संपादकीय

इजरायल की सत्ता की चाबी अरबों के हाथ में, फिर भी सरकार से बाहर रहने का खतरा... नेतन्याहू का नया दांव क्या बदल देगा खेल?

120 सदस्यों वाली इजरायली संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। पूरी वोटों की गिनती के बाद सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के खेमे को 53, आइजनकोट के विपक्षी खेमे को 48 और अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों को रिकॉर्ड 19 सीटें मिली हैं।

AAasim· 29 Oct, 11:49 PM · 6 मिनट
इजरायल की सत्ता की चाबी अरबों के हाथ में, फिर भी सरकार से बाहर रहने का खतरा... नेतन्याहू का नया दांव क्या बदल देगा खेल?

अमित पांडे: संपादक

इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए चुनाव ने एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर सामने रखी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर है। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्ष भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सका। लेकिन इस चुनाव में जिस समुदाय की राजनीतिक ताकत सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह है इजरायल का अरब अल्पसंख्यक समुदाय।

120 सदस्यों वाली इजरायली संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। पूरी वोटों की गिनती के बाद सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के खेमे को 53, आइजनकोट के विपक्षी खेमे को 48 और अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों को रिकॉर्ड 19 सीटें मिली हैं।

यानी जिस अरब समुदाय को इजरायल की मुख्यधारा की राजनीति में लंबे समय तक सीमित जगह मिली, उसकी प्रतिनिधि पार्टियां अब अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

लेकिन सबसे बड़ा विरोधाभास भी यहीं है। अरब पार्टियों के पास सरकार बनवाने लायक सीटें हैं, मगर क्या इजरायल के प्रमुख राजनीतिक दल उनके समर्थन से सत्ता में आने को तैयार हैं?

कौन हैं इजरायल के अरब मुस्लिम और उनकी राजनीतिक ताकत क्यों बढ़ी?

इजरायल में रहने वाले अधिकांश अरब नागरिक उन फिलिस्तीनी परिवारों के वंशज हैं, जो 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद उस इलाके में रह गए थे। इनमें मुसलमानों के साथ ईसाई और दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल हैं।

इजरायल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 के अंत में देश की मुस्लिम आबादी करीब 18.49 लाख थी, जो कुल आबादी का लगभग 18.6 फीसदी है। व्यापक अरब आबादी की हिस्सेदारी लगभग 21 फीसदी है।

इसलिए अरब-नेतृत्व वाली सभी पार्टियों को सिर्फ मुस्लिम पार्टियां कहना सही नहीं होगा। इनके मतदाता और नेता अलग-अलग धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं से आते हैं।

इस चुनाव में दो प्रमुख अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों को कुल 19 सीटें मिली हैं। जॉइंट लिस्ट के खाते में 11 और राआम के खाते में आठ सीटें आई हैं। यह पिछले रिकॉर्ड से भी बड़ा आंकड़ा है।

इन सीटों का महत्व सिर्फ इतना नहीं कि अरब मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट दिया। असली बात यह है कि उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व अब सरकार गठन के गणित को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गया है।

48 और 19 मिलकर 67 होते हैं, फिर विपक्ष सरकार क्यों नहीं बना पा रहा?

कागज पर देखें तो आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास 48 सीटें हैं। अरब पार्टियों की 19 सीटें जोड़ दें, तो कुल संख्या 67 हो जाती है—बहुमत से छह ज्यादा।

लेकिन राजनीति सिर्फ गणित नहीं है।

विपक्षी खेमे में शामिल नफ्ताली बेनेट और एविग्डोर लिबरमैन जैसे नेताओं ने चुनाव से पहले अरब पार्टियों पर निर्भर सरकार बनाने से इनकार किया था। आइजनकोट भी ऐसी व्यवस्था को लेकर आपत्ति जता चुके हैं।

दूसरी तरफ अरब पार्टियां भी एक जैसी नहीं हैं।

मंसूर अब्बास की राआम पार्टी व्यावहारिक गठबंधन राजनीति में पहले भी हिस्सा ले चुकी है। 2021 में राआम ने बेनेट और याइर लापिद के गठबंधन में शामिल होकर इतिहास बनाया था।

इसके विपरीत जॉइंट लिस्ट में शामिल दलों की विचारधारा और राजनीतिक मांगें अलग हैं। उसके नेताओं ने विपक्षी सरकार को बाहर से समर्थन देने की संभावना जताई है, लेकिन सरकार में शामिल होने का सवाल ज्यादा पेचीदा है।

इसलिए 67 सीटों का आंकड़ा एक संभावना जरूर है, तैयार गठबंधन नहीं।

अगर विपक्ष को अरब सांसदों का समर्थन लेना है, तो उसे न केवल पुराने चुनावी वादों पर दोबारा विचार करना होगा, बल्कि अरब समुदाय की नागरिक समानता, सार्वजनिक सुरक्षा, विकास और फिलिस्तीन से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी समझ बनानी होगी।

नेतन्याहू का दांव: अरब वोटों पर सवाल और राष्ट्रीय एकता सरकार की चर्चा

चुनाव के बाद नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने अरब-बहुल इलाकों में वोटिंग के दौरान कथित गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं।

पुलिस और संबंधित एजेंसियां कुछ आरोपों की जांच कर रही हैं। लेकिन चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि अब तक मतदान की विश्वसनीयता को व्यवस्थित तरीके से नुकसान पहुंचने का आधार सामने नहीं आया है।

अरब नेताओं का आरोप है कि ऐसी बयानबाजी उनके राजनीतिक समर्थन को कमजोर करने और विपक्ष को उनसे दूरी बनाए रखने के लिए की जा रही है। नेतन्याहू और उनके सहयोगियों का कहना है कि चुनावी अनियमितताओं की जांच जरूरी है।

इस विवाद का समाधान सबूतों और निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। कुछ व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों को पूरे अरब समुदाय की लोकतांत्रिक भागीदारी पर सवाल उठाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

इसी बीच नेतन्याहू के करीबी राजनीतिक हलकों में गादी आइजनकोट के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की संभावना पर भी चर्चा शुरू हो गई है।

अगर ऐसा गठबंधन बनता है, तो अरब पार्टियों के समर्थन के बिना भी सरकार का रास्ता खुल सकता है।

लेकिन इसकी भी बड़ी बाधा है। आइजनकोट अब तक नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार में शामिल होने से इनकार करते रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय एकता सरकार की चर्चा को पक्का राजनीतिक समझौता समझना गलत होगा।

19 सीटों से आगे इजरायल के लोकतंत्र की असली परीक्षा

इस चुनाव ने एक पुराना सवाल फिर सामने रखा है—क्या किसी समुदाय को राजनीतिक व्यवस्था में केवल वोट देने और सांसद चुनने तक सीमित रहना चाहिए, या उसके चुने हुए प्रतिनिधियों को सत्ता के फैसलों में भी समान अवसर मिलना चाहिए?

इजरायल की यहूदी राष्ट्रीय पहचान, फिलिस्तीनी सवाल और सुरक्षा संबंधी चिंताएं इस बहस को जटिल बनाती हैं। अरब पार्टियों की नीतियों से दूसरे दलों का असहमत होना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। कोई दल सिर्फ इसलिए गठबंधन करने के लिए बाध्य नहीं है कि दूसरे दल के पास महत्वपूर्ण सीटें हैं।

लेकिन दूसरी तरफ अरब मतदाताओं की राजनीतिक वैधता को केवल उनकी पहचान के आधार पर खारिज करना भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत से टकराता है।

यही इस चुनाव का सबसे अहम पहलू है।

अरब समुदाय के लिए 19 सीटें एक बड़ी चुनावी उपलब्धि हैं। फिर भी उनके सांसद सरकार गठन में निर्णायक होंगे या राजनीतिक बातचीत से बाहर रह जाएंगे, यह आने वाले गठबंधन समझौतों पर निर्भर करेगा।

नेतन्याहू के पास 53 सीटों का मजबूत खेमा है, लेकिन बहुमत नहीं। आइजनकोट के पास सत्ता परिवर्तन का संभावित रास्ता है, लेकिन उसके लिए मुश्किल राजनीतिक समझौतों की जरूरत है।

इजरायल का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका फैसला अभी बाकी है। मगर इस चुनाव ने यह जरूर दिखाया है कि किसी समुदाय को लंबे समय तक राजनीतिक हाशिये पर रखने के बावजूद उसके वोट सत्ता के समीकरण बदल सकते हैं।

अब सवाल सिर्फ नेतन्याहू के सत्ता में बने रहने या हटने का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या इजरायल की राजनीति अरब नागरिकों के बढ़ते प्रतिनिधित्व को सामान्य लोकतांत्रिक वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर पाएगी, या उनकी 19 सीटें एक बार फिर सत्ता की राजनीति में दूरी और अविश्वास का विषय बनकर रह जाएंगी।

आने वाले दिनों की गठबंधन वार्ता इसी सवाल का जवाब देगी।

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