चुनाव आयोग में तीन आयुक्त, फिर फैसलों पर इतने सवाल क्यों? सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे से आगे भी जवाबदेही जरूरी
यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी दफ्तर नहीं है। देश में कौन वोट दे सकता है, किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा और चुनाव किस तरह कराए जाएंगे, इन फैसलों की निष्पक्षता पर लोकतंत्र का भरोसा टिका है।

अमित पांडे: संपादक
भारत के चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े उसके फैसले तीनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अकेले फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया है। लेकिन इस हलफनामे के बाद भी एक बुनियादी सवाल बना हुआ है। अगर आयोग के भीतर सब कुछ तय प्रक्रिया के मुताबिक चल रहा था, तो दो निर्वाचन आयुक्तों को बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराने और कैबिनेट सचिव तक शिकायत पहुंचाने की नौबत क्यों आई?
यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी दफ्तर नहीं है। देश में कौन वोट दे सकता है, किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा और चुनाव किस तरह कराए जाएंगे, इन फैसलों की निष्पक्षता पर लोकतंत्र का भरोसा टिका है।
14 आपत्तियां और सर्वसम्मति का दावा
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग के कामकाज को लेकर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म 6, चुनावी सॉफ्टवेयर तथा अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल थे।
अब आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि फाइलों पर किसी आयुक्त की टिप्पणी, सवाल या सुझाव को आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। यह दलील कानूनी तौर पर महत्वपूर्ण है।
दरअसल, 2023 के कानून की धारा 18 के मुताबिक, आयोग के फैसले जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होने चाहिए। असहमति की स्थिति में बहुमत से फैसला लिया जा सकता है। यानी हर शुरुआती आपत्ति का मतलब यह नहीं कि अंतिम निर्णय गैरकानूनी था।
लेकिन यहीं जवाबदेही का सवाल खत्म नहीं होता।
अगर किसी आयुक्त ने गंभीर आपत्ति उठाई थी, तो उसका समाधान कैसे हुआ? क्या आपत्ति स्वीकार की गई, वापस ली गई या बहुमत से खारिज हुई? क्या इसकी स्पष्ट जानकारी अंतिम रिकॉर्ड में मौजूद है?
आयोग को हर आंतरिक बातचीत सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं है, लेकिन संवेदनशील फैसलों की कानूनी प्रक्रिया जांचने योग्य जरूर होनी चाहिए।
दो आयुक्तों के पत्र ने क्या बताया?
हलफनामे में आयोग ने स्वीकार किया है कि 28 जुलाई 2026 को जारी आंतरिक कार्य-विभाजन के आदेश को लेकर दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने अगले दिन कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे।
आयोग का कहना है कि दोनों आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद वह आदेश कभी लागू नहीं हुआ।
यह बात आयोग के पक्ष में भी जाती है। इससे पता चलता है कि आंतरिक आपत्तियों के बाद किसी आदेश को रोका जा सकता है और संस्थागत प्रक्रिया काम कर सकती है।
लेकिन यह घटना एक दूसरा सवाल भी छोड़ती है। अगर काम के बंटवारे जैसा मामला विवादित आदेश तक पहुंच गया था, तो शुरू में मंजूरी और अधिकारों की जांच कैसे हुई?
इसीलिए किसी आदेश का लागू न होना राहत की बात जरूर है, लेकिन उसके जारी होने की वजह जानना भी संस्थागत जवाबदेही का हिस्सा है।
फॉर्म 6 पर सफाई, लेकिन मतदाता की परेशानी का क्या?
आयोग ने कहा है कि नए मतदाताओं के पंजीकरण वाले फॉर्म 6 में कोई कानूनी संशोधन नहीं हुआ। SIR के लिए मांगा गया घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है।
हालांकि, आयोग ने यह भी माना कि ऑनलाइन आवेदन में दोनों को जिस तरह दिखाया गया, उससे संशोधन होने का आभास हो सकता था। इस प्रक्रिया को अलग-अलग दिखाने का फैसला भी लिया गया है।
यह विवाद केवल तकनीकी नहीं है।
किसी आम नागरिक के लिए अहम सवाल यह है कि वोटर बनने के लिए उसे कौन-से दस्तावेज देने होंगे और आवेदन किन शर्तों पर स्वीकार होगा।
अगर सरकारी वेबसाइट पर कानूनी फॉर्म और अतिरिक्त घोषणा-पत्र का फर्क साफ नहीं दिखता, तो लोगों के बीच गलतफहमी पैदा होना स्वाभाविक है।
SIR का मकसद मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। फर्जी, डुप्लीकेट और अपात्र नाम हटाना जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई पात्र नागरिक जटिल प्रक्रिया की वजह से अपने वोट के अधिकार से वंचित न रह जाए।
इन दोनों जिम्मेदारियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की जरूरत नहीं है।
अखबार की रिपोर्ट सबूत नहीं, लेकिन सवालों को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते
आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि केवल अखबार की रिपोर्ट को अदालत में आरोपों का सबूत नहीं माना जा सकता।
यह कानूनी फर्क वाजिब है। किसी पत्रकारिता रिपोर्ट के आधार पर आरोपों की जांच शुरू हो सकती है, लेकिन न्यायिक निष्कर्ष के लिए मूल दस्तावेज, रिकॉर्ड और दूसरे स्वीकार्य सबूत जरूरी होते हैं।
दूसरी तरफ, पत्रकारिता का काम संस्थाओं के उन पहलुओं पर सवाल उठाना भी है जो आम जनता की नजर से दूर रहते हैं।
अगर रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों के बाद चुनाव आयोग को अपने फैसलों की प्रक्रिया समझानी पड़ी है, तो इस बहस को केवल संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश बताकर खत्म नहीं किया जा सकता।
आयोग ने यह भी कहा है कि जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी ली जाती है और बाद में फाइल पर दर्ज होती है। यह व्यवस्था अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी का समय, उसका रिकॉर्ड और अंतिम आदेश के बीच स्पष्ट संबंध होना जरूरी है।
ऐसी प्रक्रिया आयोग को भी बेबुनियाद आरोपों से बचा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कथित एकतरफा कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए SIR से जुड़े फैसलों को चुनौती दी है। राहुल गांधी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की संबंधित अर्जियां भी अदालत के सामने हैं।
लेकिन किसी प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप लगना और पूरे SIR को शुरुआत से गैरकानूनी घोषित करना दो अलग बातें हैं। इतना व्यापक फैसला बिना ठोस सबूत और उसके कानूनी असर की जांच के नहीं लिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट को यह देखना होगा कि आयोग के अंतिम फैसले वास्तव में कानून की धारा 18 के मुताबिक लिए गए थे या नहीं। साथ ही, जिन आपत्तियों और आदेशों पर विवाद है, उनका मूल रिकॉर्ड क्या बताता है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही अहम है।
तीन सदस्यीय आयोग का मतलब सिर्फ तीन संवैधानिक पद नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी भी है। अगर फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं, तो उनकी प्रक्रिया और रिकॉर्ड इस दावे को मजबूत कर सकते हैं। और अगर कहीं नियम टूटे हैं, तो उसका समाधान भी कानून के दायरे में होना चाहिए।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर भरोसा करना जरूरी है। लेकिन भरोसा बनाए रखने का सबसे मजबूत रास्ता सवालों से बचना नहीं, उनका पारदर्शी और ठोस जवाब देना है।