिनके इंजन E85 या E100 जैसे हाई-इथेनॉल फ्यूल के लिए खास तौर पर तैयार किए गए हों।
यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब भारत के सामने आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने की चुनौती है। देश में गन्ने, मक्का और दूसरे कृषि उत्पादों से बनने वाला इथेनॉल पेट्रोल का विकल्प दे सकता है। इससे किसानों के लिए नया बाजार भी तैयार हो सकता है।
लेकिन सवाल है कि क्या इससे सिर्फ देश का तेल आयात बिल कम होगा, या आम आदमी की जेब को भी राहत मिलेगी?
E100 की मंजूरी का मतलब हर पेट्रोल कार को छूट नहीं
सबसे पहले एक गलतफहमी दूर करना जरूरी है। सरकार ने E100 को मंजूरी दी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आज सड़कों पर चल रही हर पेट्रोल कार अब लगभग शुद्ध इथेनॉल से दौड़ने लगेगी।
E20 के लिए बनी कार में E100 भरना सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इसके लिए फ्यूल पंप, इंजेक्टर, पाइप, सील और इंजन कंट्रोल सिस्टम जैसे हिस्सों का इथेनॉल के मुताबिक तैयार होना जरूरी है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक, E100 में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर करीब एक-तिहाई कम ऊर्जा होती है। इसका असर माइलेज पर पड़ सकता है, हालांकि बेहतर इंजन डिजाइन से कुछ कमी पूरी की जा सकती है।
यहीं आम खरीदार की असली चिंता शुरू होती है।
अगर इथेनॉल वाला फ्यूल पेट्रोल से सस्ता मिले, लेकिन गाड़ी एक लीटर में कम किलोमीटर चले, तो फायदा कितना होगा? सिर्फ पंप पर दिखाई देने वाली कीमत देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। सही तुलना प्रति किलोमीटर खर्च की होनी चाहिए।
इसलिए सरकार और वाहन कंपनियों को नए फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल के लिए कीमत के साथ अलग-अलग फ्यूल पर वास्तविक माइलेज भी साफ बताना चाहिए।
तेल का आयात घटेगा, लेकिन इथेनॉल बनाने की कीमत क्या होगी?
इथेनॉल के पक्ष में एक मजबूत दलील है। भारत जितना पेट्रोल घरेलू स्तर पर बने इथेनॉल से बदल सकेगा, आयातित तेल पर उसकी निर्भरता उतनी कम हो सकती है।
पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच यह फायदा छोटा नहीं है। घरेलू इथेनॉल उत्पादन ग्रामीण कारोबार और किसानों की आमदनी के लिए भी मौका बन सकता है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू नजरअंदाज नहीं होना चाहिए।
इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों को जमीन और पानी चाहिए। खासकर पानी की कमी वाले इलाकों में यह सवाल अहम हो जाता है कि ईंधन के लिए फसल उगाने का असर भूजल, खाद्य उत्पादन और खेती की दूसरी जरूरतों पर क्या पड़ेगा।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी भी चेतावनी देती है कि बड़े पैमाने पर फसल आधारित बायोफ्यूल उत्पादन से जमीन के इस्तेमाल, जैव विविधता और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इसका मतलब इथेनॉल नीति गलत है, ऐसा नहीं है। मतलब सिर्फ इतना है कि उसके फायदे और लागत, दोनों का हिसाब ईमानदारी से होना चाहिए।
खेती के बचे हुए हिस्सों और दूसरे गैर-खाद्य स्रोतों से इथेनॉल बनाने की तकनीक को बढ़ावा देना इस चुनौती से निपटने का एक रास्ता हो सकता है।
कम प्रदूषण का दावा भी जांच की कसौटी पर हो
इथेनॉल के इस्तेमाल से कुछ हानिकारक उत्सर्जन घट सकते हैं। लेकिन इसे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त ईंधन बताना सही नहीं होगा।
गाड़ी के इंजन में इथेनॉल जलने से भी उत्सर्जन होता है। कुछ प्रदूषक घट सकते हैं, तो कुछ दूसरे बढ़ भी सकते हैं। कुल कार्बन उत्सर्जन पर असर इस बात से तय होगा कि इथेनॉल किस फसल से बना, उसकी खेती कैसे हुई और उत्पादन में कितनी ऊर्जा खर्च हुई।
इसलिए पर्यावरणीय फायदे का दावा केवल गाड़ी के एग्जॉस्ट पाइप तक सीमित नहीं होना चाहिए। पूरी सप्लाई चेन का हिसाब सामने आना चाहिए।
सरकार को अब सिर्फ नियम नहीं, साफ रोडमैप देना होगा
नए नियमों ने वाहन कंपनियों के लिए रास्ता खोला है। लेकिन देशभर में E100 आसानी से कब मिलेगा, इसकी कोई निश्चित समयसीमा इस नोटिफिकेशन में नहीं दी गई है।
इस बदलाव की असली कामयाबी इस पर निर्भर करेगी कि बाजार में ऐसी गाड़ियां कितनी कीमत पर आती हैं, फ्यूल कितने पंपों पर मिलता है और प्रति किलोमीटर खर्च पेट्रोल के मुकाबले कितना पड़ता है।
सरकार को इन सवालों पर पारदर्शी जानकारी देनी चाहिए। वाहन कंपनियों को भी ग्राहकों को साफ बताना होगा कि कौन-सा मॉडल किस इथेनॉल ब्लेंड के लिए सुरक्षित और प्रमाणित है।
E100 की मंजूरी सही दिशा में एक संभावित मौका है, लेकिन इसे अपने आप सस्ता और साफ ईंधन मान लेना जल्दबाजी होगी।
भारत को तेल आयात घटाने की जरूरत है। किसानों के लिए नए बाजार भी जरूरी हैं। मगर इन लक्ष्यों की कीमत आम वाहन चालक के बढ़े हुए खर्च, पानी के दबाव या पर्यावरणीय नुकसान के रूप में नहीं चुकाई जानी चाहिए।
किसी भी नई फ्यूल पॉलिसी की असली कामयाबी इस बात से तय होगी कि वह देश की जरूरत, किसानों के फायदे, पर्यावरण और आम आदमी की जेब के बीच कितना बेहतर संतुलन बना पाती है।