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पैरा-एथलीट मे स्वर्ण पदक जितने वाली सुवर्णा राज बनीं दिल्ली की स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज

पैरा-एथलीट और गोल्ड मेडलिस्ट सुवर्णा राज को दिल्ली का स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज नियुक्त किया गया है। जानें उनकी भूमिका।

Sonu Nigam· 24 Oct, 12:46 PM · 2 मिनट
पैरा-एथलीट मे स्वर्ण पदक जितने वाली सुवर्णा राज बनीं दिल्ली की स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज

दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने पैरा-एथलीट और एक्सेसिबिलिटी एडवोकेट सुवर्णा राज को 'स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज' के पद पर नियुक्त किया है। यह नियुक्ति शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को फाइनल की गई। दिलचस्प बात यह है कि इस बड़ी जिम्मेदारी मिलने से ठीक एक दिन पहले सुवर्णा राज ने जापान के नागोया में आयोजित एशियाई पैरा खेलों में महिलाओं की F54 डिस्कस थ्रो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया था। उन्होंने 15.66 मीटर के थ्रो के साथ यह उपलब्धि हासिल की।

सुवर्णा राज के पास न केवल खेलों का अनुभव है, बल्कि वह एक्सेसिबिलिटी स्पेशलिस्ट भी रही हैं और पूर्व में भारतीय चुनाव आयोग की ब्रांड एंबेसडर के तौर पर भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। उनकी यह नियुक्ति 'राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज एक्ट, 2016' की धारा 79 और दिल्ली राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज रूल्स, 2018 के तहत की गई है।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद हुई नियुक्ति

इस पद को भरने की प्रक्रिया काफी समय से लंबित थी। साल 2024 में भी नियुक्ति की कोशिश की गई थी, लेकिन तब कोई नतीजा नहीं निकला। इसके बाद सौरभ दीक्षित द्वारा दायर एक याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने 6 अक्टूबर 2026 को स्थानीय सरकार को आदेश दिया था कि चार सप्ताह के भीतर इस पद को भरा जाए। कोर्ट के निर्देश के बाद मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति ने काम शुरू किया, जिसमें समाज कल्याण, शिक्षा, राजस्व और स्वास्थ्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। 20 आवेदकों में से 13 उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया गया, जिसके बाद सुवर्णा राज का चयन हुआ।

अब सुवर्णा राज तीन साल के कार्यकाल के लिए या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) इस पूर्णकालिक पद पर रहेंगी। उनके पास एक सिविल कोर्ट के समान अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) शक्तियां होंगी। उनकी मुख्य जिम्मेदारियों में दिव्यांगजनों के अधिकारों के कार्यान्वयन की निगरानी करना, अधिकारों के उल्लंघन की जांच करना, गवाहों को बुलाना और आधिकारिक दस्तावेज मंगवाना शामिल होगा ताकि दिव्यांग व्यक्तियों को उनके कानूनी अधिकार मिल सकें।

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