‘दशकों तक दूसरों ने मेरी कहानी सुनाई, अब मेरी बारी’... सोनिया गांधी की किताब क्या भारतीय राजनीति के पुराने सवालों का जवाब दे पाएगी?
यह बयान सिर्फ एक नई किताब के प्रचार तक सीमित नहीं है। सोनिया गांधी भारतीय राजनीति की उन शख्सियतों में शामिल हैं, जिनके निजी जीवन, विदेशी मूल, राजनीतिक फैसलों और गांधी परिवार से रिश्ते को लेकर दशकों तक बहस होती रही है। अब सवाल है कि जब वह खुद अपनी कहानी सुनाएंगी, तो क्या भारतीय राजनीति के कुछ पुराने सवालों को नए जवाब मिलेंगे?

अमित पांडे: संपादक
सोनिया गांधी ने अपनी आत्मकथा Belonging: A Journey of Love की रिलीज से पहले एक दिलचस्प बात कही है। उनका कहना है कि दशकों तक दूसरे लोग उनकी कहानी सुनाते रहे, अब वह अपनी कहानी खुद बताना चाहती हैं। उन्होंने यह भी माना कि किताब आने पर कुछ 'तमाशा' होना तय है।
यह बयान सिर्फ एक नई किताब के प्रचार तक सीमित नहीं है। सोनिया गांधी भारतीय राजनीति की उन शख्सियतों में शामिल हैं, जिनके निजी जीवन, विदेशी मूल, राजनीतिक फैसलों और गांधी परिवार से रिश्ते को लेकर दशकों तक बहस होती रही है। अब सवाल है कि जब वह खुद अपनी कहानी सुनाएंगी, तो क्या भारतीय राजनीति के कुछ पुराने सवालों को नए जवाब मिलेंगे?
निजी यादों से आगे, राजनीतिक फैसलों का हिसाब भी जरूरी
27 अक्टूबर को जारी वीडियो में सोनिया गांधी ने बताया कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के फैसले के वह पूरी तरह खिलाफ थीं। उन्होंने कहा कि उनके बारे में लिखी गई कई बातें गलत, मनगढ़ंत या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई थीं।
सोनिया गांधी को अपनी जिंदगी का पक्ष सामने रखने का पूरा हक है। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ निजी जिंदगी की कहानी नहीं है।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या, 1991 में राजीव गांधी की हत्या और 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत जैसे घटनाक्रमों से उनका जीवन गहराई से जुड़ा रहा है। उन्होंने कांग्रेस का लंबे समय तक नेतृत्व किया और देश की राजनीति में कई अहम फैसलों की भागीदार रहीं।
इसलिए उनकी किताब में निजी दर्द, रिश्तों और यादों के साथ उन राजनीतिक फैसलों की वजहें भी महत्वपूर्ण होंगी, जिनका असर देश पर पड़ा।
खासतौर पर 2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार न करने का उनका फैसला आज भी राजनीतिक चर्चा का विषय है। उस वक्त उनके सामने क्या परिस्थितियां थीं, उन्होंने किन लोगों से सलाह ली और खुद उस फैसले को कैसे देखती हैं—ऐसे सवालों पर उनका पक्ष ऐतिहासिक दिलचस्पी रखता है।
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क है। आत्मकथा किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका देती है, इतिहास का आखिरी फैसला सुनाने का अधिकार नहीं।
जो घटनाएं सोनिया गांधी अपनी नजर से देखेंगी, उन्हें दूसरे लोग अलग तरह से याद कर सकते हैं। पाठकों को सभी पक्षों को परखने की आजादी रहनी चाहिए।
किताब छपने से पहले विवाद क्यों?
सोनिया गांधी की आत्मकथा 10 नवंबर को रिलीज होने वाली है। भारत में इसे हार्पर कॉलिन्स प्रकाशित करेगा। इससे पहले पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के साथ प्रकाशन को लेकर बातचीत टूट गई थी।
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि पांडुलिपि के कुछ राजनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सों में बदलाव को लेकर असहमति थी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बाहरी दबाव की आशंका भी जताई।
हालांकि, पेंगुइन ने साफ कहा कि उसके फैसले पर कोई बाहरी दबाव नहीं था। प्रकाशक के मुताबिक, एक खास मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी और सामान्य संपादकीय प्रक्रिया के दौरान विवाद पैदा हुआ।
फिलहाल इस बात का स्वतंत्र सबूत सामने नहीं आया है कि किताब के प्रकाशन को रोकने के लिए सरकार या किसी दूसरी राजनीतिक ताकत ने हस्तक्षेप किया था।
लेकिन इस विवाद से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है।
जब कोई प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति अपनी यादें लिखता है, तो प्रकाशक की तथ्य जांचने की जिम्मेदारी और लेखक की अपनी बात कहने की आजादी के बीच संतुलन कैसे बने?
प्रकाशक को गलत या अप्रमाणित दावों पर सवाल उठाने का हक है। उसी तरह लेखक को भी अपनी व्याख्या से असहमत होने का अधिकार है। हर संपादकीय असहमति को सेंसरशिप कहना सही नहीं, लेकिन राजनीतिक दबाव के किसी विश्वसनीय आरोप को बिना जांचे खारिज करना भी उचित नहीं होगा।
सोनिया गांधी की कहानी सुनना जरूरी, लेकिन सवाल पूछना भी
सोनिया गांधी ने अपनी राजनीतिक जिंदगी में तीखी आलोचना का सामना किया है। उनके विदेशी मूल से लेकर कांग्रेस की नीतियों तक, कई मुद्दों पर उनके समर्थकों और विरोधियों के बीच गहरा मतभेद रहा है।
ऐसे में उनकी आत्मकथा पाठकों को उन घटनाओं का एक नया नजरिया दे सकती है, जिनके बारे में अब तक ज्यादातर दूसरे लोगों ने लिखा है।
मगर किताब की असली अहमियत इस बात से तय होगी कि उसमें कितनी साफगोई है। क्या वह केवल अपने बारे में बनी धारणाओं का जवाब देंगी, या अपने नेतृत्व के मुश्किल और विवादित फैसलों पर भी खुलकर बात करेंगी?
क्या उसमें निजी यादों के साथ राजनीतिक जवाबदेही के सवालों को भी जगह मिलेगी?
इन सवालों का जवाब किताब पढ़ने के बाद ही मिल सकेगा। रिलीज से पहले उसे न ऐतिहासिक सच का अंतिम दस्तावेज मानना उचित है, न किसी राजनीतिक बचाव की कोशिश घोषित करना।
सोनिया गांधी का अपनी कहानी खुद सुनाना महत्वपूर्ण है। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी नेता की कहानी तब ज्यादा मायने रखती है, जब उसमें अपनी उपलब्धियों के साथ मुश्किल फैसलों और गलतियों पर भी सवाल पूछने की गुंजाइश हो।
10 नवंबर को किताब आएगी। उसके बाद सिर्फ यह देखना दिलचस्प नहीं होगा कि सोनिया गांधी ने क्या लिखा, बल्कि यह भी कि उनकी यादें सार्वजनिक रिकॉर्ड और दूसरे लोगों के अनुभवों से कहां मिलती हैं और कहां अलग पड़ती हैं।
आखिरकार, किसी नेता को अपनी कहानी सुनाने का हक है। लेकिन इतिहास केवल उसकी यादों से नहीं, तथ्यों, दस्तावेजों और अलग-अलग आवाजों से बनता है।