₹11 हजार का कैंसर इंजेक्शन ₹1.30 लाख में... इलाज के नाम पर मुनाफे की आखिर कितनी छूट होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सामने आया एक उदाहरण इसी सवाल को उठाता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने बताया कि एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को कीमोथेरेपी का इंजेक्शन 11 हजार रुपये में मिलता था, लेकिन जिस प्राइवेट अस्पताल में उसकी पत्नी का इलाज चल रहा था, वहां उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये मांगे गए।

अमित पांडे: संपादक
कैंसर से जूझ रहे किसी मरीज को जब बताया जाए कि उसकी जान बचाने वाला इंजेक्शन 1 लाख 30 हजार रुपये का है, तो उसके पास क्या विकल्प बचता है? वह दवा की कीमत पर मोलभाव करे, किसी दूसरी दुकान से रेट पूछे या अपने परिवार की जमा-पूंजी लगाकर इलाज कराए?
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सामने आया एक उदाहरण इसी सवाल को उठाता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने बताया कि एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को कीमोथेरेपी का इंजेक्शन 11 हजार रुपये में मिलता था, लेकिन जिस प्राइवेट अस्पताल में उसकी पत्नी का इलाज चल रहा था, वहां उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये मांगे गए।
यह अदालत में सुनाया गया एक उदाहरण है, किसी खास अस्पताल के खिलाफ अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं। लेकिन इसने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर समस्या सामने रख दी है—मरीज की मजबूरी और दवाओं की कीमत के बीच आखिर कितने मुनाफे की गुंजाइश होनी चाहिए?
अस्पताल चलाने का खर्च है, लेकिन उसकी सीमा क्या है?
सुनवाई में प्राइवेट अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि अस्पतालों को चौबीसों घंटे डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, ऑपरेशन थिएटर और दूसरी सुविधाएं तैयार रखनी पड़ती हैं। इन पर भारी खर्च आता है। बाहर से लाई गई दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर भी जोखिम हो सकता है।
इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आधुनिक अस्पताल चलाना महंगा है। गंभीर मरीजों के इलाज में प्रशिक्षित स्टाफ, सुरक्षित दवाओं और भरोसेमंद सप्लाई की जरूरत होती है।
लेकिन सवाल यह है कि इन खर्चों की भरपाई दवाओं पर भारी मार्जिन लगाकर ही क्यों की जाए?
अगर अस्पताल को किसी सेवा के लिए ज्यादा शुल्क लेना जरूरी है, तो वह खर्च मरीज के बिल में साफ दिखाई देना चाहिए। दवा की खरीद कीमत, अस्पताल का मार्जिन और इलाज की दूसरी सेवाओं के चार्ज अलग-अलग बताए जा सकते हैं।
इससे मरीज को पता चलेगा कि वह दवा की कीमत चुका रहा है या अस्पताल की दूसरी सुविधाओं का खर्च भी उसी में जोड़ा गया है।
MRP कानूनी हो सकती है, लेकिन क्या हर कीमत जायज़ है?
भारत में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत कुछ जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार तय करती है। नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर भी नियम हैं और उनकी MRP पिछले 12 महीनों की तुलना में 10 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती।
लेकिन इन दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अपेक्षाकृत ज्यादा छूट मिलती है। यही वजह है कि खरीद कीमत और छपी हुई MRP के बीच बड़ा अंतर हो सकता है।
कानून के मुताबिक अधिकतम कीमत पर दवा बेचना और उस कीमत का नैतिक रूप से उचित होना दो अलग सवाल हैं।
खासकर तब, जब खरीदार कोई सामान्य ग्राहक नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी से जूझ रहा इंसान हो।
अस्पताल के भीतर मरीज के पास अक्सर दूसरी दुकान तलाशने, कीमतों की तुलना करने या इलाज टालने की गुंजाइश नहीं होती। ऐसी स्थिति में सामान्य बाजार वाली मोलभाव की व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं करती।
इसीलिए जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर निगरानी सिर्फ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
सरकार का नया फैसला राहत है, लेकिन निगरानी भी जरूरी
केंद्र सरकार ने 137 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर 30 फीसदी की सीमा तय की है। नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी। सरकार को उम्मीद है कि कुछ दवाओं की MRP में बड़ी कमी आएगी।
यह एक अहम कदम है। लेकिन सवाल यह भी है कि संशोधित कीमतों का फायदा मरीजों तक वास्तव में कितना पहुंचेगा।
इसके लिए जरूरी है कि अस्पताल दवाओं की नई कीमतें सार्वजनिक करें, मरीजों को पूरा आइटमाइज्ड बिल मिले और ज्यादा वसूली की शिकायत पर तेजी से कार्रवाई हो।
साथ ही सरकार को यह भी देखना होगा कि कीमतों पर सख्ती से जरूरी दवाओं की सप्लाई प्रभावित न हो। दवा सस्ती होने के साथ उपलब्ध भी रहनी चाहिए।
सुरक्षित व्यवस्था के तहत मरीजों को बाहर से खरीदी गई प्रमाणित दवाएं इस्तेमाल करने का विकल्प देने पर भी विचार होना चाहिए।
इलाज कारोबार हो सकता है, लेकिन मरीज की मजबूरी मुनाफे का आधार नहीं
भारत में प्राइवेट अस्पताल स्वास्थ्य सेवाओं का अहम हिस्सा हैं। सरकारी अस्पतालों पर दबाव भी एक वास्तविक समस्या है। इसलिए पूरी प्राइवेट हेल्थकेयर व्यवस्था को गलत ठहराना समाधान नहीं होगा।
लेकिन जिस व्यवस्था में मरीज के पास इलाज टालने का विकल्प न हो, वहां कीमतों की पारदर्शिता सामान्य कारोबार से कहीं ज्यादा जरूरी हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फैसला सुरक्षित रखा है। अदालत की तीखी टिप्पणियां अंतिम आदेश नहीं हैं। अब देखना होगा कि मूल्य नियंत्रण और अस्पतालों की जवाबदेही पर उसके फैसले में क्या व्यवस्था सामने आती है।
लेकिन एक बात साफ है—अस्पताल को मुनाफा कमाने का अधिकार हो सकता है, मरीज की मजबूरी से बेहिसाब मुनाफा कमाने का नहीं।
इलाज का बिल ऐसा होना चाहिए जिसे मरीज समझ सके, जांच सके और जरूरत पड़ने पर चुनौती भी दे सके। क्योंकि बीमारी किसी इंसान को बेबस कर सकती है, लेकिन उस बेबसी का फायदा उठाने की छूट किसी को नहीं मिलनी चाहिए।