20 साल तक छात्रसंघ चुनाव नहीं, 18 दिन की भूख हड़ताल के बाद झुका जामिया प्रशासन... लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा अभी बाकी है
जामिया में 18 दिनों के छात्र आंदोलन के बाद प्रशासन छात्रसंघ चुनाव कराने पर राजी। 20 साल बाद लोकतंत्र की वापसी का क्या मतलब है और क्या चुनौतियां बाकी हैं?

अमित पांडे: संपादक
जिस विश्वविद्यालय में छात्रों को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की पढ़ाई कराई जाती है, वहां करीब 20 साल तक छात्रसंघ के चुनाव न होना अपने आप में एक बड़ा सवाल है। दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में यही स्थिति रही। अब 18 दिनों के आंदोलन और भूख हड़ताल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ बहाल करने की समयसीमा देने पर राजी हुआ है।
29 अक्टूबर को जारी आदेश के मुताबिक, छात्रसंघ का संविधान 15 मई 2027 तक मंजूर करके लागू किया जाएगा। इसके बाद जुलाई 2027 से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराने का वादा किया गया है।
यह आंदोलनकारी छात्रों के लिए अहम उपलब्धि है। लेकिन इसे पूरी जीत मानने से पहले एक सवाल जरूरी है—जिस छात्रसंघ के चुनाव 20 साल तक नहीं हो सके, क्या उसका भविष्य अब सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए?
जामिया में 20 साल तक छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हुए?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2006 से छात्रसंघ चुनाव बंद हैं। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने कैंपस में हिंसक घटनाओं और तत्कालीन कुलपति पर हमले का हवाला देकर छात्रसंघ भंग कर दिया था।
कैंपस में हिंसा रोकना, पढ़ाई का माहौल बनाए रखना और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन एक घटना या किसी दौर की अव्यवस्था के चलते लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को दशकों तक स्थगित रखना भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
किसी छात्रसंघ में अनुशासन की समस्या है तो उसके नियम सुधारे जा सकते हैं। चुनाव की प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जा सकती है। हिंसा करने वालों पर कार्रवाई हो सकती है।
लेकिन छात्रों के प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था ही बंद रहे, तो उनकी समस्याओं को संस्थागत तरीके से उठाने का मंच कमजोर पड़ जाता है।
एक विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने की जगह नहीं होता। वहां छात्रों को असहमति, बातचीत, चुनाव और सामूहिक फैसलों का अनुभव भी मिलता है।
18 दिन का आंदोलन सिर्फ चुनाव के लिए नहीं था
12 अक्टूबर से शुरू हुई भूख हड़ताल के दौरान छात्रों ने केवल छात्रसंघ चुनाव की मांग नहीं उठाई। वे चाहते थे कि प्रशासन लिखित समयसीमा दे और प्रदर्शन में हिस्सा लेने के कारण छात्रों पर हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस हो।
आंदोलन के दौरान कुछ छात्रों को निलंबन, निष्कासन और कैंपस में प्रवेश पर रोक जैसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। कक्षाएं ऑनलाइन कर दी गईं और कैंपस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई।
26 अक्टूबर को प्रशासन ने चुनाव कराने का आश्वासन दिया था, लेकिन संविधान को अंतिम मंजूरी देने की समयसीमा स्पष्ट नहीं थी। छात्रों ने इसी कमी पर सवाल उठाए और आंदोलन जारी रखा।
यह फर्क महत्वपूर्ण है।
किसी मांग पर सैद्धांतिक सहमति और उसे पूरा करने की निश्चित तारीख देना दो अलग बातें हैं। छात्र इसी अंतर को खत्म करना चाहते थे।
हालांकि, भूख हड़ताल जैसा कदम छात्रों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। लोकतांत्रिक मांगों को लेकर बातचीत की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें किसी को अपनी सेहत दांव पर न लगानी पड़े।
कार्रवाई वापस लेना जरूरी, लेकिन जवाबदेही भी हो
नए आदेश में प्रदर्शन से जुड़े कारण बताओ नोटिस, अनुशासनात्मक कार्रवाई, निष्कासन, निलंबन और कैंपस बैन वापस लेने की बात कही गई है।
इस फैसले का महत्व सिर्फ इतना नहीं कि कुछ छात्रों को राहत मिलेगी। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र समुदाय के बीच भरोसा दोबारा बनाने का रास्ता भी खुल सकता है।
लेकिन यहां दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।
छात्रों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखने की जगह मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, किसी भी वास्तविक हिंसा, धमकी या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटना की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए।
असहमति और अनुशासनहीनता को एक जैसा नहीं समझा जा सकता। उसी तरह शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार का मतलब हिंसा की छूट भी नहीं है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की विश्वसनीयता इसी बात से तय होगी कि वह इन दोनों के बीच कितना निष्पक्ष फर्क कर पाता है।
मई 2027 की डेडलाइन पर भी उठते हैं सवाल
छात्रों ने पहले मांग की थी कि छात्रसंघ संविधान को 20 दिसंबर 2026 तक मंजूरी मिले और उसके बाद चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो।
अब विश्वविद्यालय ने संविधान के लिए 15 मई 2027 की तारीख तय की है। यानी छात्रों की मांग के मुकाबले करीब पांच महीने अधिक समय लिया गया है।
यह बात जीत के जश्न के बीच नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए।
विश्वविद्यालय का तर्क है कि छात्रसंघ का संविधान बनाने, कानूनी प्रावधानों को देखने और लिंगदोह समिति के दिशा-निर्देशों के मुताबिक चुनाव कराने के लिए तैयारी जरूरी है।
यह तर्क अपने आप में गलत नहीं है। करीब दो दशक बाद चुनावी व्यवस्था दोबारा शुरू करना आसान काम नहीं होगा।
लेकिन समय लेने के साथ जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
संविधान तैयार करने वाली समिति में छात्रों की वास्तविक भागीदारी हो, मसौदा सार्वजनिक किया जाए और तय समय पर प्रगति की जानकारी दी जाए। चुनाव की मतदाता सूची, पात्रता और प्रक्रिया को लेकर भी पारदर्शिता जरूरी होगी।
वरना एक बार फिर चुनाव किसी नई प्रशासनिक अड़चन में फंस सकते हैं।
छात्रसंघ किसी पार्टी का मंच नहीं, छात्रों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है
भारत में छात्र राजनीति को लेकर अक्सर दो विपरीत धारणाएं दिखाई देती हैं। कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक नेतृत्व तैयार करने का माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ के लिए यह कैंपस में राजनीतिक टकराव और पढ़ाई में रुकावट की वजह है।
इन दोनों चिंताओं को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
छात्रसंघ की उपयोगिता सिर्फ राजनीतिक भाषणों या चुनावी मुकाबलों से नहीं तय होनी चाहिए। उसकी असली भूमिका फीस, हॉस्टल, छात्रवृत्ति, लाइब्रेरी, सुरक्षा, भेदभाव और पढ़ाई से जुड़े सवालों को प्रशासन तक पहुंचाने में होनी चाहिए।
अगर छात्रसंघ को निष्पक्ष चुनाव, स्पष्ट नियम और संस्थागत जवाबदेही के साथ चलाया जाए, तो वह विश्वविद्यालय और छात्रों के बीच संवाद का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
लेकिन अगर वह किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या गुटबाजी तक सिमट जाए, तो छात्रों के वास्तविक मुद्दे फिर पीछे छूट सकते हैं।
जामिया के आंदोलन ने यह दिखाया है कि लंबे समय से अटकी मांग पर संगठित छात्र समुदाय प्रशासन को बातचीत और लिखित फैसले तक ला सकता है।
फिर भी छात्रसंघ की बहाली का वादा और उसका वास्तव में निर्वाचित होकर काम करना अलग-अलग पड़ाव हैं।
इसलिए जामिया के लिए सबसे अहम तारीख केवल 29 अक्टूबर 2026 नहीं होगी, जब प्रशासन ने लिखित आश्वासन दिया। असली तारीख वह होगी जब करीब दो दशक बाद छात्र अपने प्रतिनिधियों को वोट देकर चुन सकेंगे।
उस दिन यह स्पष्ट होगा कि जामिया में छात्र लोकतंत्र की वापसी सिर्फ घोषणा थी या संस्थागत बदलाव भी।